अंतर्राष्ट्रीय
20-Jan-2026
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तेहरान (ईएमएस)। ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों ने अब एक ऐसा मोड़ ले लिया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। प्रदर्शनों की आग अब उन इमारतों तक पहुँच गई है जिन्हें इस्लाम में सबसे पवित्र माना जाता है। मस्जिदों को फूंका जा रहा है और मदरसों को आग के हवाले किया जा रहा है। एक मुस्लिम बहुल देश में, जहाँ धर्म के लिए प्राण देने की परंपरा रही है, वहां हमले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ये हमलावर वाकई प्रदर्शनकारी हैं, या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय साजिश छिपी है? ईरानी सरकार का नैरेटिव इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट है। जैसे ही मस्जिदों के जलने की खबरें आईं, सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई से लेकर राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान तक ने इसका ठीकरा विदेशी दुश्मनों और दंगाइयों के सिर फोड़ दिया। खामेनेई ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि प्रदर्शनों के दौरान अब तक 250 मस्जिदें नष्ट कर दी गई हैं। सरकार ने इन हमलावरों को दुष्ट और ट्रेंड एक्टर करार दिया है, जिनका मकसद केवल तबाही मचाना है। राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने भी सरकारी टीवी पर दिए अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि मस्जिदों में आग लगाने वाले लोग देश और विदेश में प्रशिक्षित आतंकी हैं। सरकारी मीडिया ने कुछ प्रमुख मस्जिदों की जली हुई तस्वीरें जारी करते हुए सीधा आरोप इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद के भाड़े के सैनिकों पर लगाया है। लेकिन, ईरान के भीतर चल रही बहस सरकार के इन दावों से अलग भी है। कई मानवाधिकार संगठन और विश्लेषक इन आंकड़ों को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। फ्रांस के लोरेन विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री सईद पेयवंडी इतिहास का हवाला देते हुए कहते हैं कि ईरान में पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जिन्हें फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन कहा जाता है। 1994 में मशहद में एक पवित्र मकबरे पर हुए धमाके का आरोप पहले विपक्षी समूहों पर लगा था, लेकिन सालों बाद पता चला कि इसके तार सुरक्षा तंत्र से ही जुड़े थे ताकि विपक्ष को बदनाम किया जा सके। 2021 में पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का एक वायरल वीडियो भी इस शक को पुख्ता करता है, जिसमें वे स्वीकार करते हैं कि कई बार सादे कपड़ों में सुरक्षा बल ही हिंसा भड़काते हैं ताकि प्रदर्शनकारियों पर कठोर कार्रवाई का बहाना मिल सके। समाजशास्त्रियों का मानना है कि जली हुई मस्जिदों और कुरान के फटे पन्नों को टीवी पर बार-बार दिखाना सरकार की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। इसका उद्देश्य धार्मिक भावनाओं का ध्रुवीकरण करना है। सरकार उन धार्मिक लोगों को यह संदेश देना चाहती है कि प्रदर्शनकारी आजादी नहीं, बल्कि इस्लाम का अंत चाहते हैं। शोधकर्ता हसन यूसुफी एशकौरी के अनुसार, शासन अपने विरोधियों को नास्तिक और कुरान का दुश्मन साबित कर उन्हें जनता की नजरों में गिराना चाहता है। फिलहाल, ईरान में इंटरनेट की पाबंदी और कड़ी सेंसरशिप के कारण सच्चाई की स्वतंत्र पुष्टि होना लगभग असंभव है, लेकिन जलती इमारतों के बीच ईरान का सामाजिक ढांचा बुरी तरह सुलग रहा है। वीरेंद्र/ईएमएस 20 जनवरी 2026