लेख
17-Mar-2026
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(18 मार्च वैश्विक पुनर्चक्रण दिवस पर विशेष आलेख) प्रतिवर्ष 18 मार्च को विश्वभर में वैश्विक पुनर्चक्रण दिवस (ग्लोबल रीसाइक्लिंग डे) मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य आम लोगों को पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) के महत्व के बारे में जागरूक करना है। वास्तव में पुनर्चक्रण हमारे ग्रह और मानवता के भविष्य को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हर वर्ष पृथ्वी अरबों टन प्राकृतिक संसाधनों का उत्पादन करती है, लेकिन एक समय ऐसा भी आएगा जब ये संसाधन या तो समाप्त हो जाएंगे या बहुत कम मात्रा में उपलब्ध रह जाएंगे। इसलिए यह आवश्यक है कि हम इस बात पर गंभीरता से विचार करें कि हम क्या फेंक रहे हैं और कैसे फेंक रहे हैं। हमें कचरे को केवल बेकार वस्तु नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक संभावित संसाधन और अवसर के रूप में देखना चाहिए। बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि पिछला दशक(वर्ष 2015 से 2024 तक) अब तक का सबसे गर्म दशक रहा है और आज पूरी दुनिया अभूतपूर्व जलवायु आपातकाल का सामना कर रही है।वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष माना गया है, जबकि उससे पहले 2023 ने भी तापमान के नए रिकॉर्ड बनाए थे। इसके अतिरिक्त 2016, 2020 और 2019 भी अत्यधिक गर्म वर्षों में शामिल हैं। वास्तव में इस बढ़ती गर्मी का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ना और मानवीय गतिविधियाँ मानी जाती हैं, जिसके कारण दुनिया भर में हीटवेव और तापमान के नए रिकॉर्ड देखने को मिल रहे हैं। हाल फिलहाल,यदि हम समय रहते महत्वपूर्ण और त्वरित परिवर्तन नहीं करते, तो वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि, हिमनदों और बर्फ की चोटियों का तेजी से पिघलना, महाद्वीपों में आग लगना, तेजी से वनों की कटाई, बाढ़, भूकंप जैसी आपदाओं की घटनाएँ बढ़ती जाएँगी। इन परिस्थितियों का सीधा प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप गरीबी बढ़ती है, विस्थापित समुदायों का पलायन होता है, नौकरियों में कमी आती है, कचरे के विशाल ढेर लगते हैं और प्राकृतिक आवास नष्ट होते जाते हैं। ऐसे में पुनर्चक्रण(रि-साइक्लिंग) एक प्रभावी समाधान के रूप में सामने आता है। वैश्विक पुनर्चक्रण दिवस की स्थापना ग्लोबल रीसाइक्लिंग फाउंडेशन द्वारा की गई थी और इसे पहली बार 18 मार्च 2018 को मनाया गया था। हर वर्ष इस दिवस के लिए एक विशेष थीम निर्धारित की जाती है। वर्ष 2025 की थीम थी- बाधाओं को तोड़ना: कचरा प्रबंधन संकट के लिए एक क्रांतिकारी खाका। जबकि वर्ष 2026 की थीम है-पुनर्चक्रण के नायक: नवाचार और कार्रवाई” (रि-साइक्लिंग हीरोज: इनोवेशन एंड एक्शन । वास्तव में, इस थीम का आशय यह है कि जो लोग(जैसे वैज्ञानिक, संगठन या पर्यावरण कार्यकर्ता) और जो संस्थाएँ तथा नई तकनीकें कचरे को दोबारा उपयोगी संसाधन में बदलने के लिए नए-नए तरीके (नवाचार) खोज रही हैं और जमीन पर ठोस कार्य (कार्रवाई) कर रही हैं, उनका सम्मान किया जाए। आज जब विश्व में पर्यावरण प्रदूषण और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं, तब कचरे को पुनः उपयोग में लाने की प्रक्रिया हमारे नीले ग्रह अर्थात पृथ्वी को सुरक्षित रखने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है। वास्तव में यह दिवस हमें यह सिखाता है कि जल, वायु, तेल, प्राकृतिक गैस, कोयला और खनिज जैसे प्रकृति के संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करना हमारा कर्तव्य है। यदि हम सरल शब्दों में समझें तो पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) का अर्थ है-किसी उपयोग की हुई या बेकार वस्तु को पुनः संसाधित करके उसे दोबारा उपयोग के योग्य बनाना। अर्थात् जिन वस्तुओं को हम उपयोग के बाद अक्सर कचरे के रूप में फेंक देते हैं, जैसे कागज़, प्लास्टिक, काँच, धातु या अन्य सामग्री, उन्हें विशेष प्रक्रियाओं के माध्यम से फिर से नई वस्तुओं में बदल देना ही पुनर्चक्रण कहलाता है। संक्षेप में कहा जाए तो री-साइक्लिंग वह प्रक्रिया है जिसमें बेकार या इस्तेमाल की हुई वस्तुओं को फिर से उपयोगी बनाया जाता है, ताकि संसाधनों की बचत हो और पर्यावरण सुरक्षित रहे।