लेख
18-Jan-2026
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दुनिया की राजनीति इस समय एक गहरे बदलाव के दौर से गुजर रही है। शीत युद्ध के बाद जो वैश्विक व्यवस्था बनी थी, वह अब धीरे-धीरे ढीली पड़ती दिख रही है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने-अपने स्तर पर नए सुरक्षा विकल्प तलाश रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में हाल के महीनों में जिस अवधारणा ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है, वह है तथाकथित इस्लामिक नाटो। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई रक्षा समझौता, उसमें तुर्किये की संभावित भागीदारी और अरब-इस्लामिक मंचों पर सामूहिक सुरक्षा की चर्चा ने इस विचार को नई हवा दी है। यह महज तीन देशों की आपसी नजदीकी का मामला नहीं है, बल्कि मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और वैश्विक शक्ति संतुलन पर दूरगामी असर डालने वाली प्रक्रिया का संकेत भी है। भारत के संदर्भ में यह विषय इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भारत के अधिकतर इस्लामिक देशों के साथ लंबे समय से कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते रहे हैं। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में शामिल हैं। खाड़ी देशों में करोड़ों भारतीय काम करते हैं और वहां से आने वाला धन भारतीय अर्थव्यवस्था की एक मजबूत रीढ़ है। अब तक भारत ने इन देशों के साथ राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यावहारिक और संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। लेकिन अगर इस्लामिक देशों का कोई औपचारिक सैन्य संगठन अस्तित्व में आता है, तो इस संतुलन पर असर पड़ना स्वाभाविक है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सितंबर 2025 में हुआ रक्षा समझौता इस पूरी चर्चा की बुनियाद है। इस समझौते में यह प्रावधान रखा गया कि अगर दोनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दूसरे देश पर हमला माना जाएगा। यह विचार पश्चिमी सैन्य गठबंधन की तर्ज पर है, जिसमें सामूहिक रक्षा की अवधारणा शामिल होती है। पाकिस्तान की खासियत यह है कि वह इकलौता इस्लामिक देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं। यही कारण है कि सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के लिए पाकिस्तान का साथ रणनीतिक रूप से आकर्षक बन जाता है। तुर्किये की संभावित भागीदारी इस गठजोड़ को और मजबूत रूप दे सकती है, क्योंकि तुर्किये के पास आधुनिक सैन्य तकनीक, प्रशिक्षित सेना और यूरोप तथा एशिया को जोड़ने वाली भौगोलिक स्थिति है। हालांकि यह भी सच है कि इस्लामिक देशों के बीच एक मजबूत और एकजुट सैन्य संगठन बनाना आसान नहीं है। इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि मुस्लिम देशों ने पहले भी इस तरह की कोशिशें की हैं, लेकिन वे अक्सर कागजों से आगे नहीं बढ़ पाईं। सऊदी अरब की पहल पर बना आतंकवाद विरोधी इस्लामिक सैन्य गठबंधन हो या इस्लामिक सहयोग संगठन के भीतर संयुक्त सुरक्षा बल का प्रस्ताव, ये सभी योजनाएँ आपसी मतभेदों और राजनीतिक असहमति के चलते ठंडे बस्ते में चली गईं। शिया और सुन्नी विभाजन, क्षेत्रीय नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और बाहरी शक्तियों से जुड़े हित इन प्रयासों की सबसे बड़ी बाधा रहे हैं। मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति इस बहस को और जटिल बना देती है। इजराइल की हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। कई इस्लामिक देशों पर हुए हमलों के बाद अरब दुनिया में यह भावना गहरी हुई है कि उनकी सुरक्षा केवल बाहरी शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। तेल संपन्न खाड़ी देशों के पास धन की कमी नहीं है, लेकिन परमाणु या अत्याधुनिक रणनीतिक हथियारों के मामले में वे कमजोर हैं। ऐसे में पाकिस्तान जैसे देश के साथ खड़ा होना उन्हें एक तरह की सुरक्षा ढाल का एहसास देता