इंदौर (ईएमएस)। इंदौर की गलियों से लेकर पत्रकारिता के गलियारों तक, जिनकी लेखनी की धमक दशकों तक सुनाई दी, वह आवाज आज शांत हो गई। वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश रेखे का 88 वर्ष की आयु में देवलोकगमन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उस जीवित पुस्तकालय का बंद हो जाना है, जिसने प्रिंट मीडिया के उतार-चढ़ाव को बहुत करीब से देखा और जिया था। 1938 में जन्मे रेखे जी का सफर संघर्ष, सिद्धांत और सादगी की त्रिवेणी था। श्री रेखे ने अपने पत्रकारीय जीवन का श्रीगणेश दैनिक जागरण से किया था। इसके बाद उन्होंने इंदौर समाचार में नगर प्रतिनिधि के रूप में शहर की नब्ज टटोली। राष्ट्रीय समाचार एजेंसी एक्सप्रेस मीडिया सर्विस में ब्यूरो प्रमुख के रूप में उनकी पारी सबसे यादगार रही, जहाँ उन्होंने समाचारों के संकलन और संपादन के नए मानक स्थापित किए। ईएमएस के प्रबंध संचालक एवं संपादक सतन कुमार जैन के अनुसार, रेखे जी के पास खबरों को परखने की एक ऐसी पारखी नजर थी, जो आज के दौर में दुर्लभ है। रेखे जी उस दौर के पत्रकार थे जब कलम की धार से समाज की दिशा तय होती थी। उन्होंने पत्रकारिता को पेशा नहीं, बल्कि एक पवित्र मिशन माना और अंत तक उसकी मर्यादा को सुरक्षित रखा। श्रद्धांजलि सभा में उन्हें पत्रकारिता का पारसमणि की संज्ञा दी गई। यह अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि उन्होंने बीते 50-60 वर्षों में पत्रकारों की तीन अलग-अलग पीढ़ियों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया। चाहे धर्म हो, संस्कृति हो, खेल का मैदान हो या सिनेमा की रंगीन दुनिया, रेखे जी हर विषय पर अधिकार के साथ लिखते थे। अपराध जगत की ऑफ द रिकॉर्ड खबरों को बिना किसी विवाद के पन्नों पर उतारना उनकी सबसे बड़ी विशेषज्ञता थी। विजय नगर स्थित अपने निवास 307 क्लिफ्टन पार्क से अंतिम यात्रा निकलने तक, रेखे जी का जुड़ाव नवांकुर पत्रकारों से बना रहा। वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने भावुक होकर बताया कि जब वे शारीरिक रूप से कमजोर हो गए थे, तब भी घर से ही फोन या मिलने आने वाले युवा पत्रकारों को वे घंटों मार्गदर्शन देते थे। वे केवल एक पत्रकार नहीं, बल्कि पत्रकार हितों के लिए लड़ने वाले एक सशक्त योद्धा और रक्षक भी थे। रेखे जी के व्यक्तित्व में जो ठहराव और विनम्रता थी, उसका मूल आधार उनकी अवतार मेहर बाबा के प्रति अटूट आस्था थी। वे बाबा के अनन्य अनुयायी थे। जीवन के कठिन से कठिन दौर में भी उन्होंने बाबा के प्रसिद्ध सूत्र चिंता मत करो, खुश रहो को अपने स्वभाव का हिस्सा बनाए रखा। यही कारण था कि प्रेस क्लब के कोषाध्यक्ष मुकेश तिवारी और अन्य साथियों ने उन्हें सरलता की प्रतिमूर्ति के रूप में याद किया। रविवार को रामबाग मुक्तिधाम पर जब उनके सुपुत्र निशिकांत रेखे ने उन्हें मुखाग्नि दी, तो वहां उपस्थित हर आंख नम थी। अरविंद तिवारी, सतीश जोशी, संजय त्रिपाठी, धर्मेश यशलहा और मनीष काले सहित शहर के अनेक पत्रकारों ने स्वीकार किया कि रेखे जी का रिक्त स्थान कभी नहीं भरा जा सकेगा। प्रकाश/ 18 जनवरी 2026 संलग्न चित्र : वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश रेखे (1938-2026)