ठंड वैसी नहीं है, जैसी पांच - छह दिन पहले थे। सूरज ठीक समय पर उग आता है। शिशिर के उतरते जाने से वसंत दृश्य होने लगा है। सुबह सुबह बगीचे की एक ठूंठ पर एक कौआ बैठा था। नीचे मैना का युद्ध चल रहा था। वे पता नहीं किस आपसी दुराव के कारण आपस में गुत्थमगुत्था थीं। शायद वे मनुष्य को देखते देखते उसकी आदतें सीख गई थीं या वे आपस में खेल रहीं थीं। जो भी हो। उन्हें आपस में उठा पटक करते अच्छा नहीं लग रहा था। बगीचे में हजारों पेड़ हैं और सूरज की सुनहरी किरणें उनकी फुनगियों पर झिलमिल कर रही थीं। प्रकृति सौंदर्य का अनंत कोष लिए हर दिन हाजिर रहती है। हम सब परेशान लोग हैं। प्रकृति के सौंदर्य से क्या लेना देना? हमें तो परेशान होना है या परेशान करना है। अपनी गली में ही देखता हूं। कोई गली में पानी गिरा रहा है। कोई घर की गंदगी गली में डाल रहा है। गली का कुत्ता भी कहीं बैठता है तो पूंछ से साफ कर लेता है, लेकिन बहुतेरे मनुष्य इतना भी नहीं कर पाते। जहां मैं रहता हूं, उस तक पहुंचने के लिए बारह फीट की सड़क है। एकाध लोगों को छोड़ कर सबने गली के कुछ हिस्से पर कब्जा जमा रखा है। किसी ने सेप्टिक टैंक बना लिया, किसी ने सीढ़ी बना ली, किसी ने देहरी बढ़ा दी। कोई गाय पाल रहा है और गोबर- मूत्र गली में ही दहा रहा है। पेड़, सूरज की किरणें, चिड़िया, हवा में नाचती पत्तियों में तो सौंदर्य मिल सकता है, लेकिन मनुष्य समाज सौंदर्यहीन हो रहा है। मनुष्य का सौंदर्य तो करूणा में है। संवेदनशीलता में है। सम्मान और सौहार्द में है, लेकिन मनुष्य में विद्रूपताएं भी बहुत हैं। वह दोनों के बीच झूलता रहता है। अपनी बीबी को टुकड़े टुकड़े कर फ्रिज में डाल दे या किसी ईमानदार पत्रकार को कुटिया कर सेप्टिक टैंक में डाल दे या कोई अपनी बेटी को गंडासे से इसलिए काट दे कि उसने दूसरी जाति के लड़के से शादी क्यों रचा ली या कोई संतान अपने पिता को धकिया कर घर से निकाल दे तो उस समाज में सौंदर्य कितना बचता है? अमानवीयता में कुरूपता है और संवेदना में सौंदर्य है। मनुष्य प्रकृति को खदेड़ता जा रहा है। वह जिसके कारण जीवित है, उसके खिलाफ ही युद्ध ठान रखा है। उसे शुद्ध पानी चाहिए, लेकिन नदी, सागर और तालाब को गन्दा करने में लगा है। शुद्ध हवा चाहिए तो वह जंगल को ही उजाड़ने में लगा है। कचरे और प्रदूषित हवा कारखानों से निकलते हैं और वातावरण को तबाह करते हैं। मनुष्य ने जल, जमीन और जंगल के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। वह आजकल दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावनाएं ढूंढ रहा है। देश एक कातर व्यक्ति में संभावनाएं ढूंढ रहा है। अजब गजब खेल चल रहा है। हीन ग्रंथि के शिकार लोग बड़े बड़े पदों पर पहुंच गए हैं और चमचे - बेलचे कसीदे काढ़ रहे हैं। कबीरदास की उल्टी बानी, भींगे कंबल, बरसे पानी। मनुष्य कहीं संतुष्ट नहीं दिखता। अमेरिका का राष्ट्रपति हो या भारत का प्रधानमंत्री - उनके व्यवहार में शांति नाम की कोई चीज नहीं है। शायद सत्ता असंतुष्टों को ही प्राप्त होता है। असंतुष्टों की भी एक संस्कृति होती है। वे भी संतुष्ट होने के लिए तमाम तरह के उद्यम करते हैं। हर उद्यम उन्हें और असंतुष्ट कर देता है। संतुष्ट लोग यों भी कम संख्या में होते हैं। हालत यह है जिन साधुओं को माना जाता था कि वे सबसे संतुष्ट प्राणी हैं, आजकल वे सबसे ज्यादा असंतुष्ट हैं। उनके अंदर नफरत की नाली बह रही है और उसमें बजबजा रहे हैं कीड़े। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 18 जनवरी /2026