लेख
17-Jan-2026
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जीवन के प्रत्येक क्षण और संकल्पों में केवल विश्व शांति की ही वेदना और परमात्मा से प्रार्थना रहती थी। मनुष्य संसार में सबसे सर्वश्रेष्ठ और महान है फिर भी आसुरीयता का राक्षस ऐसा घर कर बैठा है कि मानवीयता और सौहार्द्र बीते समय की बात हो गयी है । इसी उधेड़ बुन में इस सृष्टि पर एक ऐसे महापुरूष के संकल्प थे जिनका नाम था प्रजापिता ब्रह्मा । उनका मकसद सर्व मनुष्यात्माओं को एक ऐसे सूत्र में बांधना था जिससे मानवता की डोर ऐसी मजबूत बने जहां पर कलंकित करने वाले कर्मों के लिये कोई स्थान न हो । ऐसा तो उन्हे बचपन से ही था । परंतु जब वे साठ साल की आयु में पहुंचे तब तात्कालिक विश्व की हालत देख उन्हे बहुत पीड़ा होती थी । प्रतिदिन घंटो पूजा पाठ , सर्व मनुष्यात्माओं की सुख शांति के लिये परमात्मा से प्रार्थना करना इसकी शुरूआत स्वयं से नहीं करेगा तब तक इस लक्ष्य को पाना कठिन नहीं बल्कि असंभव है । इसलिये इस क्रम का शुभारंभ उन्होने स्वयं से करना प्रारंभ किया और एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने की योजना बनायी जिससे पूरे विश्व के लोग उनसे प्रेरणा प्राप्त कर इस मार्ग पर चलकर मुकाम को हासिल कर सकें । सन् 1876 में हैदराबाद सिंध के एक धर्मपरायण परिवार में जन्में दादा लेखराज बचपन से ही पूरी मानवता के कल्याण के लिये चिन्तित रहते थे । कई बार तो उन्हे दूसरों के कष्ट को देखकर इतनी पीड़ा होती थी कि उसके लिये वे घंटो ईश्वर से प्रार्थना किया करते थे। धीरे धीरे वे बडे हुये और अपने माधुर्य स्वभाव तथा ईमानदारी के बल पर सुप्रसिद्ध होते गये । हीरे जवाहरात के व्यापार ने उन्हे वैष्विक स्तर पर सुप्रसिद्ध कर दिया । उन्होने ईश्वर को प्राप्त करने के लिये कई गुरू किये फिर भी उन्हे आत्मसंतुष्टि नहीं मिली । साठ वर्श की आयु में दादा लेखराज एक दिन जब अपने मित्र के घर वाराणसी गये थे तब उन्हे रात्रि में ईश्वरीय शक्ति का साक्षात्कार हुआ । वे इस बात को समझ नहीं पाये कि ये क्या हो रहा है । जब उन्होने अपने गुरूओं से इसके बारे में बात की तो वे भी इससे अनजान थे । तब बाबा समझ गये कि यह ईश्वरीय शक्ति की ही कमाल है । इस घटना से उनके मन में उधेड बुन चल ही रहा था कि पुनः परमात्मा ने उन्हे नई दुनिया की स्थापना तथा पुरानी दुनिया के विनाष का साक्षात्कार कराया तथा उन्हे नयी दुनिया की स्थापना का राज समझाया । यह देखकर बाबा की खुषी का ठिकाना नहीं रहा । परमात्मा षिव ने स्वयं अपना परिचय दिया तथा दादा लेखराज से नाम बदलकर प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के नाम से सुशोभित किया । बाबा को यह नहीं समझ में आया कि इस आसुरी दुनिया में नयी दुनिया की स्थापना कैसे होगी । तब परमात्मा ने उनके अंदर प्रवेश होकर स्वयं अपना परिचय दिया कि तुम्ही विश्व महाराजन श्री नारायण हो और अब यह तुम्हारा चौरासीवां जन्म है । जिससे तुम्हारा यह भौतिक रथ अब ईश्वरीय निर्देशन में नयी संसार बनाने का निमित्त बनेगा । इसके बाद विश्व परिवर्तन की कारवां का शुभारंभ हुआ । बाबा ने सन् 1937 में अपनी सारी चल अचल संपत्ति माताओं बहनों को सौंप दिया । इस अभिनव कार्य के लिए परमात्मा के आदेशानुसार ओम मंडली की स्थापना हुई । जिसमें थोडे से लोग आकर ईश्वरीय ज्ञान का श्रवण करते तथा अपने को देवता तुल्य बनाने का प्रयास करते । इस महान कार्य का प्रारंभ तो हो गया परंतु दैवीय समाज की परिकल्पना अर्थ हो रहे कार्यों में अनेक आसुरी वृत्तियों वाले लोगों के विरोध का सामना करना पडा । परंतु ईश्वरीय शक्ति सदैव ही आसुरी शक्तियों पर भारी पडी और कारवां बढता रहा । भारत पाकिस्तान बंटवारे के बाद ओम मंडली नामक यह संस्था ईश्वरीय निर्देशानुसार सन् 1950 में राजस्थान के माउण्ट आबू