लेख
21-Jan-2026
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नोएडा के जिस गढ्डे ने एक होनहार असीम संभावनाओं से भरे युवा इंजीनियर की जान ले ली वह समूचे सिस्टम के गढ्डो को बेनकाब करता है। आपको पता रहे नोएडा सेक्टर 150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत दो घंटे तक बचाव के लिए तड़पना और सिस्टम के नाकाम अधिकारी कर्मचारियों का किंकर्तव्यविमूढ़ बन जाना व्यवस्था की हकीकत की कलई खोल रहा हैं। बता दें कि गुरुग्राम के एक कम्पनी में साफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की बेसमेंट के लिए बनाये गए गड्ढे में कम्पनी से घर जाते समय कार समेत डूबकर मौत हो गई। इस क्षेत्र में भारी जलभराव के कारण सॉफ्टवेयर इंजीनियर की कार पानी से भरे गड्ढे अंडरपास में फंस गई थी। जब वे गहरे पानी में डूब रहे थे तो बचाने की गुहार लगा रहे थे लेकिन पुलिस और आपदा प्रबन्धन के लोग भी उन्हें रेस्क्यू कराने में सफल नहीं हुए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में एंटीमॉर्टम ड्राउनिंग की पुष्टि हुई है। युवराज दो घंटे तक बचने के लिए संघर्ष करते रहे लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाये। डॉक्टरों ने मृत्यु का कारण युवराज के फेफड़ों में पानी भरा हुआ पाया गया जिसकी वजह से वे सांस नहीं ले सके और कई घंटे तक पानी में डूबे रहने की वजह से दम घुटने और हार्टफेल होने से उनकी मौत हो गई। जिस गड्ढे में युवराज गिरे, वह बेसमेंट निर्माण के लिए खोदा गया था लेकिन वहां पर कोई संकेतक नहीं था। न तो कोई मजबूत बैरिकेडिंग थी और न ही रिफ्लेक्टर या चेतावनी बोर्ड लगाए गए थे। घने कोहरे में यह जगहदिखाई ही नहीं देती थी। पहले भी प्राधिकरण से इस स्थान को लेकर शिकायत हुई थी, लेकिन सुरक्षा इंतजाम नहीं किए गए जिसकी वजह से युवराज की उस गड्ढे में गिर कर मौत हो गई जिसमें पानी भरा हुआ था। इस घटना के बाद बिल्डर की दो कम्पनियों पर भी मुकदमा दर्ज किया गया है। इस मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद हड़कम्प मचने पर मुख्यमंत्री ने जांच के लिए एक एसआईटी गठित की है जो उन्हें पांच दिनों के अन्दर रिपोर्ट देगी और नोएडा प्राधिकरण के सीईओ लोकेश एम को पद से हटा दिया है।बचाव के लिए आयी क्रेन भी उस जगह तक नहीं पहुंच सकी जहां इंजीनियर डूबे थे यही नहीं बोट आदि भी यह कहकर नहीं डाली गई कि दृश्यता कम है। क्योंकि बचाव के लिए प्रशासन ने पहले तो बहुत देरी की और उसके बाद पर्याप्त संसाधन और तकनीक भी उनके पास नहीं थी जिसकी वजह से घोर लापरवाही हुई। नोएडा कोई गांव नहीं रह गया है कि वहां संसाधन उपलब्ध ही न हो सकें। एक बड़ा शहर जो दिल्ली से जुड़ा हुआ है और दिल्ली एनसीआर का हिस्सा है। जहां तमाम देसी-विदेशी कम्पनियों ने अपने आफिस बना रखे हैं। यदि वहां भी प्रशासन और आपदा प्रबन्धन का यह हाल है। बेसमेंट के लिए खोदा गया गड्‌ढा वैसे ही छोड़ दिया जाता है और किसी प्रकार का संकेतक तक नहीं लगाया जाता है कोई अलर्ट नहीं कोई वैरीकेडिंग नहीं कि कोई उसमें गिर न सके तो यह तो प्रशासन की सरासर लापरवाही का नतीजा है। नोएडा के प्रशासन के लिए बहुत से अधिकारी लालायित रहते हैं। बड़ी मलाईदार पोस्टिंग मानी जाती है। जहां तक प्राधिकरण के सीइओ को पद से हटाने का प्रश्न है, यह तो लोगों का गुस्सा शांत कराने के लिए है। वे जल्द ही किसी और पद को सुशोभित कर रहे होंगे। जाहिर है कि 27 साल के युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की जान इसलिए चली गई, क्योंकि प्रशासन सुस्त था और साथ में लापरवाह भी। इंजीनियर की