एक वरिष्ठ पत्रकार चिंतक संपादक जी ने फेसबुक पर लिखा है - कल खिचड़ी खाने के पूर्व पाँच मुट्ठी चावल और पाँच मुट्ठी उड़द की दाल दान के वास्ते हर सदस्य ने निकाली थी। घर में पाँच लोग हैं। इसलिए ढेर सारी खिचड़ी, रेवड़ियाँ, घी का पैकेट दे कर कहा गया, मंदिर में दे आओ। इसमें रुपये भी थे। मंदिर गया पर वहाँ जा कर लगा, पत्थर के देवता तो आस्था के प्रतीक हैं। ये तो खाएँगे नहीं। मंदिर की प्रबंध कमेटी के लोग हर तरह के धतकर्म करते हैं, वे रख लेंगे। यदि पुजारी को दूँ तो वही कौन-सा धर्मात्मा है! इसलिए मैंने वह सारा सामान जाड़े से ठिठुरते झाड़ू लगा रही एक स्त्री को दे दिया। पत्थर की मूर्ति से क्या अपेक्षा और मंदिर के दानपात्र में डाल दो तो उस प्रबंध कमेटी के सेठ संभव है मेरी सामग्री को अपनी दुकान में ले जा कर बेच दें। मैंने निष्कर्ष निकाला कि दान वंचित को करें। भरे पेट सेठों को नहीं। अब उनकी इस टिप्पणी पर मैंने सह्रदयता से यह जबाव लिखा - देने वाला और है देवत है दिन रैन /लोग भरम मो पर करे ताको नीचे नैन। मैं ने आगे लिखा कि गीता के अनुसार सात्त्विक दान वह है जो एक हाथ से दूसरे हाथ को भी पता न चले। गीता में तीन तरह के दान बताए गए हैं एक सात्विक दूसरा राजसिक और तीसरा तामसिक। इसे आधुनिक कालखंड में इस तरह भी समझ सकते हैं राजसिक दान इन दिनों अडानी के हिस्से में आ रहा है तामसिक दान ट्रंप दादा येन-केन प्रकरेण वसूली करने पर आमादा है बचा सात्विक दान कथित अस्सी करोड़ लोगों को दीनदयाल अंत्योदय योजना से पिछले दशक से मिल रहा है जिनमें से आधे होंडा स्प्लेंडर बाइकों वैगन-आर सैंट्रो कार में बैठ कर मुफ्त का राशन लेने आते हैं और उसे बाजार में आधे पोने दाम पर बेच कर अपने राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण कर रहे हैं। अब अगर कोई श्रेष्ठ जन अपनी श्रद्धा आस्था से पांच मुठ्ठी चावल दाल मूंगफली और रेवड़ी मिला कर सुपात्र ढूंढ़ने का प्रयास करें और ढूंढ भी ले तो इस से किसी कर्मणाडी पंडित या भिखारी के परिवार का कितना भला हो सकता है? यह तो सिर्फ आत्म संतोष है बिल्कुल ऐसा कि सोना लुट गया और हम कोयले पर मुहर लगा रहे हैं। देश पूंजीपति चला रहे हैं दल बदलते हैं दिल नहीं बदलते। अटल बिहारी वाजपेयी सही बता कर गए सरकारें सब एक सी होती हैं कुछ कम खराब कुछ अधिक खराब सरकारों का मुखौटा बदलता है चरित्र नहीं बदलता क्योंकि जैसे ही सत्ता की लगाम किसी दूसरे राजनीतिक दल के पास पहुंचती है तो उसमें पिछले सत्ता धारी दूसरे दलों के कथित चरित्रवान सत्ता का आनंद उठाने के लिए एंट्री मार लेते हैं सत्ताधारी दल की मजबूरी होती है कि वह चीन की तर्ज पर विस्तार वादी नीति अपनाता है ताकि कुछ घटत बढ़त हो तो सत्ता बनी रहे और जब से विभिन्न क्षेत्रीय दलों के समर्थन और एलायंस से सत्ता पाने और चलाने का सिलसिला चला है हालात और भी रसातल में पहुंच गए हैं। अब एक गरीब वो वोट बैंक है जो जन्म से पैदा होता है और संविधान के दस साल की सीमा रेखा को 76 साल तक खींच कर मौज ले रहा है बेशक आइएएस आइपीएस सुप्रीम कोर्ट का न्यायमूर्ति बन जाए लेकिन आरक्षण की रेवड़ी को नहीं छोड़ ना चाहता इसी तर्ज पर कुछ और दबंग जाति से जुड़े होकर भी ओबीसी की मिठाई खाकर सेहत बना रहे हैं बचा कुचा बेड़ा गर्क उन अस्सी करोड़ मुफ्त के राशन खोरों में शामिल है जो पांच किलो मुफ्त राशन लेकर गरीब होने का फर्जी ढोंग कर पात्रों का हक मार रहें हैं यह सारा खेल भ्रष्ट व्यवस्था और नैतिकता के अलंबरदारों के देखरेख में चलता है और चलता रहेगा और हम मे से कुछ निरीह सज्जन हैं जो अपनी नेकी की कमाई से खरीदे पांच मुठ्ठी खिचड़ी के लिए भी सुपात्र की खोज करने की कोशिश कर रहे हैं। व्यवस्था धता बता रही है सत्ता खिलखिला रही है और आम आदमी रामराज की कल्पना में नैतिकता की नाव पर सवार होकर नीति नियंताओ की खोदी खाई से बाहर आने के लिए तिलमिला रहा है जय हो संविधान की जिसकी छत्रछाया में सब कुछ चल रहा है। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस/17/01/26