लेख
19-Jan-2026
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खबर है कि इस साल नीट पीजी (पोस्ट ग्रेजुएट) में हजारों सीटें खाली रह जाने के कारण नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडीकल साइंसेज (NBEMS) ने कट ऑफ को घटाकर (माइनस)- 40 पर्सेंटाइल कर दिया है। यानी जीरो पर्सेंटाइल से भी 40 कम। इसे समझने के लिए नीट पीजी परीक्षा का मूल्यांकन समझना जरूरी है। देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक इस परीक्षा में कुल 800 अंक होते हैं जिसमें 200 मल्टीपल चॉइस प्रश्न पूछे जाते हैं। मूल्यांकन में माइनस मार्किंग भी की जाती है ताकि कोई सिर्फ अनुमान के आधार पर सवाल का जवाब चुन कर अंक हासिल करने की जुर्रत न करे। इसीलिए एक सही जवाब पर यदि 4 अंक दिए जाते हैं तो एक गलत जवाब पर 1 अंक काट लिया जाता है। एक रोचक परिस्थिति यह है कि कोई परीक्षार्थी एक भी प्रश्न का जवाब न दे तो भी उसे जीरो पर्सेंटाइल प्राप्त होना निश्चित है। दूसरे शब्दों में बिना कोई भी किताब पढ़े या बिना किसी तैयारी के कोई भी परीक्षार्थी जीरो पर्सेंटाइल हासिल कर सकता है। और कट ऑफ घटाने के नए फरमान के बाद तो कोई परीक्षार्थी सिर्फ दिल बहलाने के लिए परीक्षा दे, कंप्यूटर पर आंसर शीट में एक भी सही जवाब न दे सके और चालीस प्रश्नों के गलत जवाब दे तो भी पीजी करने की पात्रता रखता है। इन मापदण्डों पर हमारा सिस्टम कैसे डॉक्टर तैयार करना चाहता है, यह सामान्य समझ से परे और गहरी चिन्ता का विषय है। खेदजनक तथ्य यह है कि आम जनता इस खतरनाक खेल से बिल्कुल बेखबर है। बेशुमार प्राइवेट मेडीकल कॉलेज खोलने के साथ साथ लगभग सभी राज्य सरकारें राजनीतिक शिगूफे के तौर पर हर छोटे बड़े शहर में सरकारी मेडीकल कॉलेज भी खोलते जा रही हैं। इन नए नए मेडीकल कॉलेजों में न ही वांछित इन्फ्रास्ट्रक्चर है और न ही डॉक्टर एवं स्टॉफ। मगर हर साल हजारों डॉक्टर बदस्तूर डिग्री लेकर निकल रहे हैं। अनुभवी शिक्षकों और सभी प्रकार के मरीजों के अभाव में ये छात्र अधकचरा ज्ञान प्राप्त करके भी मरीजों का उपचार करने के लिए अधिकृत हैं। इनकी गुणवत्ता संदिग्ध है और ये निश्चित तौर पर खतरे से अनभिज्ञ मरीजों की जान के लिए खतरा बनेंगे। अभी लोग भूले नहीं हैं कि इस सदी के शुरुआत में किस तरह हजारों इंजीनियरिंग कॉलेज खुले और आखिर छात्रों के अभाव में बंद भी हो गए। गुणवत्ता का हाल यह था कि बमुश्किल 17- 18 फीसदी ग्रेजुएट किसी रोजगार के काबिल थे। मगर मेडीकल कॉलेज में शिक्षा का स्तर इस तरह गिराना सीधे मरीजों की जान से खेलने के समान है। लेकिन फ़िक़्र किसे है? स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की बेलगाम महत्वाकांक्षा ने सरकारों की बुद्धि भ्रष्ट कर दी है और जमीनी हकीकत से अनजान नेता और अफसर अंधाधुंध मेडीकल कॉलेज खोलने की अनुमति देते जा रहे हैं। सरकार की मंशा के अनुरूप मेडीकल शिक्षा की नियामक संस्था राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) ने मेडिकल कॉलेज खोलने के पैरामीटर बहुत शिथिल कर दिए हैं लेकिन उसके बावजूद अधिकांश मेडीकल कॉलेज सारे पैरामीटर पूरे नहीं करते। मगर खुद एनएमसी की मेहरबानी है कि सबको लाइसेंस मिल जाता है और उसका नवीनीकरण भी हो जाता है। इसी का