क्षेत्रीय
17-Jan-2026


रांची(ईएमएस)। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), पटना की ओर से नामकुम स्थित राष्ट्रीय द्वितीयक कृषि संस्थान (नीसा) में तीन दिवसीय 8वीं क्षेत्रीय समीक्षात्मक वार्षिक कार्यशाला शनिवार को शुरू हुई। इसमें बिहार और झारखंड के 68 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रधान हिस्सा ले रहे हैं। मुख्य अतिथि आईसीएआर, नई दिल्ली के उपमहानिदेशक (कृषि विस्तार) डॉ. राजवीर सिंह ने बताया कि वर्तमान में हर केवीके से औसतन 110 गांवों के किसान जुड़े हैं, जिसे 2030 तक 200 गांवों तक पहुंचाने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि जल्द ही प्रगतिशील किसानों और कृषि हितधारकों को एक मंच पर लाने के लिए धन धान्य योजना लॉन्च की जाएगी।डॉ. सिंह ने बताया कि बिहार मक्का उत्पादन में अव्वल है और वहां मखाना की खेती 12 हजार से बढ़कर 40 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है। इसी तरह झारखंड सब्जी उत्पादन में अग्रणी है और यहां अगले दो वर्षों में दलहन-तिलहन क्षेत्र को 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की आवश्यकता है। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एससी दुबे ने केवीके को मॉडल विलेज विकसित करने और राईस फैलो लैंड तकनीक को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। बासु, पटना के कुलपति डॉ. इंद्रजीत सिंह ने स्थानीय पारंपरिक तकनीकों के विस्तार पर जोर दिया। आरके मिशन के सचिव स्वामी भवेशानंद ने झारखंड में प्राकृतिक खेती की सफलता और उत्पादकता बढ़ाने पर चर्चा की। धानुका समूह के मुख्य सलाहकार डॉ. पीके चक्रवर्ती ने कृषि संस्थानों के साथ एग्रो इंडस्ट्रीज के समावेशन को भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया। इस अवसर पर बीसीकेवी के पूर्व कुलपति डॉ.एमएम अधिकारी, नीसा के निदेशक डॉ.अंजनी कुमार ने भी विचार साझा किए। कार्यक्रम में कई पुस्तकों का विमोचन किया गया और उत्कृष्ट योगदान के लिए डॉ. संजय पांडेय को सम्मानित किया गया। मौके पर डॉ. विशाल नाथ, डॉ. अरूप दास, डॉ. बीके सिंह, डॉ. सुजय रक्षित सहित कई कृषि वैज्ञानिक उपस्थित थे। संचालन डॉ. अंजेश कुमार ने किया। कर्मवीर सिंह/17जनवरी/26