शिवजी क्या सिर्फ विराट मंदिरों में ही रहते हैं ? छोटे छोटे मंदिर क्या उनकी पसंदीदा जगह नहीं है? बनारस में सैकड़ों सालों के अनेक मंदिर तोड़े गए। सरकार को ये मंदिर खटक रहे थे। सरकार चाहती थी कि इन भद्दे मंदिरों की जगह खूबसूरत कॉरिडोर बने। सरकार को छोटे-छोटे मंदिरों के देवता देवता नजर नहीं आते। दुर्भाग्य यह है कि छोटे छोटे मंदिरों के देवता विद्रोही भी नहीं होते कि तोड़ने वाले बुल्डोजर या बुल्डोजर के पीछे के हाथ को शाप ही दे दें! छोटे छोटे मंदिर टूटते रहे। भक्तगण भी चुप रहे और मंदिरों के देवता ने भी चांय - चूं नहीं किया। शिवजी को बनारस बहुत प्रिय है। सच कहिए तो शिवजी को बहुत नफासत पसन्द नहीं है। भांग - धतूरा खाते हैं, गले में सर्प लटकाये रहते हैं, हाथ में त्रिशूल लिए गांव - गली घूमते हैं, वे भला क्या जाने कि उन्हें कौन पूज रहा है, किस मन से पूज रहा है। भोले - भंडारी हैं। उनपर बेलपत्र भी चढ़ा दें तो वे ना नुकुर नहीं करते। इतने सहज देवता तो कोई है नहीं, लेकिन भोलेनाथ को क्या पता कि उन्हें पंच सितारा सुख दिया जा रहा है। शिवजी अगर भोले हैं तो समय पाकर तांडव भी करते हैं। कहना चाहिए कि उनका विस्तार अद्भुत है। वे नाश और निर्माण दोनों का पावर रखते हैं। तथाकथित समाजवादी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कैथवालिया पहुंचे और सबसे बड़े शिवलिंग ( 33 फीट) की पूजा - अर्चना की। जिस विश्वविद्यालय में नीतीश कुमार ने पढ़ाई की है, वे खंडहर बनते जा रहे हैं। नीतीश जी जानते हैं कि बिहार की उन्नति मंदिरों से नहीं, विश्वविद्यालयों से होगी। वैसे भी नीतीश कुमार कोई ऊंचे दर्जे के भक्त नहीं हैं। टीका चंदन उनका प्रिय लिवास नहीं है। अगर इस अवसर पर दिल्ली के पुजारी आते तो शिवजी भी धन्य हो जाते कि आधुनिक युग के कोई ड्रामेबाज भक्त पाकर। पंडितों ने भी गजब कहर बरपा रखा है। ठंड है तो मंदिरों के देवता कांपने लगते हैं। पंडित ऊनी कपड़े का इंतजाम करते हैं। गर्मी है तो एयरकंडीशन। देवताओं के लिए हर मौसम में यथोचित इंतजाम है। देवता खुश, पंडित खुश। गांव - गलियों में जब लड़कियों का बलात्कार होता है। उनकी चीखें और मां बाप की पीड़ा किसी की चेतना को झिंझोड़ नहीं पाती। ऐसे भी आधुनिक पंडित हैं, जो बलात्कार और हत्या के जुर्म में पकड़े जाते हैं। वे जेल के अंदर और बाहर आते जाते रहते हैं। कोई राम रहीम हैं। उन्हें पेरोल पर पंद्रह तफा छोड़े गए, लगभग एक साल। उन्हें तो जेल ससुराल का सुख दे रहा है। कोई जेलों में यों ही सड़ रहा है, बिना जुर्म के। जिस पर जुर्म सिद्ध है, लेकिन वे प्रसिद्ध हैं, जेल जा और आ रहे हैं। कानून भी अस्थिर है और चंचल है। वह आदमी के रुतबे का शिकार है। जैसा रूतबा, वैसे कानून के व्यवहार। आधुनिक राज्य के नागरिकों का एक समूह तो और अद्भुत है। बलात्कारी जालसाजी कर जेल से बाहर आते हैं और नागरिकों का एक समूह उसके लिए माला लिए खड़ा रहता है। बलात्कार करना भी एक गुण है। समाज में जब गिरावट आती है तो कोई मंदिर या मस्जिद थाम नहीं पाता। मंदिरों के देवता तो निस्पृह होते हैं। डकैत भी डकैती के पूर्व मंदिरों में पूजा करने आ जाते हैं और देवताओं से डकैती के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। लोकतंत्र के डकैत भी उनसे कमतर नहीं हैं। डकैती के लिए वे क्या क्या नहीं करते! गांव के डकैत तो डरते भी हैं कि पता नहीं, किस कोने से गाली चल जाये और उसका कलेजा चाक हो जाये। मगर लोकतंत्र के डकैत तो जब्बर होते हैं। सीना तान कर भजन भी करते हैं और भाषण भी देते हैं। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 19 जनवरी /2026