23 जनवरी को, वर्ष 2021 से भारत में पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। वास्तव में, यह दिवस भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर उनके अदम्य साहस, उनकी वीरता और राष्ट्रप्रेम को समर्पित है। पाठकों को बताता चलूं कि नेताजी का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओड़िशा के कटक शहर में हुआ था तथा इस वर्ष यानी कि वर्ष 2026 में हम उनकी 129वीं जयंती मनाने जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पहला पराक्रम दिवस कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में आयोजित किया गया था, जबकि वर्ष 2022 में नई दिल्ली के इंडिया गेट पर नेताजी की भव्य होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण किया गया।नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती दत्त बोस था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल में हुई और आगे चलकर उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्ययन किया। यहीं से उनके भीतर ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध की भावना और अधिक प्रबल हुई। जानकारी मिलती है कि प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान एक अंग्रेज प्रोफेसर ओटीन द्वारा भारतीयों के प्रति की गई नस्लीय टिप्पणी का उन्होंने खुलकर विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया था।वर्ष 1919 में सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय सिविल सेवा (आइसीएस) की परीक्षा उत्तीर्ण की और चौथा स्थान प्राप्त किया, जो उस समय किसी भी भारतीय के लिए अत्यंत गौरवपूर्ण उपलब्धि थी। किंतु देशसेवा को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने इस प्रतिष्ठित पद से इस्तीफा दे दिया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उनके क्रांतिकारी विचारों और गतिविधियों के कारण उन्हें 1921 से 1941 के बीच 11 बार जेल जाना पड़ा। यह एक रोचक तथ्य है कि 1930 में जेल में रहते हुए ही वे कलकत्ता के मेयर भी चुने गए। नेताजी स्वामी विवेकानंद से अत्यधिक प्रभावित थे और उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। उनके राजनीतिक गुरु देशबंधु चित्तरंजन दास थे तथा वे रामकृष्ण परमहंस, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के आनंद मठ तथा भारतीय दर्शन से भी प्रेरित थे। उन्होंने पश्चिमी और भारतीय विचारों का अद्भुत समन्वय किया। वर्ष 1921 में उन्होंने चित्तरंजन दास की स्वराज पार्टी द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र ‘फॉरवर्ड’ के संपादन का कार्य भी संभाला। पाठकों को बताता चलूं कि नेताजी पूर्ण स्वराज के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट का विरोध किया, जिसमें भारत को डोमिनियन स्टेटस देने की बात कही गई थी। यहां पाठकों को यह भी जानकारी देता चलूं कि डोमिनियन स्टेटस ब्रिटिश साम्राज्य की वह राजनीतिक व्यवस्था थी, जिसके अंतर्गत किसी उपनिवेश को आंतरिक स्वशासन प्रदान किया जाता था, लेकिन वह देश ब्रिटिश क्राउन (राजा/रानी) के अधीन ही रहता था। ऐसे देशों को अपने घरेलू मामलों में स्वतंत्रता होती थी, पर विदेश नीति, रक्षा और संवैधानिक सर्वोच्चता में ब्रिटेन का प्रभाव बना रहता था। भारत के संदर्भ में डोमिनियन स्टेटस का अर्थ था कि भारत एक स्वशासित राष्ट्र बन जाए, किंतु पूर्ण स्वतंत्र गणराज्य न होकर ब्रिटिश सम्राट को अपना संवैधानिक प्रमुख माने। इसी कारण महात्मा गांधी और कांग्रेस के कई नेताओं ने प्रारंभ में डोमिनियन स्टेटस को अपूर्ण स्वतंत्रता मानते हुए अस्वीकार किया और बाद में पूर्ण स्वराज की माँग को लक्ष्य बनाया।