लेख
22-Jan-2026
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(सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर विशेष) स्वतंत्रता एक ऐसा शब्द है जिसके विभिन्न अर्थ हैं और हमारे मुल्क में भी स्वतंत्रता की अवधारणा का तात्पर्य विकास की प्रक्रिया है ।स्वतंत्रता से मेरा तात्पर्य है सव्नोमुखी स्वतंत्रता व्यक्ति के अलावा समाज के लिए स्वतंत्रता । धनी के साथ निर्धन के लिए स्वतंत्रता आदमी के साथ महिलाओं के लिए स्वतंत्रता सभी वर्गों के लिए स्वतंत्रता । इस स्वतंत्रता का तात्पर्य मात्र राजनीतिक बंधनों से मुक्ति नहीं है । वरन इसका तात्पर्य है धन का सामान बंटवारा । जातिगत अवरोधों और सामाजिक असमानताओं की समाप्ति साप्रदायिक ता और धार्मिक असहिष्णुता का विनाश ।यह आदर्श है जो कठोर विचार वाले नर नारियों के लिए स्वप्न दर्शी प्रतीत हो सकता है किंतु यही आदर्श आत्मा और भूख को शांत कर सकता है। अक्टूबर 1929 को लाहौर में छात्र सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में सुभाष चंद्र बोस द्वारा व्यक्त विचार अपनी स्थापना की स्वर्ण जयंती मान चुका भारतीय गणतंत्र क्या सुभाष चंद्र बोस के उक्त स्वरूप वाले स्वतंत्रता के सपने को साकार कर पाया? नहीं । लेकिन क्यों इसका उत्तर भी स्वयं नेताजी ने एक चेतावनी के रूप में एक बार दिया था- हमारे पास और तो सब कुछ है ,सिर्फ एक चीज नहीं है वह है नि शेष आत्म बलिदान ,,,,,हम पूर्ण अंतर कारण से अपने देश को प्यार नहीं करते ,इसलिए हमारे बीच पैदा होते हैं मीर जाफर अमचंद,, हिंदुस्तान में नैतिक मूल्यों का जो जबरदस्त हस्य हो रहा है और अनुशासन का जो घोर अभाव हमारे जीवन में घर कर चुका है, इस आशंका को सुभाष चंद्र बोस बहुत पहले ही व्यक्त कर चुके थे । प्रजातंत्र व्यवस्था के ही संदर्भ में उन्होंने एक मर्तबा आजाद हिंद फौज के अधिकारी प्रशिक्षक सरदार बलवंत सिंह से कहा था- मैंने जापान में कुछ चीज देखी तो मेरे मन में विचार आया कि भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था को सार्थक और सफल बनाने के लिए पहले एक लंबे समय तक यानी दो दशकों तक देश के बच्चों को वे संस्कार देने होंगे जो एक स्वाधीन स्वावलम्बी, सशक्त और गणतंत्रीय व्यवस्था के लिए वेहद जरूरी है । जापान के एक होटल की ऊपरी मंजिल पर बैठे वे खुली खिड़की से नीचे की सड़क की तरफ देख रहे थे। तभी उनहोंने देखा की बेशुमार बच्चों की कतार अनुशासित रूप में सार्वजनिक सड़क पर गुजर रही है लेकिन कहीं भी कोई शोरगुल या धक्का मुक्की नहीं । वे कतारबद्ध ढंग से कदम से कदम मिलते हुए खामोशी के साथ फौजी अनुशासन की तरह चले जा रहे थे। यह देखकर सुभाष चंद्र बोस को बड़ा आश्चर्य हुआ उन्हें अपना मुल्क याद आया वहां के बच्चे याद आए उन्होंने होटल मैनेजर से पूछा यह बच्चे कहां जा रहे हैं मेनेजर ने बताया आपको नहीं पता यह तो आपका ही भाषण सुनने जा रहे हैं । जापान में उस दिन सुभाष चंद्र बोस का पहला भाषण था। उन्होंने दोबारा होटल के मैनेजर से पूछा लेकिन इतना अच्छा अनुशासन इन्हें सिखाया किसने इसका वह कोई सटीक उत्तर