है। भारत के लिए यह परिदृश्य चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से इस्लामिक मंचों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ माहौल बनाने के लिए करता रहा है। कश्मीर मुद्दे को इस्लामिक सहयोग संगठन की बैठकों में उठाया जाना और आतंकी घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय रंग देने की कोशिशें इसका उदाहरण हैं। विदेश मामलों के जानकार डॉ. राजन कुमार का मानना है कि भारत कभी नहीं चाहेगा कि इस्लामिक देशों के बीच कोई औपचारिक सैन्य संगठन बने, खासकर तब जब उसमें पाकिस्तान जैसी भूमिका हो। पाकिस्तान का परमाणु दर्जा उसे इस्लामिक दुनिया में एक अलग तरह की हैसियत देता है, जिसका इस्तेमाल वह अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए कर सकता है। अगर भविष्य में इस्लामिक नाटो जैसा कोई संगठन बनता है और उसमें सामूहिक रक्षा का सिद्धांत लागू होता है, तो भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी संभावित संघर्ष का दायरा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित न रहकर बहुपक्षीय रूप ले सकता है। तुर्किये पहले ही कई मौकों पर पाकिस्तान के समर्थन में खुलकर सामने आ चुका है। रिटायर्ड वायुसेना अधिकारियों और रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा संगठन केवल भारत ही नहीं, बल्कि इजराइल, आर्मेनिया और साइप्रस जैसे देशों के लिए भी नई चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है। इसी कारण भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी कूटनीतिक रणनीति को और व्यापक बनाया है। ग्रीस और साइप्रस जैसे देशों के साथ रक्षा और रणनीतिक सहयोग बढ़ाना, इजराइल के साथ रिश्तों को और मजबूत करना, और पश्चिम एशिया में संतुलित नीति अपनाना इसी दिशा के कदम हैं। भारत की कोशिश रही है कि वह किसी एक खेमे में बंधने के बजाय सभी के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखे। लेकिन बदलते हालात में यह संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर यह भी समझना जरूरी है कि इस्लामिक नाटो की अवधारणा फिलहाल विचार और चर्चा के स्तर पर ही है। दोहा जैसी बैठकों में इसे सिद्धांत रूप में स्वीकार जरूर किया गया है, लेकिन कोई ठोस समयसीमा या स्पष्ट ढांचा सामने नहीं आया है। इस्लामिक देशों के आपसी मतभेद इतने गहरे हैं कि उन्हें एक मंच पर लाना ही बड़ी चुनौती है, एक प्रभावी सैन्य संगठन बनाना तो उससे भी कठिन काम है। मिस्र, जॉर्डन और कतर जैसे देश अभी भी अमेरिका के बड़े सहयोगी हैं। इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों की राजनीति और प्राथमिकताएँ मध्य पूर्व से काफी अलग हैं। ऐसे में सभी का एकजुट होना आसान नहीं दिखता। फिर भी सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बढ़ती सैन्य और रणनीतिक नजदीकी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है, जिसमें क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने हितों की रक्षा के लिए नए रास्ते तलाश रही हैं। भारत के लिए यह एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि भविष्य की चुनौतियों के लिए अभी से तैयार रहना होगा, और अवसर इसलिए कि सक्रिय कूटनीति, मजबूत आर्थिक संबंधों और बहुपक्षीय संवाद के जरिए इन बदलावों को संतुलित किया जा सकता है। अंततः यह कहा जा सकता है कि ‘इस्लामिक नाटो’ फिलहाल एक उभरती हुई परिकल्पना है, न कि एक ठोस हकीकत। इसके रास्ते में कई राजनीतिक, वैचारिक और व्यावहारिक अड़चनें हैं। लेकिन जिस तरह से दुनिया का शक्ति संतुलन बदल रहा है, उसमें इस तरह की अवधारणाओं का उभरना स्वाभाविक है। भारत के लिए जरूरी है कि वह इन संकेतों को गंभीरता से समझे, अपनी रणनीति को समय के साथ ढाले और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर स्तर पर सजग रहे। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार-स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 18 जनवरी /2026