मृत्युंजय : कर्ण की आत्मसंघर्ष से भरी जीवन-यात्रा जापानी कलाकारों द्वारा समकालीन दृष्टि में महाभारत की अंतर-सांस्कृतिक प्रस्तुति भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा वीर भारत न्या स : मंत्री इंदर सिंह परमार भोपाल (ईएमएस)। वीर भारत न्यास द्वारा भारत भवन में आयोजित सभ्यताओं के संघर्ष एवं औदार्य की महागाथा पर केंद्रित महाभारत समागम का आठवें दिन मध्ययप्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार मुख्या अतिथि थे। उन्होंतने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि वीर भारत न्यास भारत की ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा केवल धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन मार्ग, अध्ययन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकृति संरक्षण की दिशा भी देती है। वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी ने मंत्रीजी का स्वागत किया। इस अवसर दर्शक नाट्य, नृत्य और लोकपरंपरा की समृद्ध प्रस्तुतियों का साक्षात्कार हुए। बहिरंग मंच पर जयंत देशमुख निर्देशित नाटक मृत्युंजय की प्रभावशाली प्रस्तुति हुई। इससे पहले अंतरंग सभागार में जापान की हिरोशी कोइके ब्रिज कंपनी द्वारा हिरोशी कोइके निर्देशित महाभारत का मंचन किया गया, जिसने अंतरराष्ट्रीय रंग-दृष्टि के साथ महाकाव्य को नए कलात्मक आयाम दिए। इसी क्रम में निवेदिता महापात्रा के निर्देशन में ओडिसी नृत्य-नाटिका द्रौपदी प्रस्तुत की गई। पूर्वरंग मंच पर पृथ्वीराज क्वायथर द्वारा निर्देशित यक्षगान ने लोकनाट्य की जीवंत परंपरा को सशक्त रूप में सामने रखा। मित्रता, कर्तव्य और उदारता का मानवीय चित्र एकरंग, मुंबई द्वारा प्रस्तुत नाटक मृत्युंजय शिवाजी सावंत के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित है। यह नाटक महाभारत के महान योद्धा कर्ण के जीवन की मार्मिक, प्रेरणादायक और दार्शनिक यात्रा को मंच पर साकार करता है। कथा कर्ण के जन्म, माता कुन्ती द्वारा त्याग, राधा-काटधन दंपत्ति के स्नेह में पालन-पोषण और सामाजिक अस्वीकृति से उपजे संघर्ष को संवेदनशीलता से उकेरती है। द्रोणाचार्य द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद भी कर्ण अपने पुरुषार्थ से स्वयं को महान धनुर्धर सिद्ध करता है। नाटक में कर्ण–दुर्योधन की मित्रता, कर्ण के भीतर के द्वंद्व, उसकी कर्तव्यपरायणता और उदारता को गहराई से प्रस्तुत किया गया है। जन्म की पीड़ा, अपमान, संघर्ष और अंततः नायकीय बलिदान तक की यात्रा कर्ण को केवल वीर योद्धा नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का प्रतीक बनाती है। अंत में कुरुक्षेत्र युद्ध में कर्ण का पतन उसके आदर्शों को और भी उजागर करता है। पैन-एशियन प्रयोग और बहु-स्वरीय मंच भाषा हिरोशी कोइके ब्रिज कंपनी, जापान द्वारा प्रस्तुत और हिरोशी कोइके निर्देशित महाभारत की नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को एक अनूठे अंतर-सांस्कृतिक रंगमंचीय अनुभव से रूबरू कराया। यह मंचन विश्व के सबसे लंबे महाकाव्य को समकालीन संवेदना के साथ प्रस्तुत करता है, जहाँ कथा केवल पौराणिक आख्यान न रहकर शक्ति, कर्तव्य, इच्छा, त्याग और मानवीय सीमाओं पर गहन विचार बन जाती है। दक्षिण एशियाई दर्शन से प्रेरित यह कृति सह-अस्तित्व और सामंजस्य जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को आधुनिक संदर्भ में सामने रखती है। हिरोशी कोइके की नौ वर्षों की पैन-एशियन परियोजना में जापान, ओकिनावा, इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड के कलाकारों की सहभागिता रही है। विभिन्न भाषाओं, परंपराओं और रंगशैलियों के मेल से महाभारत की कथा बहु-स्वरीय मंच