संक्षेप में कहें तो, डोमिनियन स्टेटस स्वतंत्रता की दिशा में एक अंतरिम और सीमित व्यवस्था थी, न कि संपूर्ण स्वतंत्रता। वे 1930 के नमक सत्याग्रह में सक्रिय रहे और गांधी-इरविन समझौते तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्थगन का विरोध किया। दूसरे शब्दों में कहें तो सुभाष चन्द्र बोस नमक सत्याग्रह के वैचारिक, संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर सक्रिय सहभागी थे, भले ही वे दांडी मार्च के प्रत्यक्ष सत्याग्रही न रहे हों। यद्यपि महात्मा गांधी से उनके वैचारिक मतभेद थे, फिर भी ‘राष्ट्रपिता’ कहकर गांधी जी को संबोधित करने वाले वे पहले नेता थे। यहां यह भी गौरतलब है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी ने जर्मनी से ‘आज़ाद हिंद रेडियो’ की शुरुआत की, जिसके माध्यम से उन्होंने भारतीयों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जागरूक किया। उनका प्रसिद्ध नारा तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा भारत में नहीं, बल्कि बर्मा (म्यांमार) में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए दिया गया था। ‘दिल्ली चलो’ का नारा भी उन्हीं की देन है। यह भी कम लोग जानते हैं कि रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में सबसे पहले आज़ाद हिंद फौज ने अपनाया। इतना ही नहीं, नेताजी ने जापान की सहायता से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को अंग्रेजों से मुक्त कराया और वहाँ पहली बार स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया तथा उनके नेतृत्व में गठित आज़ाद हिंद सरकार को जापान, जर्मनी, इटली सहित लगभग 9 देशों ने मान्यता दी थी। आजाद हिंद फौज का गठन 1942 में हुआ था। मान्यता देने वालों में क्रोएशिया, बर्मा, थाईलैंड, फिलीपींस, मंचूरिया और चीन गणराज्य (वांग जिंगवेई के अधीन) भी शामिल थे। उन्होंने ‘रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट’(आइएनए महिला रेजीमेंट) का गठन किया, जो एशिया की पहली पूर्णतः महिला सैन्य टुकड़ी थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारतीय राष्ट्रीय सेना (आइएनए,जिसे आजाद हिंद फौज भी कहा जाता है) का गठन प्रारंभ में कैप्टन मोहन सिंह और जापानी मेजर इविची फुजिवारा के नेतृत्व में हुआ। इसमें ब्रिटिश-भारतीय सेना के युद्धबंदी, सिंगापुर की जेलों में बंद भारतीय तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय नागरिक शामिल थे। बाद में इसकी संख्या बढ़कर लगभग 50,000 हो गई। वर्ष 1944 में आइएनए ने इम्फाल और बर्मा में मित्र देशों की सेनाओं से मुकाबला किया। नवंबर 1945 में जब अंग्रेजों ने आइएनए के सैनिकों पर मुकदमे चलाए, तो पूरे भारत में व्यापक जन-आंदोलन हुआ। नेताजी केवल क्रांतिकारी नेता ही नहीं थे, बल्कि वे उपनिषद, गीता, वेदांत और योग दर्शन के गंभीर अध्येता भी थे। वे मानते थे कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पुनर्जागरण से भी जुड़ी है। ‘जय हिंद’ का नारा उन्होंने स्वयं नहीं गढ़ा, लेकिन इसे आज़ाद हिंद फौज का आधिकारिक अभिवादन बनाकर जन-जन तक पहुँचाया। आज यह भारत का राष्ट्रीय अभिवादन है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद 16 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद नेताजी जापानी विमान से दक्षिण-पूर्व एशिया छोड़कर चीन की ओर रवाना हुए। कहा जाता है कि विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और वे गंभीर रूप से घायल हो गए, किंतु उनकी मृत्यु को लेकर आज भी अनेक रहस्य बने हुए हैं।इस प्रकार, सुभाष चंद्र बोस केवल एक क्रांतिकारी नेता ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी विचारक, अनुशासित सेनानी और आध्यात्मिक राष्ट्रभक्त थे। उनका सपना केवल भारत को आज़ाद कराना नहीं था, बल्कि उसे सशक्त, आत्मनिर्भर, समानतामूलक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाना था। नेताजी का जीवन आज भी प्रत्येक भारतीय को त्याग, साहस, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देता है। ईएमएस/22/01/2026