लेख
17-Jan-2026
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भारत में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) को गरीबी उन्मूलन और आजीविका सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है। इस कानून ने ग्रामीण भारत में न्यूनतम आय, पलायन पर नियंत्रण और संकट के समय गरीबों को सहारा देने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। लेकिन रोजगार देकर भूख और कुपोषण की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं था। यही कारण है, मनरेगा के बाद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 को एक बड़े सामाजिक अधिकार के रूप में भारत में संविधान अधिकार के रूप में इसे लागू किया गया। केंद्र सरकार बदलती आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों में इस कानून में सुधार करते हुए इसे नए स्वरूप में लाना चाहती है। खाद्य सुरक्षा कानून का उद्देश्य देश की दो-तिहाई आबादी को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराना था। इसने भूख के खिलाफ कानूनी अधिकार की अवधारणा के संवैधानिक स्वरूप को मजबूत किया था। बीते एक दशक में जनसंख्या की बढ़ती संरचना, शहरीकरण, प्रवासी श्रमिकों की संख्या और महँगाई मे बड़ा बदलाव आया है। आम आदमियों के जीवन यापन के तरीके बदल गए हैं। लेकिन इस कानून में कोई सुधार नहीं हुआ है। इस योजना में लाभार्थियों की संख्या 2011 की जनगणना के आधार पर तय है। जिसके कारण करोड़ों गरीब और ज़रूरतमंद वर्तमान समय में इस योजना के दायरे से बाहर हैं। मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून के बीच तालमेल नहीं होने से इन दोनों योजनाओं का सामा‎जिक और आ‎र्थिक ‎विकास में बड़ा प‎रिवर्तन देखने को नहीं ‎मिला। मनरेगा मजदूरी कई राज्यों में न्यूनतम मजदूरी से भी कम है। मजदूर के भुगतान में देरी बड़ी आम बात है। 100 दिन का रोजगार भी इस योजना में नहीं मिल पा रहा था। इसके बाद भी केंद्र सरकार ने जो नया संशोधन किया है। उसके अनुसार 125 दिन रोजगार देने का प्रावधान किया गया है। जब मजदूरी ही समय पर नहीं मिलती है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार ने 40 फ़ीसदी राशि देने का भार राज्यों पर डाल दिया है। ऐसी स्थिति में मनरेगा की पुरानी योजना तथा जी राम जी की नई योजना दोनों सवालों के घेरे में बनी हुई है। ऐसी स्थिति में खाद्य सुरक्षा प्रणाली पर गरीबों की निर्भरता ऒर भी बढ़ जाती है।जरूरी है कि दोनों कानूनों को अलग-अलग नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा के लिए संयुक्त रूप से दोनों योजनाओं को एक स्वरूप में देखा जाए। 2027 में जनगणना के आंकड़े ‎मिलेंगे, उसके आधार पर योजना का दायरा बढ़ाया जाए। नई जनगणना के आधार पर लाभार्थियों की संख्या बढ़ाई जाए। शहरी गरीबों को भी प्रभावी रूप से इस योजना में शामिल किया जाए। खाद्य सुरक्षा कानून को केवल गेहूं-चावल तक सीमित ना रखकर दाल, तेल और पौष्टिक आहार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली को संवैधानिक अधिकार में शामिल किया जाए। कुपोषण की समस्या भारत में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ की योजना को ज़मीनी स्तर पर बेहतर ढंग से लागू कर प्रवासी श्रमिकों को वास्तविक राहत दी जाए। जी राम जी की नई योजना और खाद्य सुरक्षा कानून की पारदर्शिता और जवाबदेही को तय किया जाए। तकनीक के नाम पर आधारित गड़बड़ियों को रोका जाए। रोजगार और वितरण की व्यवस्था को कानूनी अधिकार से जोड़ा जाए। यदि इसमें किसी व्यक्ति द्वारा कोई गड़बड़ी की जाती है। उसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान हो। शिकायत निवारण के तंत्र को मजबूत किया जाए। ताकि गरीबों के न्यूनतम अधिकार को संवैधानिक रूप से सुनिश्चित किया जा सके। मनरेगा ने ग्रामीण अंचलों के लोगों को काम का अधिकार देकर ग्रामीण अर्थ-व्यवस्थ और स्थानीय रोजगार बढ़ाने की ‎दिशा में योगदान ‎दिया। दिया। इसके लिए पंचायती राज व्यवस्था से इसे जोड़ा गया था। अभी जो नया कानून लागू किया गया है, उसमें यह प्रावधान नहीं है। केंद्र सरकार ने अपने हाथ में सारे अधिकार ले लिए हैं। इसमें सुधार की जरूरत है। इसी तरह से खाद्य सुरक्षा कानून मे जीवन यापन के लिए न्यूनतम राशन अथवा भोजन का अधिकार दिया जाना आवश्यक है। आवश्यकता है, दोनों कानून 2027 की जनगणना के आधार पर आर्थिक सामाजिक स्थिति पर समयानुकूल सुधारों को मजबूती के साथ कानूनी अ‎धिकार में शामिल किया जाए। भारत कल्याणकारी योजनाओं वाला देश’ ही नहीं, बल्कि सम्मान जनक जीवन की गारंटी देने वाला लोकतांत्रिक देश के रूप में सारी दुनिया में यह जाना जाए। भारत सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। ऐसी स्थिति में भारत को युवाओं के लिए ज्यादा से ज्यादा श्रम और रोजगार से जोड़ने के प्रयास मैं दोनों ही कानूनों में बदलाव की आवश्यकता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। दोनों योजनाओं का लाभ वास्तविक रूप से गरीबों को मिले। इसके लिए सरकार को सभी पक्षों के साथ बेहतर विचार विमर्श करते हुए जनसंख्या के आधार पर प्राप्त आंकड़ों के अनुसार सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए परिवर्तन करने की जरूरत है। इसके लिए कुछ समय इंतजार भी करना पड़े, तो सरकार को करना चाहिए। ताकि भ‎विष्य में बेहतर और दीर्घकालीन परिणाम प्राप्त हों। एसजे/ 17 जनवरी /2026