संरचना में उभरती है। देवताओं और मनुष्यों के संबंधों को मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत करते हुए यह नाटक कर्म, नियति और नियंत्रण जैसे प्रश्नों पर दर्शकों को सोचने के लिए प्रेरित करता है। महोत्सव में प्रस्तुत शपथ और पाप महाभारत से प्रेरित 30 मिनट की सघन प्रस्तुति है, जो भीष्म के जीवन पर केंद्रित है। नोह रंगमंच के अभिनेता रेइजिरो त्सुमुरा द्वारा अभिनीत भीष्म त्याग, निष्ठा और धर्म के प्रतीक बनकर उभरते हैं। सत्ता संघर्ष और युद्ध की अनिवार्यता के बीच शांति बनाए रखने का उनका प्रयास अंततः त्रासदी में बदल जाता है। यह प्रस्तुति महाभारत को एक जीवंत, मानवीय और आज के दर्शक से संवाद करने वाला अनुभव बना देती है। द्रौपदी : स्त्री अस्मिता की सशक्त रंगमंचीय अभिव्यक्ति ओडिसी नाट्य बैले सेंटर, नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत नृत्य-नाटिका द्रौपदी : एक अदम्य भावना ने महाभारत की महान नायिका द्रौपदी को समकालीन दृष्टि से मंच पर जीवंत किया। निवेदिता महापात्रा के निर्देशन में यह प्रस्तुति केवल पौराणिक कथा का पुनर्कथन नहीं, बल्कि स्त्री अस्मिता, संघर्ष और प्रतिरोध की प्रभावशाली व्याख्या बनकर उभरी। द्रौपदी के जीवन के माध्यम से नाटक आज की सामाजिक संरचना में महिलाओं की स्थिति पर संवेदनशील प्रश्न खड़े करता है। अद्वितीय सौंदर्य, तीक्ष्ण बुद्धि और अपराजेय आत्मबल से युक्त द्रौपदी पुरुष-प्रधान व्यवस्था की क्रूरता का सामना करती है। स्वयंवर, पांच पतियों से विवाह और जुए की सभा में दांव पर लगाया जाना स्त्री को वस्तु समझने वाली मानसिकता को उजागर करता है। भरी सभा में अपमान और मौन साधे पुरुषों के बीच द्रौपदी अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाती है और प्रतिरोध का प्रतीक बनती है। यह प्रस्तुति उन्हें पीड़िता नहीं, बल्कि संघर्षशील और प्रश्न करने वाली स्त्री के रूप में स्थापित करती है। वनवास से लेकर युद्ध और स्वर्गारोहण तक द्रौपदी का संघर्ष निरंतर चलता रहता है। अंतिम यात्रा में उनका अकेला गिरना स्त्री जीवन की अनकही पीड़ा को गहराई से छूता है। ओडिसी की कोमलता और मयूरभंज छऊ की ऊर्जस्विता का सुंदर समन्वय इस नृत्य-नाटिका को कलात्मक रूप से सशक्त बनाता है। द्रौपदी : एक अदम्य भावना दर्शकों से यह प्रश्न करती है कि क्या आज की स्त्री अब भी द्रौपदी है, या अपने भीतर की शक्ति से नई कथा रच रही है। यक्षगान : लोकनाट्य की जीवंत परंपरा उडुपी, कर्नाटक के लोकनाट्य यक्षगान की प्रभावशाली प्रस्तुति भारत भवन में देखने को मिली। महाभारत से प्रेरित इस नाट्य का निर्देशन यक्षगान विशेषज्ञ एवं थिएटर यक्ष के संस्थापक पृथ्वीराज क्वामथर ने किया। प्रस्तुति में महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन की कथा दिखाई गई, जहाँ द्रोणाचार्य द्वारा रचित चक्रव्यूह में प्रवेश कर वीर अभिमन्यु अद्वितीय साहस और कर्तव्यबोध का परिचय देता है। उसका बलिदान दर्शकों को भावुक कर गया। संगीत, नृत्य और संवाद से सजी इस प्रस्तुति ने यक्षगान की लोकशैली को समकालीन संवेदना के साथ प्रस्तुत किया, जिसे दर्शकों ने भरपूर सराहा। महाभारत समागम का समापन समारोह आज, ये होंगे प्रस्तु तियाँ महाभारत समागम के समापन समारोह अंतर्गत पूर्व रंग के मंच पर सायं 5 बजे मयूरभंज छाऊ शैली में शुभश्री मुखर्जी निर्देशित अभिमन्यु् वध, अंतरंग सभागार में कुचिपुड़ी नृत्या नाटिका चित्रांगदा का मंचन होगा। जिसका निर्देशन अमृता लहरी, नई दिल्ली द्वारा किया गया है। इसी मंच पर दूसरी प्रस्तु ति हिरोशी कोइके द्वारा निर्देशित नाटक महाभारत का मंचन किया जायेगा। जबकि बहिरंग के मंच पर भरत प्रभात द्वारा निर्देशित अठ्ठारह दिन की प्रस्तुमति होगी।