सच तो यह है कि वैश्विक पुनर्चक्रण दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान है। जब हम किसी वस्तु को ‘कचरा’ कहने के बजाय ‘संसाधन’ के रूप में देखना शुरू करते हैं, तब हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित पृथ्वी की नींव रखते हैं। आज विश्व की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है और जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ वस्तुओं और संसाधनों का उपयोग भी बढ़ता जा रहा है। जब संसाधनों का उपयोग और उपभोग बढ़ता है तो कचरे की मात्रा भी बढ़ती है, जिससे पर्यावरण पर गंभीर दबाव पड़ता है। ऐसे में पुनर्चक्रण पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक और प्रभावी उपाय बनकर सामने आता है। पुनर्चक्रण के अनेक लाभ हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों की बचत होती है, कचरे की मात्रा कम होती है, भूमि, जल और वायु प्रदूषण में कमी आती है, पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है तथा ऊर्जा की बचत होती है, क्योंकि नई वस्तु बनाने की तुलना में पुरानी वस्तुओं के पुनर्चक्रण में कम ऊर्जा लगती है। पुनर्चक्रण से कार्बन उत्सर्जन और ग्रीनहाउस गैसों में कमी आती है, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिलती है। इसके अतिरिक्त यह नए रोजगार के अवसर पैदा करता है, अर्थव्यवस्था को गति देता है और कच्चे माल की आवश्यकता को भी कम करता है। इसलिए आवश्यक है कि पुनर्चक्रण से संबंधित नीतियों और कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित किया जाए और इस क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा दिया जाए।हालाँकि, दुनिया में पुनर्चक्रण की चर्चा बहुत होती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि अभी भी बहुत कम कचरा पुनर्चक्रित हो पाता है। वैश्विक स्तर पर केवल लगभग 6.9% सामग्री ही पुनर्चक्रित हो पाती है। विश्व की अर्थव्यवस्था में उपयोग होने वाले लगभग 106 अरब टन संसाधनों में से केवल 6.9% ही पुनर्चक्रण के माध्यम से पुनः उपयोग में आ पाते हैं। प्लास्टिक पुनर्चक्रण की स्थिति और भी चिंताजनक है। दुनिया में बनने वाले प्लास्टिक का केवल 9-10% ही पुनर्चक्रित हो पाता है। वर्ष 2024 में लगभग 22 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न हुआ, लेकिन इसका बहुत छोटा हिस्सा ही सही तरीके से रीसायकल हो पाया। इसी प्रकार वर्ष 2022 में बने 400 मिलियन टन प्लास्टिक में से केवल 9.5% ही पुनर्चक्रित सामग्री से बना था। वर्तमान में विश्व में हर वर्ष लगभग 400-414 मिलियन टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है और यदि यही स्थिति बनी रही तो 2060 तक प्लास्टिक का उपयोग लगभग तीन गुना हो सकता है। वर्ष 1950 से अब तक दुनिया में 9 अरब टन से अधिक प्लास्टिक बनाया जा चुका है और हर वर्ष लगभग 350 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। इतना ही नहीं, हर साल लगभग 80 लाख टन प्लास्टिक समुद्रों में पहुंच जाता है, जो समुद्री जीवन और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है।यदि भारत की बात करें तो देश में हर वर्ष लगभग 62 मिलियन टन (6.2 करोड़ टन) कचरा उत्पन्न होता है, लेकिन इसमें से केवल लगभग 25% कचरा ही प्रोसेस या पुनर्चक्रित किया जाता है, जबकि लगभग 75% कचरा बिना प्रोसेस के ही रह जाता है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ई-कचरा उत्पादक देश है और वर्ष 2023–24 में देश में लगभग 17 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ। उल्लेखनीय है कि भारत में पुनर्चक्रण का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा किया जाता है। देश में लगभग 15 लाख कचरा बीनने वाले लोग इस कार्य में लगे हुए हैं, जो पुनर्चक्रण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। अंततः कहा जा सकता है कि पुनर्चक्रण से कच्चे माल के निष्कर्षण, शोधन और प्रसंस्करण की आवश्यकता कम हो जाती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण संभव होता है। यही कारण है कि आज पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को सातवां संसाधन माना जाने लगा है, जो सतत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को संसाधन के रूप में मान्यता देने से जिम्मेदार उपभोग और प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में प्रोत्साहन मिलता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम पुनर्चक्रण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं, ताकि वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी पृथ्वी के संसाधन सुरक्षित रखे जा सकें। सुनील कुमार महला/17मार्च2026