आदिशक्ति माँ काली से माँ कामाख्या तक,आधुनिक भारत की रेल-यात्रा की स्वर्णिम गाथा मालदा की धरती पर उस दिन केवल उद्घाटन और शिलान्यास का औपचारिक दृश्य नहीं रचा गया, बल्कि भविष्य की ओर बढ़ते भारत की एक सशक्त तस्वीर उकेरी गई* पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी भारत को जोड़ने वाला यह क्षण उस दृष्टि का प्रतीक बना,जिसमें संपर्क को ही समृद्धि की पहली शर्त माना गया है। भारत की विकास यात्रा में रेलवे की भूमिका सदैव केंद्रीय रही है।यह केवल आवागमन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक गतिशीलता, आर्थिक विस्तार और राष्ट्रीय एकता की सबसे मजबूत कड़ी है।आज पं० बंगाल की ऐतिहासिक घरती मालदा से प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने ₹3,250 करोड़ से अधिक की रेल और सड़क अवसंरचना परियोजनाओं के लोकार्पण व शिलान्यास किया।जिससे यह स्पष्ट हो गया कि विकास अब केवल योजनाओं की भाषा नहीं,बल्कि धरातल पर उतरती हुई वास्तविकता है।प्रधानमंत्री द्वारा इस अवसर पर दिया गया औजस्वी उद्बोधन में महज़ घोषणाओं का संग्रह नहीं था।उसमें यह भाव स्पष्ट झलकता था कि पश्चिम बंगाल की प्रगति को अब टुकड़ों में नहीं,बल्कि समग्र दृष्टि से आगे बढ़ाया जा रहा है।नई रेल सेवाएँ,उन्नत रखरखाव सुविधाएँ और आधुनिक अवसंरचना—ये सभी प्रयास उस विश्वास को मजबूत करते हैं कि विकास का लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए। नई रेल सेवाओं के आरंभ से आम नागरिक की यात्रा सुगम होगी, व्यापार और वाणिज्य को गति मिलेगी तथा युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास के अवसर सृजित होंगे।रेल अब केवल दूरी घटाने का माध्यम नहीं,बल्कि संभावनाओं को जोड़ने का सेतु बनती जा रही है।आज के इस पूरे कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक और प्रतीकात्मक पक्ष देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन का शुभारंभ रहा।आदिशक्ति माँ काली की धरती से माँ कामाख्या की धरती तक दौड़ती यह ट्रेन केवल दो भौगोलिक बिंदुओं को नहीं जोड़ती, बल्कि आस्था, संस्कृति और आधुनिकता को एक सूत्र में पिरोती है।जो भारतीय रेल के इतिहास में एक नया अध्याय है,जहाँ तकनीक और परंपरा एक साथ यात्रा कर रही हैं। वंदे भारत स्लीपर ट्रेन लंबी दूरी की यात्रा की परिभाषा बदलने जा रही है।आराम,सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं से युक्त यह ट्रेन उस भारत की झलक देती है,जो विकसित राष्ट्र के रूप में अपने परिवहन मानकों को नए स्तर पर ले जा रहा है। प्रधानमंत्री के उद्बोधन में यह भाव उभरकर सामने आया कि आज का भारत अब दूसरों की ओर देखकर आकांक्षा नहीं करता,बल्कि स्वयं उदाहरण गढ़ रहा है।कभी विदेशी ट्रेनों की तस्वीरें देखकर मन में उठने वाली चाह अब आत्मविश्वास में बदल चुकी है। ‘मेक इन इंडिया’ की भावना से निर्मित वंदे भारत ट्रेनें इस आत्मनिर्भरता का ठोस प्रमाण हैं। विदेशी पर्यटकों द्वारा भारतीय रेल के बदलते स्वरूप को कैमरे में कैद किया जाना इस परिवर्तन की वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है। भारतीय रेल आज व्यापक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। विद्युतीकरण,स्टेशन पुनर्विकास,तेज़ रफ्तार ट्रेनों का विस्तार और आधुनिक तकनीक का समावेश—ये सभी प्रयास रेल को अधिक सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल बना रहे हैं।