-काग़ज़ी ट्रेनिंग, बंद कंपनी को ठेका प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) को देश के युवाओं को रोजगारोन्मुखी बनाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना में 10,000 करोड़ की लूट हो गई है? नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में सामने आई जानकारी के अनुसार इस योजना की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 33,000 युवाओं की फर्जी ट्रेनिंग दिखाकर करीब 10,000 करोड़ रुपये की लूट सरकारी खजाने से हुई है। केग की रिपोर्ट के अनुसार यह गड़बड़ी केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित घोटाले और लूट की ओर इशारा करती है। कैग की रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है, कि एक ही फोटो में सैकड़ों लोगों को ट्रेनिंग लेते हुए दिखाया गया है। प्रशिक्षण केंद्रों ने एक ही तस्वीर अलग-अलग बैचों ऒर अलग-अलग तारीखों मे लाभार्थियों के नाम पर अपलोड कर करोड़ों रुपए का भुगतान लिया है। इसका अर्थ साफ है ट्रेनिंग हुई नहीं, सिर्फ काग़ज़ों और पोर्टल पर ‘कौशल निर्माण’ का प्रशिक्षण देकर सुनियोजित साजिश के तहत लूट की गई है। रिपोर्ट में जो गंभीर तथ्य हैं, कैग ने जिन मामलों में लाभार्थियों के बैंक खातों का पता लगाने की कोशिश की, उनके बैंक खाते ही कैग पता नहीं लगा पाई। बैंक अकाउंट के नंबर भी सही नहीं थे। ऐसी स्थिति में लाभार्थियों के खाते में किस तरह से राशि ट्रांसफर हुई है, इसका पता केग नहीं लगा पाई। सरकारी खजाने की राशि एक तरह से किसी एक ऐसे खाते में ट्रांसफर की गई है जिसका उल्लेख केग को कहीं नहीं मिला। जिन युवाओं को प्रशिक्षित दिखाया गया, उनके अस्तित्व, पहचान और भुगतान तीनों पर कैग ने गड़बड़ी का संदेह जताया है। सवाल उठता है, जब आधार, बैंक खाता और डिजिटल ट्रैकिंग जैसी सुविधायें मौजूद थीं. उसके बाद भी फर्जीवाड़ा फलता-फूलता रहा? इससे स्पष्ट है, निगरानी तंत्र या तो अक्षम था, या जानबूझकर आंखें मूंदकर इस लूट में शामिल था। इस कथित घोटाले की जिम्मेदारी प्रशिक्षण प्रदाताओं तक सीमित नहीं की जा सकती है। मंत्रालय, सेक्टर स्किल काउंसिल, थर्ड पार्टी असेसमेंट एजेंसियां और भुगतान प्रणाली इत्यादि सबकी भूमिका की निष्पक्ष ऒर गहन जांच जरूरी है। इस तरह की लूट में तो अपराधिक कार्यवाही की जानी चाहिए थी। कैग जैसी संवैधानिक संस्था बैंक खातों और वास्तविक लाभार्थियों तक नही पहुंच पाई। इसका मतलब है कि सुनयोजित लूट की गई है। यह शासन प्रणाली की पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल उठाती है। क्या किसी भी योजना में इतनी बड़े पैमाने पर लूट हो सकती है? पीएमकेवीवाई जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य युवाओं को हुनर देकर आत्मनिर्भर बनाना था। यदि वही योजना सरकारी खजाने से लूट का साधन बन जाए] बिचौलियों और फर्जी संस्थानों के माध्यम से सरकारी खजाने से लूट की जाए। कैग के इस खुलासे से उन लाखों युवाओं के साथ भी अन्याय हुआ है, जो वास्तव में कौशल प्रशिक्षण की प्रतीक्षा में बैठे हैं। जो जानकारी निकलकर सामने आ रही है उसके अनुसार 33,000 युवाओं को प्रशिक्षण देने के नाम पर जिस कंपनी को ठेका दिया गया था वह कंपनी रजिस्टर के ठेका की अवधि के 6 साल पहले से बंद थी। बंद कंपनी को ठेका दिया गया। बिना प्रशिक्षण दिए ही 10,000 करोड रुपए की लूट की गई। इसमें बड़े-बड़े लोगों के शामिल होने की संभावना है। इसका मनी ट्रैल भी जांच एजेंसी पता करना चाहेगी तो उसे पलक झपकते ही इसकी जानकारी मिल जाएगी। इस स्थिति को देखते हुए लूट और घोटाले की जाँच सीबीआई/ईडी जैसी स्वतंत्र एजेंसियों से कराकर, दोषियों पर कठोर कार्यवाही की जाए। केग की इस रिपोर्ट को आधार बनाकर सरकारी योजनाओं की री-डिज़ाइन हो। सरकारी योजनाओं के जमीनी एवं वास्तविक सत्यापन, रियल-टाइम ऑडिट, और लाभार्थी-केंद्रित भुगतान अनिवार्य हो। अन्यथा ‘स्किल इंडिया’ केवल नारा बनकर रह जाएगा। इसी तरह सरकारी खजाने से योजनाएं तो चलती रहेंगी, इसका वास्तविक लाभ हितग्राहियों को नहीं मिलेगा। ‘काग़ज़ी ट्रेनिंग’ का यह सच दिल दहलाने वाला है। जहां पर योजना की शत-प्रतिशत राशि सरकारी खजाने से लूट ली गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार कह चुके हैं, जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब उस समय केंद्र से 1 रुपये चलता था, बीच रास्ते में पचासी पैसे गायब हो जाते थे। दुर्भाग्य का विषय है, अब कैग की रिपोर्ट के बाद खजाने से 100 रुपये निकले, वह रास्ते में नहीं मंत्रालय में ही कागजों में लूट लिए गए। यह नया मुहावरा जल्द ही सुनने को मिल सकता है। ईएमएस / 16 जनवरी 26