( जन्म दिवस पर विशेष ) नेताजी का जबलपुर से निकटतम आत्मीय संबंध रहा है । वे सन 1943 में कांग्रेस के 52 वे अधिवेशन त्रिपुरी सम्मेलन में भोगराजू पट्टाभि सीतारमैया को 203 मतों से हराकर कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे । इस अवसर पर 52 हाथियों से सज्जित रथ में उनकी अद्भुत विजयी शोभा यात्रा संपूर्ण नगर में निकाली गई थी । वर्तमान में त्रिपुरी सम्मेलन का वह ऐतिहासिक स्थान तिलवारा जबलपुर में त्रिपुरी पार्क गांधी स्मारक के नाम से विख्यात है । ब्रिटिश शासन ने नेताजी को जबलपुर एवं सिवनी के कारागार में भी निरुद्ध रखा था इन दोनों जगह उनके स्मृति स्थल निर्मित है । नेताजी के अधिकांश वृतांत के साक्षी एवं उनके अभिन्न सहयोगी पं. करतारचंद शर्मा आजाद हिंद फौज में एडज्यूटेंट ( दण्डपाल ) नियुक्त थे । वे एडज्यूटेंट ( दण्डपाल ) होने के साथ-साथ एक बहादुर सिपाही,कुशल वाहन चालक,दक्ष टाइपिस्ट,योग्य स्टेनोग्राफर भी थे । उनकी स्टेनोग्राफी की विशिष्टता के कारण नेताजी,आजाद हिंद फौज के कई गोपनीय दस्तावेज एवं आदेश उन्हें डिक्टेशन देकर टाइप करवाते थे व उन्हें अपना निजी सहायक ( पी.ए.)भी कहते थे । वे नेताजी की सबमरीन (पनडुब्बी),रेल,सड़क, हवाई मार्ग की यात्रा के हमराही व नेताजी के नेतृत्व में द्वितीय विश्व युद्ध के योद्धा भी रहे । पं.श्री करतार चंद शर्मा जी मूलतः होशियारपुर ( पंजाब ) के निवासी थे । स्वतंत्रता के उपरांत रेडफोर्ट केस की सुनवाई के बाद उन्हें सेंट्रल रेलवे,खण्डवा में नौकरी मिली अतः वे खण्डवा में निवास करने लगे । अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे अपने पुत्र नरेश शर्मा सेवानिवृत्त नगर पुलिस अधीक्षक के ओमती पुलिस क्वार्टर जबलपुर में निवास करने लगे । यहीं 19 जनवरी 2001 को उनका स्वर्गारोहण हो गया । शासन ने खण्डवा में स्व.पं.श्री करतार चंद शर्मा के अंतिम संस्कार में राजकीय सम्मान प्रदान किया । श्री शर्मा द्वारा नेताजी के साथ व्यतीत किए स्वर्णिम काल के लिपिबद्ध संस्मरण उनके परिवार की अमूल्य धरोहर है। वे स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी की लड़ाई में उनके हम कदम, हम साया तो थे ही साथ ही नेताजी की विशेष कृपा के पत्र भी थे । नेताजी ने अपनी प्रत्यक्ष अंतिम हवाई यात्रा के पूर्व 16 अगस्त 1945 को श्री शर्मा से एक आदेश टाइप करवाया कि अगले हुक्म तक मेजर जनरल मोहम्मद जमाल कयानी, रेयर हेडक्वार्टर सुप्रीम कमान सिंगापुर के ऑफिसर इंचार्ज होंगे । यह नेताजी का अंतिम पत्र / आदेश था जिसे श्री शर्मा द्वारा आजाद हिंद फौज की समस्त इकाइयों को भेज दिया गया । 18 अगस्त 1945 को ऑल इंडिया रेडियो से समाचार प्रसारित किया गया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का हवाई जहाज फॉरमोसा वर्तमान ताइवान के ताहुहाकू हवाई अड्डे में आग लग जाने के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया है , जिसमें नेताजी की मृत्यु हो गई । पं.