भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षितिज पर बजट 2026-27 की आहट ने उद्योग जगत के भीतर एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया है। हाल ही में जारी फिक्की का प्री-बजट सर्वे न केवल देश की आर्थिक सेहत की गवाही देता है, बल्कि वैश्विक मंदी की आहटों के बीच भारत को एक उम्मीद के टापू के रूप में पेश करता है। सर्वेक्षण में शामिल अस्सी प्रतिशत उद्यमियों का भारत की विकास यात्रा पर अटूट विश्वास यह दर्शाता है कि निजी क्षेत्र अब केवल सरकार के भरोसे बैठने के बजाय स्वयं आर्थिक इंजन का सारथी बनने को तैयार है। आगामी वित्त वर्ष में सात से आठ प्रतिशत की संभावित विकास दर का अनुमान कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि ठोस मैक्रो-इकोनॉमिक बुनियाद पर टिकी एक हकीकत नजर आती है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू सरकार का राजकोषीय अनुशासन रहा है। वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 प्रतिशत के दायरे में रखने की सरकारी प्रतिबद्धता ने उद्योग जगत को वह भरोसा दिया है, जिसकी दरकार निवेश के अनुकूल माहौल बनाने के लिए होती है। हालांकि, इस सकारात्मकता के साथ-साथ बजट की प्राथमिकताओं को लेकर उद्योग जगत की अपेक्षाएं भी अत्यंत स्पष्ट हैं। रोजगार सृजन, बुनियादी ढांचे में निवेश की निरंतरता और निर्यात को वैश्विक संरक्षणवाद की बाधाओं से उबारना ही इस बजट की असली अग्निपरीक्षा होगी। सरकार को अब कैपेक्स यानी पूंजीगत व्यय के साथ-साथ घरेलू खपत को बढ़ाने के रास्तों पर भी विचार करना होगा, ताकि मांग और आपूर्ति का चक्र संतुलित बना रहे। रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में फिक्की का सुझाव कि पूंजीगत परिव्यय को बढ़ाकर तीस प्रतिशत किया जाए, केवल सैन्य शक्ति को बढ़ाने की कवायद नहीं बल्कि एक आर्थिक मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। ड्रोन तकनीक और रक्षा उपकरणों के लिए प्रस्तावित दो हजार करोड़ रुपये का विशेष फंड न केवल देश को आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि भारत को दुनिया के एक प्रमुख निर्यात हब के रूप में भी स्थापित करेगा। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए मेगा क्लस्टर बनाने की मांग इस बात का संकेत है कि भारत अब चीन के विकल्प के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी दावेदारी को लेकर बेहद गंभीर है। कराधान के मोर्चे पर उद्योग जगत की मांगें मुख्य रूप से सरलता और स्पष्टता की ओर इशारा करती हैं। प्रत्यक्ष कर के क्षेत्र में डिजिटलीकरण और विवादों के त्वरित समाधान की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। विशेष रूप से सीमा शुल्क यानी कस्टम ड्यूटी के ढांचे को तर्कसंगत बनाते हुए इसे मात्र तीन स्तरों पर सीमित करने का सुझाव क्रांतिकारी है। इससे न केवल कर अनुपालन की लागत घटेगी, बल्कि इज ऑफ डूइंग बिजनेस का सपना भी धरातल पर उतरेगा। वैश्विक व्यापारिक अवरोधों और पर्यावरण संबंधी नए विदेशी नियमों (जैसे सीबीएएम) के बीच भारतीय निर्यातकों को बजट से एक सुरक्षा कवच की उम्मीद है। अंततः, बजट 2026-27 को एक ऐसे दस्तावेज के रूप में उभरना होगा जो राजकोषीय विवेक और आक्रामक विकास के बीच एक सूक्ष्म संतुलन बनाए रख सके। प्रकाश/22 जनवरी 2025