भारत की विदेश नीति का सवाल केवल इस बात का नहीं है कि हम विदेशी राष्ट्राध्यक्षों का कैसे स्वागत करते हैं। असली सवाल यह है कि हमारी नीति का आधार क्या है और वह भारतीय हितों को कितना साध पा रही है। लंबे समय से भारत की नीति का दावा रहा है कि वह रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-सम्बंधन पर टिकी है। यानी अमेरिका से तकनीक, रूस से रक्षा, चीन से व्यापार और यूरोप से निवेश—हर जगह हाथ बढ़ाना। लेकिन व्यवहार में यह नीति अक्सर गले मिलने की तस्वीरों और झप्पियों में उलझ जाती है। 2025 में अमेरिका के साथ संबंधों में बड़ी चुनौतियाँ आईं। ट्रम्प प्रशासन ने 25% शुल्क भारतीय वस्त्र, रत्न और समुद्री उत्पादों पर लगाया। इसके साथ ही जीएसपी (सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली) का दर्जा भी भारत से छीन लिया गया, जिससे भारतीय निर्यातकों को बड़ा नुकसान हुआ। प्रधानमंत्री की ट्रम्प से झप्पी ने दोस्ती का संदेश दिया था, लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो व्यापारिक असफलता और ऊँचे शुल्क ही हाथ लगे। रूस से तेल आयात बढ़ा, लेकिन उसका लाभ आम भारतीय को नहीं मिला। नवंबर 2025 में भारत ने रूस से 7.7 मिलियन टन तेल आयात किया, जो कुल आयात का 35 प्रतिशत था। दिसंबर में यह घटकर €2.3 बिलियन रह गया। कंपनियों ने फायदा उठाया, लेकिन नुकसान की भरपाई आम जनता की जेब से हुई। चीन के साथ भारत की स्थिति और भी जटिल रही। यह तनातनी नई नहीं बल्कि पुरानी है। दलाई लामा से मुलाक़ात के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल आया था और प्रधानमंत्री उनसे मिले थे। इस पर चीन ने कड़ी आपत्ति जताई और वहाँ के विदेश मंत्री ने विशेष रूप से नाराज़गी व्यक्त की। आज भी चीन भारत के दरवाज़े पर मौजूद है, लेकिन भारत का रुख अस्पष्ट है। 2025 में भारत–चीन व्यापार रिकॉर्ड 155.62 अरब डॉलर तक पहुँचा। भारत का निर्यात 19.75 अरब डॉलर रहा, जबकि चीन से आयात 135.87 अरब डॉलर तक पहुँच गया। यानी भारत का व्यापार घाटा 116.12 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया। यह आँकड़ा बताता है कि भारत चीन पर भारी निर्भर है—विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रसायन जैसे क्षेत्रों में। इसके अलावा कृषि क्षेत्र में भी भारत की निर्भरता स्पष्ट है: भारत को यूरिया का 85% चीन से मिलता है और अन्य दुर्लभ तरल उर्वरक भी चीन से ही आते हैं। व्यापारिक असंतुलन के साथ-साथ सीमा पर चीन की गतिविधियाँ भारत के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। गलवान की घटना के बाद भी चीन ने देपसांग और देमचोक जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सैन्य मौजूदगी बनाए रखी। पेंटागन की 2025 रिपोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि चीन पाकिस्तान और बांग्लादेश में पीएलए बेस बनाने की योजना बना रहा है, जिससे भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर सीधा खतरा है। वेनेज़ुएला में अमेरिकी दबाव से चीन का निवेश खतरे में है—भारत के लिए यह अवसर था, लेकिन भारत चुप रहा। ईरान के मामले में भी भारत अपनी बात रखने से पीछे रहा। नतीजा यह है कि भारत सबसे बड़ा बाज़ार होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय सौदेबाज़ी में कमजोर दिखता है। भारत की विदेश नीति आज एक चौराहे पर खड़ी है। गले मिलने की कूटनीति से तस्वीरें तो बनती हैं, लेकिन सौदे नहीं। स्पष्ट रुख से दबाव बनाने का मौका मिलता है, लेकिन भारत अक्सर चुप रहता है। व्यंग्य यही है कि भारत हर विदेशी नेता का स्वागत करके यह जताना चाहता है कि वह सबका मित्र है। लेकिन मित्रता और हित में फर्क होता है। जब तक भारत अपने हितों को स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखेगा, तब तक झप्पियों का सच आम जनता की जेब में ही निकलेगा। बॉक्स आइटम 2025 में भारत–चीन व्यापार रिकॉर्ड 155.6 अरब डॉलर तक पहुँचा, लेकिन भारत का घाटा 116 अरब डॉलर रहा। सीमा पर चीन की घुसपैठ और सैन्य मौजूदगी ने भारत की विदेश नीति को और उलझा दिया। साथ ही भारत की कृषि निर्भरता भी सामने आई—यूरिया का 85 प्रतिशत और दुर्लभ तरल उर्वरक चीन से ही आते हैं। ईएमएस / 17 जनवरी 26