मौत से किसी को फर्क नहीं पड़ेगा। इस तरह की मौतें अब सामान्य मानी जाने लगी हैं। इंदौर के रघुनाथपुरा में दो दर्जन के करीब मौतें जहरीले पानी से हो गईं। ये मौतें देश में बहस का हिस्सा नहीं बनीं। युवा इंजीनियर युवराज की मौत भी बहस से बाहर ही रहेगी। जैसा कि अक्सर होता है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना का संज्ञान लेकर पूरे मामले की गहन और निष्पक्ष जांच के लिए तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम यानी ही एसआईटी का गठन कर दिया है। इस एसआईटी का नेतृत्व मेरठ जोन के अपर पुलिस महानिदेशक करेंगे। टीम में मेरठ मंडल के मंडलायुक्त को भी शामिल किया गया है, ताकि प्रशासनिक और तकनीकी दोनों पहलुओं की बारीकी से जांच हो सके। किस तरह की जांच होगी, यह समझना मुश्किल नहीं है। इस घटना को लेकर नोएडा अथॉरिटी की तरफ से सम्बंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। जूनियर इंजीनियर नवीन कुमार की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त की गई। सवाल यह है कि क्या सेवाएं समाप्त कर देना ही सजा है? निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई। जाहिर है, यह संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के वजह से की गई होगी। हैरत की बात है कि कई घंटों के प्रयास के बाद भी बचाव दल इंजीनियर की जान बचाने में नाकाम रहे। घटना स्थल पर पुलिस 20 मिनट में पहुंच गई। इसके बाद फायर ब्रिगेड की टीम आई। लेकिन फायर बिग्रेड के पास रेस्क्यू करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे। हैरतअंगेज तौर पर पानी और डूबने की खबर थी लेकिन रेस्क्यू टीम के पास कोई भी तैराक नहीं था, जो कूदकर युवराज को बचा सकता था। अब सवाल यह है कि युवा इंजीनियर की मौत का जिम्मेदार कौन है? ठीक है कोहरा था, युवराज को अंदाजा नहीं था, किधर जाना है, लेकिन बेरिकेडिंग भी तो नहीं थी। कोई चेतावनी बोर्ड भी तो नहीं था। एसआईटी जांच करेगी। रिपोर्ट कब आएगी, कुछ नहीं कहा जा सकता। अक्सर इस तरह की मामलों की जांच रिपोर्ट तब आती है, जब मामला ठंडा हो जाता है। वैसे भी अब समाज पर इस तरह की मौतों का कोई खास असर नहीं होता। जिस प्रकार इंजीनियर को पानी में डूबने से निकालने के लिए कुछ प्रयत्न किए गए वह नाकाफी थे। ऐसे मौकों पर आपदा प्रबन्धन के फेल होने से व्यवस्था की विसंगतियों ने एक व्यक्ति की जान ले ली है। इस प्रकार की लापरवाही से आये दिन किसी न किसी प्रकार की दुर्घटनाएं होती रहती हैं। जिसकी वजह से लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। क्या इस घटना से प्रशासन कोई सबक सीखेगा और वास्तव में दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कोई ऐसी कार्रवाई हो सकेगी कि इस प्रकार की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति सिर्फ नोएडा में ही नहीं कहीं भी न हो। इससे प्रशासन को सबक लेना होगा कि आपदा प्रबन्धन की उनकी व्यवस्था भी मौके पर धोखा दे जाती है तो फिर यह सब क्या कागजी खानापूरी होती है।यह तो एक हादसा था विचार करें कि किसी बड़ी आतंकी वारदात या प्राकृतिक आपदा की अप्रिय घटना होने पर इस तरह का नाकारा आपदा प्रबंधन कितना कारगर साबित होगा? वही हमारा एक सुझाव यह भी है कि जब हम अपने बच्चों को डाक्टर इंजीनियर या अन्य बड़ी बड़ी डिग्रियां तालीम दिलाते हैं तो तैरना व कुछ जरूरी अपना सेल्फ डिफेंस करने वाले जूडो कराटे आदि भी अनिवार्य तौर पर प्रशिक्षण दिलाएं ताकि आकस्मिक स्थिति में स्वयं को बचा सकें। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 21 जनवरी 26