लेख
16-Jan-2026
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- डिजिटल शोर में शब्दों का शाश्वत स्वर (विश्व पुस्तक मेला (10-18 जनवरी) पर विशेष नई दिल्ली के भारत मंडपम में 10 से 18 जनवरी तक आयोजित हो रहा 53वां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया तेजी से डिजिटल स्क्रीन पर सिमटती जा रही है और पढ़ने की आदत को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही है। ऐसे में यह आयोजन न केवल किताबों का बाजार है बल्कि यह उम्मीद का वह दीप भी है, जो बताता है कि शब्दों की रोशनी अब भी मनुष्यता का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन के सहयोग से आयोजित यह नौ दिवसीय मेला इस वर्ष कई मायनों में ऐतिहासिक है। पहली बार इसकी एंट्री पूरी तरह मुफ्त रखी गई है, जिससे ज्ञान तक पहुंच को सचमुच लोकतांत्रिक बनाया गया है। यह कदम केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि उस सोच का विस्तार है, जिसमें किताबों को किसी विशेष वर्ग की वस्तु नहीं बल्कि समाज की साझा धरोहर माना गया है। जब किसी मेले में प्रवेश के लिए जेब नहीं, केवल जिज्ञासा की जरूरत हो तो वहां ज्ञान अपने आप ही जनांदोलन का रूप ले लेता है। इस वर्ष पुस्तक मेले की थीम ‘भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य और ज्ञान @75’ अपने आप में गहरी अर्थवत्ता समेटे हुए है। आजादी के 75 वर्षों की यात्रा में भारत ने केवल सीमाओं की रक्षा ही नहीं की बल्कि रणनीतिक बुद्धिमत्ता, वैज्ञानिक प्रगति और मानवीय मूल्यों के साथ सैन्य परंपरा को आगे बढ़ाया है। हॉल नंबर 5 में बना थीम पवेलियन एक जीवंत इतिहास बनकर सामने आता है, जहां अर्जुन टैंक, आईएनएस विक्रांत और एलसीए तेजस की प्रतिकृतियां केवल तकनीकी उपलब्धियां नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत की कहानी कहती हैं। 21 परमवीर चक्र विजेताओं को समर्पित श्रद्धांजलि स्थल यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता और सुरक्षा केवल शब्द नहीं बल्कि अनगिनत बलिदानों का परिणाम हैं। यहां प्रदर्शित 500 से अधिक पुस्तकें और 100 से अधिक थीम आधारित कार्यक्रम सैन्य इतिहास को केवल युद्धों की कथा नहीं, नीति, विज्ञान और राष्ट्र निर्माण के व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं। मेले का उद्घाटन करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पुस्तकों को पीढ़ियों को जोड़ने वाला सेतु बताया। पुस्तकें सभ्यताओं की स्मृतियों को संजोती हैं और समाज को दिशा देती हैं। डिजिटल युग में ज्ञान को सुलभ और समावेशी बनाने की सरकार की प्राथमिकता इस मेले में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय के माध्यम से 23 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध 6000 से ज्यादा मुफ्त ई-बुक्स और टेक्स्ट-टू-स्पीच जैसी सुविधाएं यह साबित करती हैं कि तकनीक और पुस्तकें एक-दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि पूरक हो सकती हैं। यह मेला इस बहस को भी विराम देता है कि डिजिटल माध्यम छपी हुई किताबों का स्थान ले लेंगे। यहां दोनों एक साथ, एक-दूसरे को मजबूत करते दिखाई देते हैं। विश्व पुस्तक मेले की सबसे सुंदर तस्वीर शायद वह है, जहां जेन-जी के युवा, जिन्हें अक्सर ‘स्क्रीन की पीढ़ी’ कहकर किताबों से दूर मान लिया जाता है, कागज के पन्नों में डूबे नजर आते हैं। पिक्सल्स के शोर से निकलकर वे शब्दों की गहराई को टटोलते हैं, अपनी पसंदीदा किताबें ढूंढ़ते हैं और बताते हैं कि तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, सुकून आज भी किताबों में बंद ज्ञान से ही मिलता है। कतर पवेलियन में हिंदी और उर्दू के तैरते अक्षरों को देखकर तकनीक में निपुण युवा भी ठहर जाते हैं। वे लुप्त होते पारंपरिक खेलों, गायब होते पक्षियों और सांस्कृतिक स्मृतियों की किताबों में खुद को खोजते हैं। यह दृश्य इस बात का प्रमाण है कि युवा पीढ़ी को किताबों से दूरी नहीं बल्कि सही मंच और माहौल की जरूरत है। इस वर्ष मेले की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति भी उल्लेखनीय है। 