मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक पीड़ित महिला को बड़ी राहत दी है, जिसे वेश्यावृत्ति के धंधे में वापस जाने से रोकने के लिए बचाए जाने के बाद भी महिला सुधार गृह में रखा गया था। कोर्ट ने साफ किया कि हर पीड़ित को अपने फैसले खुद लेने का पूरा अधिकार है। सरकार या कोर्ट उसकी मर्जी के खिलाफ उस पर कोई फैसला थोप नहीं सकते और इसी के तहत बॉम्बे हाई कोर्ट ने पीड़ित महिला को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। दरअसल पुलिस ने नासिक के एक होटल पर अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम (पीटा) के तहत छापा मारा और 20 साल की एक लड़की सहित पांच महिलाओं को बचाया। बचाए जाने के बाद, उसे नियमों के अनुसार नासिक के मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने पाया कि महिला का कोई करीबी रिश्तेदार नहीं है। माता-पिता के अलग होने के बाद वह भी अलग रहने लगी थी। उसकी खराब आर्थिक स्थिति के कारण, उसे वेश्यावृत्ति के दलदल में वापस गिरने से बचाने और उसकी सुरक्षा के लिए, उसे दो साल के लिए महिला सुधार गृह में रखने का आदेश दिया गया। पीड़ित महिला ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी और अपनी रिहाई की मांग की। याचिका पर 16 जनवरी को न्यायाधीश पृथ्वीराज चव्हाण की सिंगल बेंच के सामने सुनवाई हुई। इस दौरान हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया और अपने फैसले में साफ किया कि पीड़ित महिला 20 साल की है और वयस्क है। उसे कहीं भी जाने और जहां चाहे वहां रहने की आजादी है। सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति गरीब है या उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है, उसकी आजादी छीनी नहीं जा सकती और उसे महिला सुधार गृह में बंद नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, देश के हर नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है। हाई कोर्ट ने साफ किया कि, सेक्स वर्क स्वेच्छा से चुना गया पेशा हो सकता है मगर किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ रोकना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, और इसलिए महिला को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। संजय/संतोष झा- २० जनवरी/२०२६/ईएमएस