देशभर में 150 से अधिक वंदे भारत ट्रेनों का संचालन इस बदलाव की ठोस तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल को मिली चार नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें—न्यू जलपाईगुड़ी–नागरकोइल, न्यू जलपाईगुड़ी–तिरुच्चिरापल्ली, अलीपुरद्वार–बेंगलुरु और अलीपुरद्वार–मुंबई—उत्तर बंगाल की कनेक्टिविटी को ऐतिहासिक मजबूती देंगी। ये ट्रेनें केवल यात्रियों को नहीं, बल्कि संभावनाओं को दक्षिण और पश्चिम भारत तक पहुँचाएँगी।गंगासागर, दक्षिणेश्वर और कालीघाट जैसे तीर्थस्थलों की यात्रा अब और सहज होगी,वहीं तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से संपर्क मजबूत होने से व्यापार, शिक्षा और रोजगार के नए द्वार खुलेंगे।यह संपर्क ही वह आधार है, जिस पर आर्थिक विकास की स्थायी इमारत खड़ी होती है। मोदी के उद्बोधन में यह बात विशेष रूप से रेखांकित हुई कि भारतीय रेल अब केवल आधुनिक नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भी बन चुकी है। आज भारत अमेरिका और यूरोप से अधिक लोकोमोटिव का निर्माण कर रहा है और यात्री ट्रेन व मेट्रो कोच अनेक देशों को निर्यात कर रहा है। यह उपलब्धि देश की तकनीकी क्षमता,औद्योगिक आत्मविश्वास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उसकी सशक्त उपस्थिति को दर्शाती है। मालदा कार्यक्रम के अंतर्गत जिन चार प्रमुख रेल परियोजनाओं की आधारशिला रखी गई—बलुरघाट– हिली नई रेल लाइन,न्यू जलपाईगुड़ी में अत्याधुनिक फ्रेट रखरखाव सुविधा,सिलीगुड़ी लोको शेड का उन्नयन और जलपाईगुड़ी जिले में वंदे भारत ट्रेन रखरखाव सुविधाओं का आधुनिकीकरण—वे उत्तर बंगाल के भविष्य को नई दिशा देंगी।यात्री और माल परिवहन की क्षमता बढ़ेगी, लॉजिस्टिक्स अधिक दक्ष होगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे।इसके साथ ही न्यू कूचबिहार– बमनहाट और न्यू कूचबिहार– बॉक्सीरहाट रेल खंडों का विद्युतीकरण राष्ट्र को समर्पित किया जाना इस बात का संकेत है कि स्वच्छ और ऊर्जा-कुशल परिवहन अब विकास नीति का अभिन्न अंग बन चुका है। समग्र रूप से देखें तो मालदा से शुरू हुई यह पहल केवल एक दिन का आयोजन नहीं,बल्कि आने वाले दशकों की विकास यात्रा का संकेत है। प्रधानमंत्री का उद्बोधन इस तथ्य को बार-बार रेखांकित करता है कि भारत को जोड़ना प्राथमिकता है और दूरियों को कम करना ही नही वह तो एक राष्ट्रीय मिशन है - जो माँ काली से माँ कामाख्या तक दौड़ती वंदे भारत स्लीपर ट्रेन इसी मिशन की सबसे सशक्त प्रतीक बनकर सामने आती है—जहाँ आस्था, आधुनिकता और विकास एक साथ आगे बढ़ रहे हैं।यही वह भारत है,जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहकर,भविष्य की ओर पूरे आत्मविश्वास के साथ बढ़ रहा है।आदिशक्ति माँ काली से माँ कामाख्या तक,आधुनिक भारत की रेल-यात्रा की स्वर्णिम गाथा मालदा की धरती पर उस दिन केवल उद्घाटन और शिलान्यास का औपचारिक दृश्य नहीं रचा गया, बल्कि भविष्य की ओर बढ़ते भारत की एक सशक्त तस्वीर उकेरी गई। विनोद कुमार सिंह, ईएमएस, 17 जनवरी, 2025