तो नहीं दे पाया लेकिन बाद में क्या हुआ किसी तरह मेरा वहां प्रश्न जापान के जनरल तोजा तक भी पहुंच गया था। खैर उस दिन भाषण हुआ । कई दिन गुजर गए एक दिन जनरल तोजो मिले तो मैंने उनसे कहा कि मैं उनके देश के उस स्कूल को देखना चाहता हूं । यहां बच्चों में इतना कडा अनुशासन है । जनरल तोजो ने फोन करके तमाम स्कूलों की एक सूची मंगाई और उसे मुझे सौपकर मुझसे कहा कि स्कूल तो हमारे यहां काफी संख्या में है। लेकिन यह सूची देखकर आप जिस स्कूल में चाहे निशान लगा दें। हम आपको पूरे सम्मान के साथ वही लेकर चलेंगे । हम लोग एक स्कूल गए जिस पर मैंने चिन्ह लगाया था । स्कूल में जोरो पढ़ाई चल रही थी। शुरू में तो जो कमरा था वहां हम जाकर खड़े हुए पर वह कोई औपचारिकता दिखाने नहीं आया । जबकि जापान का सबसे महत्वपूर्ण शख्स हमारे साथ खड़ा था । जिस कमरे में हम थे वहां बच्चे बोर्ड पर कुछ पढ़ रहे थे और अध्यापक पूरे मनो योग से उन्हें समझा रहा था । अनुशासन का यह एक भव्य रूप है जो जापान के नागरिक जीवन का एक जरूरी अंग बन चुका है। नेताजी ने बड़ी इच्छा थी कि जब हिंदुस्तान आजाद हो तो शुरू के दो दशकों में सब बच्चों को सैनिक जीवन के अनुशासन भाईचारे प्रेम निष्ठा और गुणों की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जाए । साथ-साथ पढ़ाई भी चलती रहे । 2० सालों में भारत भी अनुशासन की शिक्षा ग्रहण कर लेगा। इसके पश्चात किसी को भी सु व्यवस्थित जीवन पद्धति किसी को सीखनी नहीं पड़ेगी। तब कोई हमारे देशवासी की तरफ उंगली उठाने का साहस नहीं कर पाएगा । इस शिक्षा से भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था व्यवहारकुशल बनाई जा सकेगी । प्रसंगवश यहां नेताजी के विचार भी उल्लेखनीय है कि किसी कार्य में सफलता अथवा असफलता से जो अहंकार और निराशा मिलती है । उसका उन्मूलन करके मनुष्य को संयत बनाने के लिए अध्ययन एवं मनन ही एकमात्र उपाय है । मनुष्य में तभी आंतरिक अनुशासन आ सकता है । आंतरिक संयम न होने पर बाहय संयम स्थाई नहीं हो सकता । देश में राजनीतिक शीर्ष पर सफल नेतृत्व का अभाव हमेशा खटकता रहा है ऐसा क्यों है। एक मर्तबा नेताजी ने कहा था -एक ऐसे राष्ट्र जो लंबे समय तक गुलाम रहा हो या मानसिक दासता से पीड़ित हो। ऐसे में नेता गण एक बार कुर्सी पर आसीन हो जाने के पक्ष अपनी इच्छा से अलग नहीं होना चाहते उनको नीचे खींचना पड़ता है और यह सचमुच एक कष्टदायक कार्य है । ऐसे देश में लोग अन्य देशों की अपेक्षा अंधपूजा में अधिक प्रव्त होते हैं और इससे विमुख होने में वक्त लगता है। प्रव्त होते हैं और इससे विमुख होने में वक्त लगता है। राष्ट्र किसी नेता की पुरानी सेवाओं के प्रति कृतज्ञ तो रहता है और उन सेवाओं के लिए उससे प्रेम भी करता है । तथापि राष्ट्र उसका अनुसरण तभी करेगा जब तक वह वक्त के साथ चले और देशवासियों का पथ प्रदर्शन करें । हर परिस्थिति में पूर्व बलिदान और कष्ट भविष्य के नेतृत्व का अधिकार पात्र नहीं बन सकते। (लेखक के विषय में- स्वतंत्र पत्रकार है) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 22 जनवरी /2026