35 से अधिक देशों के 1000 से ज्यादा प्रकाशक, 1000 से अधिक लेखक और वक्ता तथा 600 से ज्यादा साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम इसे सचमुच वैश्विक उत्सव बनाते हैं। कतर का गेस्ट ऑफ ऑनर और स्पेन का फोकस कंट्री होना भारत के सांस्कृतिक कूटनीति के विस्तार को दर्शाता है। स्पेन-भारत ड्यूल ईयर 2026 के तहत दोनों देशों के लेखकों और साहित्य को मिला मंच यह बताता है कि किताबें केवल पढ़ने की वस्तु नहीं बल्कि देशों के बीच संवाद का माध्यम भी हैं। पुस्तक मेले की सांस्कृतिक आभा इसे और जीवंत बनाती है। एम्फीथिएटर में हर शाम संगीत, कविता पाठ और नाट्य प्रस्तुतियां आयोजित हो रही हैं, जहां शब्दों के साथ सुर और अभिनय मिलकर संस्कृति का उत्सव रचते हैं। यहां बुजुर्ग किताबों के बीच बने सेल्फी प्वाइंट पर मुस्कुराहटें कैद करते हैं तो बच्चे ‘किड्ज एक्सप्रेस’ पवेलियन में कहानी सत्रों और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए सीखने की नई दुनिया में कदम रखते हैं। बच्चों के लिए यह मेला केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक ऐसा अनुभव है, जो उनके मन में किताबों के प्रति आजीवन प्रेम बो सकता है। नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले का इतिहास भी इसकी महत्ता को और गहराई देता है। 1972 में विंडसर प्लेस से शुरू हुआ यह सफर आज 53 वर्षों का हो चुका है। तब केवल 200 प्रकाशक और कुछ ही देश शामिल होते थे, आज यह एशिया के सबसे बड़े और दुनिया के सबसे बड़े बी2सी बुक फेयर में गिना जाता है। यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि बदलते समय के बावजूद पुस्तकों का महत्व कम नहीं हुआ बल्कि हर दौर में नए रूप में सामने आया है। पुस्तकें केवल जानकारी नहीं देती, वे सोचने की क्षमता विकसित करती हैं। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया हमें त्वरित सूचनाएं तो देते हैं लेकिन अक्सर निष्क्रिय स्वीकृति की आदत डाल देते हैं। इसके विपरीत, पुस्तकें ध्यान, एकाग्रता और कल्पनाशीलता की मांग करती हैं। वे प्रश्न पूछने की क्षमता जगाती हैं और उत्तर खोजने का धैर्य सिखाती हैं। जब हम अकेले होते हैं, उदास या परेशान होते हैं, तब किताबें ही सच्ची मित्र बनकर हमारा साथ देती हैं। यही कारण है कि साहित्यकारों ने सदैव पुस्तकों को अखंड संपत्ति और नैतिकता की संदेशवाहक माना है। आज जब समयाभाव के नाम पर हम पढ़ने से कतराने लगे हैं, तब विश्व पुस्तक मेला जैसे आयोजन हमें यह याद दिलाते हैं कि ज्ञान कभी बेकार नहीं होता। किताबें विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और पहचानों को एक साझा विरासत के इर्द-गिर्द जोड़ती हैं। अर्नेस्ट हेमिंग्वे के शब्दों में, एक अच्छी किताब से ईमानदार मित्र कोई नहीं होता। नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 इसी मित्रता का उत्सव है, जहां शब्द, विचार और संस्कृति एक-दूसरे से गले मिलते हैं। कुल मिलाकर, यह मेला केवल किताबों की खरीद-फरोख्त का स्थान नहीं बल्कि पढ़ने की संस्कृति का सबसे बड़ा सार्वजनिक उत्सव है। यह युवाओं को यह संदेश देता है कि भविष्य केवल तकनीक से नहीं, विचारों से बनता है। यह बच्चों को यह अहसास कराता है कि किताबें उनके जीवन की साथी हो सकती हैं, साथ ही यह समाज को भी स्मरण कराता है कि शब्दों की शक्ति कभी समाप्त नहीं होती। बिना टिकट, बिना बाधा और बिना भेदभाव, नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 ज्ञान, इतिहास, संगीत और संस्कृति का वह संगम है, जो सचमुच इसे बेहद खास बनाता है। (लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और कई चर्चित पुस्तकों के रचनाकार हैं) ईएमएस / 16 जनवरी 26