लेख
17-Jan-2026
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खंडित फैसले से उठे सवाल,अब बड़ी पीठ पर टिकी देश की निगाहें भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून की आत्मा क्या होनी चाहिए?यह सवाल एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के हालिया खंडित फैसले के बाद केंद्र में आ गया है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ एक राय पर नहीं पहुंच सकी। एक ओर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इस धारा को असंवैधानिक बताते हुए रद्द किए जाने की बात कही, तो दूसरी ओर जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इसे ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते हुए वैध ठहराया, हालांकि उन्होंने जांच की अनुमति सरकार के बजाय स्वतंत्र संस्थाओं,लोकपाल या लोकायुक्त से देने की शर्त जोड़ दी। इस मतभेद ने न केवल कानूनी बहस को तेज किया है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक नैतिकता पर भी गहरे प्रश्न खड़े किए हैं। अब यह मामला प्रधान न्यायाधीश के समक्ष बड़ी पीठ के गठन के लिए भेजा गया है, जहां से देश को एक निर्णायक दिशा मिलने की उम्मीद है। धारा 17ए को वर्ष 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। इसका मूल प्रावधान यह है कि किसी लोकसेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए निर्णयों या सिफारिशों के संबंध में जांच या पूछताछ शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी। व्यवहार में यह सक्षम प्राधिकारी प्रायः वही सरकार या विभाग होता है, जिसके अधीन वह अधिकारी काम करता है। संशोधन का औचित्य यह बताया गया कि इससे ईमानदार अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण शिकायतों और राजनीतिक प्रतिशोध से बचाया जा सकेगा, ताकि वे निर्भय होकर नीतिगत निर्णय ले सकें। सुनने में यह तर्क आकर्षक लगता है, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव और लोकतांत्रिक निहितार्थ कहीं अधिक जटिल हैं। जस्टिस नागरत्ना ने अपने मत में इसी जटिलता की ओर संकेत किया। उनका कहना था कि जांच से पहले पूर्व अनुमति की शर्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मूल उद्देश्य के विपरीत है। यह प्रावधान जांच प्रक्रिया को बाधित करता है और ईमानदार अधिकारियों की रक्षा करने के बजाय भ्रष्ट लोकसेवकों को संरक्षण प्रदान करता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह धारा वस्तुतः उन प्रावधानों को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट पहले ही विनीत नारायण और सुब्रमण्यम स्वामी जैसे ऐतिहासिक फैसलों में अस्वीकार कर चुका है। इन फैसलों में अदालत ने स्पष्ट किया था कि भ्रष्टाचार की जांच में कार्यपालिका की अनावश्यक दखलंदाजी कानून के शासन को कमजोर करती है और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। वास्तविकता यह है कि भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की अनुमति सरकार से लेना एक अंतर्निहित विरोधाभास पैदा करता है। जब सरकार स्वयं सक्षम प्राधिकारी होती है, तो वह अपने ही अधिकारियों के खिलाफ जांच को मंजूरी देने में स्वाभाविक रूप से हिचकिचाती है। राजनीतिक दबाव, प्रशासनिक हित और सत्ता संरचना के भीतर की आपसी निर्भरता ऐसे कारक हैं, जो निष्पक्ष निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि नागरिक समाज और जनहित याचिकाकर्ताओं ने इस प्रावधान को भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर करने वाला बताया है। ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ जैसी संस्थाओं का तर्क है कि पूर्व अनुमति की बाध्यता से जांच में देरी होती है, साक्ष्य नष्ट होने का खतरा बढ़ता है और भ्रष्टाचारियों को बच निकलने का अवसर मिल जाता है। दूसरी ओर, जस्टिस विश्वनाथन का दृष्टिकोण यह स्वीकार करता है कि ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण की आवश्यकता है, लेकिन वे इस संरक्षण को सरकार के हाथों में सौंपने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मत है कि धारा 17ए संवैधानिक रूप से तभी वैध मानी जा सकती है, जब जांच की अनुमति का निर्णय कार्यपालिका से स्वतंत्र संस्थाएं लोकपाल या राज्य स्तर पर लोकायुक्त लें। इस दृष्टिकोण में एक संतुलन की कोशिश दिखाई देती है, जहां एक ओर दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से अधिकारियों को बचाने की चिंता है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा और जवाबदेही बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी। हालांकि, यह प्रश्न बना रहता है कि क्या कानून की मूल संरचना को “व्याख्या” के माध्यम से इतना सीमित किया जा सकता है, या फिर इसके लिए विधायी संशोधन आवश्यक है। इस पूरे विवाद के केंद्र में एक बुनियादी सिद्धांत है।कानून के समक्ष समानता और निष्पक्ष जांच। यदि किसी आम नागरिक पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे, तो जांच के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। फिर लोकसेवकों के लिए विशेष सुरक्षा क्यों? यह प्रश्न तब और गंभीर हो जाता है, जब यह सुरक्षा जांच के शुरुआती चरण में ही दी जाती है, यानी उस समय जब तथ्य सामने आना बाकी होते हैं। जांच शुरू होने से पहले ही एक प्रशासनिक फिल्टर लगा देना न्याय की गति और दिशा दोनों को प्रभावित करता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि सत्ता के निकट बैठे लोग कानून से ऊपर हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए घातक है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि निवारण करना है। जब जांच की प्रक्रिया ही बाधित होगी, तो निवारण कैसे संभव होगा? ईमानदार अधिकारियों की रक्षा के लिए पहले से ही कानून में पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं, जैसे कि झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई और न्यायिक निगरानी। इसके बावजूद यदि एक अतिरिक्त परत के रूप में सरकारी मंजूरी को अनिवार्य किया जाता है, तो यह संदेह को जन्म देता है कि कहीं यह व्यवस्था भ्रष्टाचार से लड़ने के बजाय उसे ढाल देने का साधन तो नहीं बन रही। खंडित फैसले का एक सकारात्मक पहलू यह है कि इसने एक व्यापक और गहन बहस का मार्ग प्रशस्त किया है। अब जब मामला बड़ी पीठ के समक्ष जाएगा, तो उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस प्रश्न का अंतिम और स्पष्ट उत्तर देगा कि क्या भ्रष्टाचार की जांच पर सरकारी अनुमति की शर्त संविधान की कसौटी पर खरी उतरती है। यह फैसला केवल एक धारा की वैधता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि भारत का लोकतंत्र सत्ता और जवाबदेही के बीच किस तरह का संतुलन चाहता है। देश के लिए यह क्षण आत्ममंथन का भी है। प्रशासनिक दक्षता और ईमानदारी को बढ़ावा देने के लिए भयमुक्त वातावरण जरूरी है, लेकिन भयमुक्तता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं हो सकता। यदि कानून ईमानदार अधिकारियों को बचाने के नाम पर भ्रष्टाचारियों के लिए कवच बन जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। इसलिए, सरकार की मंजूरी को भ्रष्टाचार जांच की अनिवार्य शर्त बनाना न केवल व्यावहारिक रूप से दोषपूर्ण है, बल्कि नैतिक रूप से भी अस्वीकार्य है। अंततः, बड़ी पीठ के समक्ष यह जिम्मेदारी होगी कि वह कानून के अक्षर और उसकी आत्मा दोनों को ध्यान में रखते हुए निर्णय दे। एक ऐसा निर्णय, जो ईमानदार लोकसेवकों को दुर्भावना से बचाए, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर न करे। भारत की जनता को एक ऐसे न्यायिक संदेश की प्रतीक्षा है, जो स्पष्ट रूप से कहे कि भ्रष्टाचार की जांच पर किसी भी प्रकार की सरकारी बेड़ी स्वीकार्य नहीं है, और कानून का राज सर्वोपरि है। यही इस खंडित फैसले से निकली सबसे बड़ी सीख और सबसे बड़ी अपेक्षा है। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार ,स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 17 जनवरी /2026