नतीजा है कि अब देश में लगभग 800 मेडिकल कॉलेज खुल चुके हैं जिनमें MBBS की लगभग सवा लाख और पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजी) की लगभग 80 हजार सीटें उपलब्ध हैं। लगभग सभी प्राइवेट मेडीकल कॉलेज राजनेताओं और रसूखदार धनाढ्यों द्वारा पोषित और संचालित हैं इसलिए सिस्टम ने सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद कर रखी हैं। अब अगर सीटें खाली रहती हैं तो उतने छात्रों की फीस का घाटा है और जाहिर है कि मेडीकल कॉलेज खोलने और चालू रखने में भारी लागत के चलते कोई भी मालिक घाटा सहने को तैयार नहीं है। सो लाजिमी है कि सरकार पर दबाव होना ही था कि सीटें खाली न जाएं। बहरहाल कट ऑफ की पेशकश की गई और NBEMS द्वारा फौरन समस्या का समाधान कर दिया गया। सरकारी पक्ष यह है कि ज्यादा से ज्यादा डॉक्टर पढ़कर निकलेंगे तो स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होगा। मगर हक़ीक़त यह है कि नाकाबिल डॉक्टर्स की फौज स्वास्थ्य सेवाओं का बंटाढार करेगी। असल समस्या ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की है जहां ये पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रीधारी डॉक्टर जायेंगे ही नहीं। पीजी डिग्रीधारी ये सभी डॉक्टर प्राइवेट क्लीनिक या छोटे बड़े अस्पतालों में सेवाएं देंगे। वांछित योग्यता और उचित शिक्षा के अभाव में इनकी गुणवत्ता पर संदेह स्वाभाविक है। भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि करत करत अभ्यास के, जड़मति होय सुजान इसीलिए शायद सरकार ने योग्यता की जरूरत खत्म करने का निर्णय लिया हो। लेकिन संदेह यह है कि अधिकांश कॉलेजों के अधूरे इन्फ्रास्ट्रक्चर में शिक्षकों के बिना अभ्यास करने वाले ये जड़मति कितना सीख पाएंगे? आम नागरिक किसी नाम के पहले डॉक्टर की पदवी पढ़कर ही आश्वस्त हो जाता है कि उसे उचित इलाज मिलेगा। मगर वह इस तथ्य से अनजान ही रहेगा कि उक्त डॉक्टर को नीट पीजी में माइनस 40 पर्सेंटाइल अंक प्राप्त हुए थे। हो सकता है भविष्य में डॉक्टर के साइन बोर्ड पर डिग्री के साथ नीट पीजी के अंक प्रदर्शित करने की मांग उठे ताकि मरीज उसकी काबिलियत का अनुमान लगा सकें। कई डॉक्टर अपनी योग्यता का डंका पीटने के लिए नाम और डिग्री के साथ गोल्ड मेडलिस्ट वगैरह लिखते हैं। इसी तर्ज पर यह कानून बनाया जाना भी जरूरी है कि साइन बोर्ड पर नाम और डिग्री के साथ नीट पीजी के पर्सेंटाइल लिखना भी अनिवार्य हो। राजनेता और आला अफसर अपना इलाज देश के सबसे महंगे अस्पतालों में सरकारी खर्च पर करवाते हैं। कुछ तो भारत की चिकित्सा व्यवस्था पर भरोसा ही नहीं करते और विदेश जाकर इलाज कराते हैं। मगर आम लोगों के इलाज के लिए माइनस 40 पर्सेंटाइल वाले डॉक्टरों की जमात तैयार की जा रही है। सरकार भले ही स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की आड़ ले लेकिन यह मेडीकल शिक्षा के नाम पर सरासर मज़ाक हो रहा है। ऐसे नाकाबिल डॉक्टरों को इलाज की छूट देना दरअसल मरीजों की जान से खिलवाड़ है। ताजातरीन खबर यह है कि NBEMS के तुगलकी फरमान को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। लेकिन सरकार की इस मनमानी के खिलाफ आखिर आम जनता को ही आवाज उठाना होगी। डॉ योगेन्द्र श्रीवास्तव /19 जनवरी2026