शर्मा ने इस बात को जीवन पर्यंत कभी भी स्वीकार नहीं किया। वे कहते थे कि इंडियन एक्सप्रेस में जिस हवाई जहाज का दुर्घटनाग्रस्त होने का फोटो प्रकाशित किया गया है,वह एक रूसी विमान था,जो 1944 में दुर्घटनाग्रस्त हुआ था । अतः वे इस आशय के स्तम्भ टाइम्स आफ इंडिया एवं इंडियन एक्सप्रेस में लिखते थे । उनके इन लेखों पर खुशवंत सिंह एवं कुलदीप नैय्यर जैसे विख्यात लेखक टिप्पणी किया करते हैं । उल्लेखनीय है कि कैप्टन शाहनवाज खान ( आजाद हिंद फौज सेनानी ) की अध्यक्षता में 1956 में बनी जांच समिति ने मात्र चार माह की जांच के उपरांत दो-एक के बहुमत से निष्कर्ष दिया कि नेताजी की मृत्यु उक्त विमान दुर्घटना में हो गई थी । नेताजी के बड़े भाई श्री सुरेश चंद्र बोस इस निष्कर्ष से असहमत थे । सन् 1971-77 में कैप्टन शाहनवाज भारत सरकार के इस्पात एवं खान मंत्री के रूप में बुरहानपुर दौरे पर आये,उस समय पं.श्री करतार चंद शर्मा रेलवे में वाणिज्य निरीक्षक के पद पर बुरहानपुर में ही पदस्थ थे । उन्होंने कैप्टन शाहनवाज से संपर्क कर उनकी समिति के जांच निष्कर्ष पर असहमति प्रगट कर चर्चा की । चर्चा के उपरांत शाहनवाज खान ने श्री शर्मा से उनके मंत्रालय दिल्ली में निज सहायक बनने का आग्रह किया । जिसे श्री शर्मा ने विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर कहा कि यदि आपकी समिति की रिपोर्ट सही भी है तो जब नेताजी पुनर्जन्म लेंगे,तब फिर मैं भी आऊंगा और उन्हीं का निज सहायक बनूंगा। उन्होंने इस विश्वास के साथ जीवन व्यतीत कर दिया कि नेताजी लौट कर आयेंगे । उनका कृतज्ञ परिवार आज भी नेताजी का जन्मदिन सबसे बड़े त्यौहार के रूप में जबलपुर में पुत्र नरेश शर्मा,पौत्र अपूर्व प्रखर शर्मा फॉरेस्ट रेंजर ,अमेरिका में ज्येष्ठ पौत्र अनल प्रकार शर्मा,बेंगलुरु में पौत्री चक्षु श्रेष्ठा एवम् खण्डवा में ज्येष्ठ पुत्र सुरेश शर्मा के परिवार द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। श्री शर्मा के संस्मरणों के अनुसार नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को केवल युद्ध नहीं अपितु राष्ट्रीय चेतना का आंदोलन बना दिया था । उन्होंने कई ऐसे शब्द,नारे एवं संबोधन गढ़े जो आज भी भारत की आत्मा में बसे हैं । नेताजी ने अपने शब्दों से राष्ट्र की आत्मा गढ़ी थी । अभिवादन में जय हिन्द एक भावना थी । दिल्ली चलो का आव्हान युद्ध घोष था जो अंग्रेजी सत्ता के केंद्र पर सीधा प्रहार था । तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हें आजादी दूंगा नेताजी का सबसे शक्तिशाली युद्ध घोष था । यह बलिदान का दर्शन था । नेताजी ने ही पहली बार भारत को ब्रिटिश इंडिया नहीं अपितु आजाद हिंद कहा, यह उनका क्रांतिकारी राष्ट्र बोध था । आजाद हिंद फौज का गठन गुलामी से मुक्ति का प्रतीक बन गया । नेताजी ने भारत को केवल भूगोल नहीं अपितु माता के रूप में संबोधित कर भारत माता कहा यही शब्द सैनिकों में जान फूंक देता था । उन्होंने 1943 में सिंगापुर में अर्जी हुकूमत-ए-आजाद हिंद बनाई जो बताता है कि नेताजी ने भारत को पहले ही मन से आजाद घोषित कर दिया था । इंकलाब शब्द शहीद-ए-आजम भगत सिंह से जुड़ा हुआ है किंतु नेताजी ने इसे राष्ट्रीय क्रांति का स्वर बना दिया । वे भाषणों में बलिदान शब्द बार-बार कहते थे क्योंकि उनके लिए आजादी का मार्ग त्याग एवं तपस्या से होकर जाता था । नेताजी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक थे उनके लिए हिंदू, मुस्लिम,सिक्ख,इसाई से ऊपर एक शब्द था भारतीय। आज जो भारत का सैन्य,राष्ट्रवादी एवं औपचारिक स्वरूप हमें दिखाई देता है उसका बड़ा हिस्सा सीधे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की देन है । आजाद हिन्द फौज का आधिकारिक अभिवादन जय हिंद भारत का राष्ट्रीय सैन्य अभिवादन है । इसका उच्चारण भारतीय सेना,पुलिस,अर्धसैनिक बल,वन विभाग आदि एवं राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री के द्वारा गर्व से किया जाता है । जनसाधारण भी एक दूसरे के प्रति सम्मान का प्रदर्शन जय हिंद कह कर ही कrते हैं । हमारे राष्ट्रगान जन गण मन को नेताजी ने सन 1942 में स्वतः द्वारा स्थापित आजाद हिंद रेडियो पर पहली बार राष्ट्रगान के रूप में प्रसारित करवाया था व कहा था कि यह स्वतंत्र भारत का राष्ट्रगान होगा। यह पहले कांग्रेस का गीत था,नेताजी ने इसे राष्ट्रगान बना दिया । तथाकथित विभिन्न मतभेदों के उपरांत भी 6 जुलाई 1944 को आजाद हिंद रेडियो के प्रसारण में नेताजी ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहकर सर्वप्रथम संबोधित किया था, तभी से महात्मा को राष्ट्रपिता कहा जाने लगा । आजाद हिंद सरकार ने हीं सबसे पहले हमारे राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर फहराया था। उन्हीं ने रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट 1943 में गठित कर पहली महिला सैन्य इकाइयों में से एक की संरचना की थी । नेताजी ने पूर्ण संप्रभुता की अवधारणा स्थापित की थी । उन्होंने सेना का राष्ट्रीयकरण आजाद हिंद फौज के रूप में तो कर ही लिया था किंतु उन्हें आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद का शिल्पकार भी कहा जाता है । नेताजी मानते थे कि अंग्रेज भारत तभी छोड़ेंगे जब वह हारेंगे । अंग्रेजों के विरुद्ध उनका हथियार था सेना,युद्ध,अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, भारत के बाहर से हमला । वे कहते थे आजादी दी नहीं जायेगी,लेना पड़ेगी ( Freedom is not given,It is taken ) आज इतिहासकार मानते हैं कि ब्रिटेन भारत से इसलिए नहीं गया कि केवल सत्याग्रह था बल्कि इसलिए भी गया कि आजाद हिंद फौज बनी,भारतीय सैनिकों में विद्रोह फैला,नौसेना- वायु सेवा-थल सेना में बगावत हुई । अंग्रेज डर गये कि अब भारतीय सेवा उन पर ही पलट वार करेगी । नेताजी जानते थे कि गांधी जी ने भारत को जागृत किया है और उन्होंने भारत को लड़ने के लिए तैयार किया अगर गांधी ना होते तो भारत उठता नहीं । अगर नेताजी ना होते तो ब्रिटेन भागता नहीं । नेताजी एवं अन्य असंख्य महावीरों ने स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ में अपने जीवन की सर्वोत्कृष्ट आहुति दी जिससे हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई । परिणामतः आज हम इस पावन एवं जान से प्यारी धरती पर स्वतंत्र होकर अपना सफल गणतंत्र स्थापित किये हुये हैं। ऐ मेरे प्यारे वतन.. तुझपे दिल कुर्बान, तू ही मेरी आरजू ,तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान । ईएमएस/22/01/2026