दिलचस्प थी सुभाष बाबू की लव स्टोरी नेताजी सुभाष जयंती (23 जनवरी) पर विशेष नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रेम कहानी काफी दिलचस्प रही। फरवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान जेल में बंद नेताजी की तबीयत खराब होने लगी थी, जिसे देखते हुए ब्रिटिश सरकार इलाज के लिए उन्हें यूरोप भेजने पर सहमत हो गई थी। विएना में सुभाष चंद्र बोस के इलाज के दौरान एक यूरोपीय प्रकाशक ने उन्हें एक किताब ‘द इंडियन स्ट्रगल’ लिखने की जिम्मेदारी सौंपी। सुभाष बाबू ने यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी स्वीकार तो कर ली लेकिन इसे पूरा करने के लिए उन्हें एक ऐसे सहयोगी की जरूरत महसूस हुई, जिसे अच्छी अंग्रेजी और टाइपिंग आती हो। सुभाष चंद्र बोस के एक दोस्त थे डा. माथुर, जिन्होंने उन्हें दो ऐसे लोगों के बारे में बताया। नेताजी द्वारा इंटरव्यू के दौरान पहले को रिजेक्ट कर दिए जाने के बाद दूसरे उम्मीदवार को बुलाया गया। दूसरा उम्मीदवार था 26 जनवरी 1910 को ऑस्ट्रिया के एक कैथोलिक परिवार में जन्मी 22 वर्षीया खूबसूरत युवती एमिली शेंकल, जिसके पिता एक प्रसिद्ध पशु चिकित्सक थे। सुभाष बाबू उससे बहुत प्रभावित हुए और जून 1934 में एमिली ने नेताजी के साथ काम करना शुरू कर दिया। एमिली से मुलाकात के बाद सुभाष चंद्र बोस के जीवन में नाटकीय परिवर्तन आया। वह एमिली की ओर आकर्षित होने लगे और दोनों में स्वाभाविक प्रेम हो गया। हालांकि एमिली के सम्पर्क में आने से पहले भी नेताजी को प्रेम और शादी के कई ऑफर मिले थे लेकिन उन्होंने किसी में दिलचस्पी नहीं ली किन्तु एमिली की खूबसूरती ने उन पर जादू सा कर दिया था। 5 मार्च, 1936 को को सुभाष बाबू ने एमिली को एक पत्र लिखा, ‘माय डार्लिंग, समय आने पर हिमपर्वत भी पिघलता है, ऐसा भाव मेरे अंदर अभी है। मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूं, ये बताने के लिए कुछ लिखने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। जैसा कि हम एक-दूसरे को आपस में कहते हैं, माय डार्लिंग, तुम मेरे दिल की रानी हो लेकिन क्या तुम मुझसे प्यार करती हो। मुझे नहीं मालूम कि भविष्य में क्या होगा? हो सकता है, पूरा जीवन जेल में बिताना पड़े, मुझे गोली मार दी जाए या मुझे फांसी पर लटका दिया जाए। हो सकता है, मैं तुम्हें कभी देख नहीं पाऊं, हो सकता है कि कभी पत्र नहीं लिख पाऊं, लेकिन भरोसा करो, तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगी, मेरी सोच और मेरे सपनों में रहोगी। अगर हम इस जीवन में नहीं मिले तो अगले जीवन में मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।’ एक पत्र में उन्होंने एमिली को लिखा था, ‘तुम पहली महिला हो, जिससे मैंने प्यार किया। भगवान से यही चाहूंगा कि तुम मेरे जीवन की आखिरी स्त्री भी रहो।’ सुभाष और एमिली भले ही एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते थे किन्तु 1934 से 1945 के बीच करीब 11 वर्षों के संबंधों में दोनों तीन वर्ष से भी कम समय तक साथ रह सके। नाजी जर्मनी के सख्त कानूनों को देखते हुए दोनों ने 26 दिसम्बर 1937 को आस्ट्रिया के बाड गास्टिन नामक स्थान पर हिन्दू पद्धति से विवाह रचा लिया। विएना में एमिली ने 29 नवम्बर 1942 को एक पुत्री को जन्म दिया, जिसके चार सप्ताह की होने पर सुभाष ने उसे पहली बार देखा था और उसका नाम अनिता बोस रखा। उन्होंने एमिली तथा अनीता के साथ कुछ समय बिताया और उसके बाद वे अपने मिशन पर निकल गए। सुभाष चंद्र बोस फिर कभी वापस नहीं आए, वापस आई तो 1945 में उनकी मृत्यु की खबर। सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के बाद भी एमिली और अनीता ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। एमिली सुभाष चंद्र बोस की यादों के सहारे 1996 तक जीवित रही और उन्होंने एक छोटे से तार घर में काम करते हुए सुभाष चंद्र बोस की अंतिम निशानी अपनी बेटी अनीता बोस को पाल-पोस कर बड़ा किया, जो जर्मनी की विख्यात अर्थशास्त्री बनी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और एमिली शेंकल की यह प्रेम कहानी एक ऐसी प्रेम कथा है जो आज भी लोगों को प्रेरित करती है और यह बताती है कि प्यार किसी भी बाधा को पार कर सकता है। सुभाष बाबू और एमिली की प्रेम कहानी दुनिया को आज के जमाने में यह भी सिखाती है कि प्यार के लिए देश, धर्म अथवा जाति कोई बाधा नहीं हो सकती बल्कि प्यार एक ऐसी भावना है, जो सभी के लिए समान है। (लेखिका डेढ़ दशक से अधिक समय से शिक्षण क्षेत्र में सक्रिय शिक्षाविद हैं) ईएमएस/22/01/2026