में आयी । यहीं से प्रारंभ हुआ नयी दुनिया बनाने का सिलसिला । बाबा अच्छी तरह जानते थे कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति को शांति और सुख के संबंधों का रहस्य नहीं मालुम होगा तब तक इस मार्ग पर चलकर इसकी स्थापना में सहयोगी बनना कठिन है । इसके लिये प्रजापिता ब्रह्मा बाबा ने परमात्मा शिव द्वारा दिये जा रहे ईष्वरीय ज्ञान और राजयोग की षिक्षा को सभी मनुष्यात्माओं तक पहुंचाने का प्रयास प्रारंभ किया । उसके लिये माताओं बहनों को आगे रखा । क्योंकि बाबा को मालूम था कि इस कारवां में माताओं बहनों की भूमिका मुख्य है । यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र देवता रमन्ते का भाव जागृत कराकर माताओं बहनों का सम्मान करते हुये इस महान सेवा के बागडोर के प्रतिनिधित्व का दायित्व सौंपा । बाबा ने मातओं बहनों को उस समय विशाल सेवा का दायित्व दिया जब समाज में महिलाओं के अधिकारों की चर्चा तक नहीं होती थी । यह अपने आप में एक सामाजिक दृश्टिकोण से लोगों में कौतूहल का विशय रहा । इसके लिये समाज में तरह तरह की चर्चायें प्रारम्भ हुई परन्तु उनके सारे संषयों को दूर करते हुए एक मिषाल पेष की । प्रजापिता ब्रह्मा बाबा ने स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन की अग्नि को तेज करते हुये गहन तपस्या से स्व शांति से विश्व शांति की अलख जगाते रहे । बाबा के जीवन में इस तरह का महान परिवर्तन लोगों के जीवन परिवर्तन का आधार बना । अरावली पर्वत के शिखर से प्रारंभ हुआ यह षंखनाद धीरे धीरे शहरों गॉवों तक फैलने लगा । बाबा ने गहन तपस्या कर स्वयं को संपूर्णता प्राप्ति की ओर बढ़ाते रहे । माताओं बहनों को मायावी और आसुरी वैभवों से अप्रभावित होने वाले शिक्षाओं से सजाकर मजबूत बनाते रहे । श्वेत परिधान वाली बहनें नारी नहीं बल्कि शिव शक्ति के रूप में विख्यात होने लगी तथा लोगों के जीवन में परिवर्तन कराने की निमित्त बनीं । बाबा ने अपनी गहन त्याग और तपस्या से संपूर्णता को प्राप्त कर फरिश्ता बन गये । बाबा की यह स्थिति इतनी उच्च हो गयी कि वे संपूर्णता के उच्च पराकाष्ठा को 18 जनवरी 1969 को अपने नश्वर शरीर का त्याग कर सूक्ष्म वतनवारी हो गये । चूंकि इस रूद्र गीता ज्ञान यज्ञ के रचयिता तथा पालनहार स्वयं परमात्मा षिव है । इसलिये यह कारवां बढता ही रहा । आज बाबा हमारे बीच में नहीं है बल्कि सूक्ष्म रूप में उनकी उपस्थिति आज भी लाखों-करोड़ों लोगों को प्रेरणा प्रदान कर रही है तथा उन्हें ईश्वरीय निर्देशन में स्वयं भाग्य बनाने का अवसर और शक्ति प्रदान कर रही है । दुनिया के पालन हार तथा सर्व आत्माओं के परमपिता परमात्मा शिव तथा प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के निर्देषन में शांति सुख और नये समाज की स्थापना का पैगाम आज भारत ही नहीं बल्कि विश्व के पॉचों महाद्विपों के 140 देशों तक फैल चुका है । इसमें लाखों लोग सम्मिलित होकर अपने जीवन को दिव्य बनाते हुये मानवता के श्रेष्ठ संस्कारों को धारण कर देवतायीं सीढ़ी पर अग्रसर है । वर्तमान समय प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी रतनमोहिनी जी है । त्याग और तपस्या की मूर्ति दादी रतनमोहिनी जी 97 वर्श की उम्र में भी लाखों दिलों की जवां है । जिनके निर्देशन में लाखों युवा भाई बहनें अपने जीवन को समर्पित कर नये विश्व निर्माण की सेवा में सेवारत् है । प्रजापिता ब्रह्माबाबा के 57वें पूण्यतिथि पर हम सभी संकल्प करते है कि श्रेष्ठ समाज की स्थापना अर्थ उन्होने जो परिकल्पना की उसे साकार करक ही रहेंगे । ऐसी महान आत्मा की पूण्यतिथि पर भारत ही नहीं पूरी दूनिया में विश्व शांति एवं सद्भावना के लिये हजारों कार्यक्रम आयोति कर प्रार्थना सभायें आयोजित की जायेगी । उस महान विभूति को शत्-शत् नमन करते है। ईएमएस, 17 जनवरी, 2025