मौकापरस्ती आदमी के स्वभाव में है। उसका काम बन जाये, इसके लिए कितना झुकना है, कितना तनना है, इसका आकलन उसके पास रहता है। काम बनाने के लिए बोली और भंगिमा में परिवर्तन सहजता पूर्वक कर लेना ऐसे लोगों की आदत होती है। उनका प्रिय पाठ है - जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी कीजिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हिंदी पट्टी में चुनावी काम जय श्री राम से चल जाता था। बंगाल में श्री राम बहुत महत्वपूर्ण देवता नहीं हैं। उनसे वहां वोट उगाही नहीं हो सकती, इसलिए इस बार वे जय काली पर उतर आए हैं। संभव है कि वे वहां काली भक्त का ड्रेस धारण कर लें। आर एस एस के चीफ मोहन भागवत ने कहा है कि भारत धर्म के मार्ग पर चलता रहा तो वह विश्वगुरु बन जायेगा। यानी हजारों हजार वर्ष पुराना भारत देश धर्म के मार्ग पर नहीं चला। वे जब से आये हैं, भारत धर्म के मार्ग पर धड़ल्ले से चल पड़ा है। मोहन भागवत कहीं से धार्मिक नहीं लगते। हां धर्म की राजनीति जरूर करते हैं। नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत में कोई मौलिक अंतर नहीं है। दोनों ने धर्म को स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बना रखा है। पिछले कई सालों से विश्वगुरु बनने का नारा सुनाई पड़ता रहा है । विश्वगुरु क्यों बनना है? यह आकांक्षा ही क्यों है? भारत विश्वगुरू बनेगा तो धरती पर रहने वाले अन्य देश उसके चेले चपाटे बनेंगे? क्या उन देशों के अपने धर्म नहीं हैं? हालत यह है कि हम सबने दूसरे देशों के वस्त्र, स्वभाव और संस्कृति अपना रहे हैं। अपनी भाषा को छोड़ कर दूसरे देशों की भाषा अपना रहे हैं। आर एस एस के ही मातहत चलता है - सरस्वती शिशु मंदिर। उनके बच्चों का ड्रेस देखिए। दो चार श्लोक रटबा देने से बच्चे भारतीय बन जायेंगे और देश विश्वगुरू बन जायेगा? दरअसल विश्वगुरू बनने का सपना एक सामंती सपना है। हम धर्म के सामंत बनना चाहते हैं। शेष देश प्रजा रहेंगे और मोहन भागवत सामंत। मोहन भागवत कम से कम स्वामी विवेकानंद को ही पढ़ लेते तो विभिन्न धर्मों के प्रति सहृदय रहते। अपने ही देश ही विभिन्न धर्मावलंबियों का देश है। नगालैंड, मिजोरम, अंडमान निकोबार, त्रिपुरा आदि कई राज्य हैं, जिनके अलग-अलग धर्म, रीति-रिवाज, पहनावे और संस्कृति हैं। हम उन्हें जबर्दस्ती एकरूप नहीं कर सकते। सबसे बड़ी बात है कि धार्मिक होने के लिए जिन गुणों की जरूरत है, वे गुण दूर दूर तक उनमें प्राप्त नहीं होते। उदारता, करूणा, सत्य, अहिंसा जैसी भावनाएं न नरेंद्र मोदी जी में है, न मोहन भागवत में। हर अवसर पर अलग अलग बयान देते रहते हैं। नरेंद्र मोदी जी ने कितनी ग़लत बातें कहीं हैं और उन बातों के लिए उन्हें कोई खेद नहीं है। एक धार्मिक व्यक्ति क्या इतना झूठ बोल सकता है। आदमी से कोई ग़लती होती है तो अहसास होने के बाद माफी मांग लेता है। प्रधानमंत्री को अपनी गलत बातों के लिए कभी माफी मांगते नहीं देखा। हां, दूसरों के बारे में बयानबाजी करते रहते हैं। नाले की गैस से चाय बनाना, बीमारी ठीक करने के लिए थाली बजवाना, तक्षशिला को बिहार का हिस्सा बताना, नोटबंदी से आतंकवाद खत्म करना, बादल में रडार को छिपा देना आदि अनेक प्रसंग हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री शान से बोलते रहे हैं। क्या यह धार्मिक व्यक्ति का लक्षण है? मोहन भागवत जी का सबसे झूठा बयान है कि आर एस एस एक सांस्कृतिक संगठन है, जबकि आर एस एस सिर्फ राजनीति करता रहा है। वे हिन्दू एकता की बात करते हैं, लेकिन जाति के खिलाफ कोई अभियान नहीं चलाते। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 20 जनवरी /2026