लेख
24-Jan-2026
...


वैश्विक स्तरपर 19-23 जनवरी 2026 को स्विट्ज़रलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 56वीं वार्षिक बैठक इतिहास में केवल आर्थिक बहसों के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका और उसके परंपरागत सहयोगियों के बीच खुले कूटनीतिक टकराव के लिए याद की जाएगी।यह वही मंच है,जहाँ वैश्विक सहमति बनती रही है, लेकिन इस बार वैश्विक असहमति ने स्वर लिया।ट्रंप का यह दूसरा कार्यकाल अब स्पष्ट रूप से संकेत दे रहा है कि अमेरिका फर्स्ट अब अमेरिका अलोन की ओर बढ़ रहा है, और यही बात यूरोप,कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों के लिए असहनीय बनती जा रही है।22 जनवरी को ट्रंप जब दावोस के लिए रवाना हो रहे थे, तभी उनके विमान में तकनीकी खराबी आ गई।उन्हें सीमा क्षेत्र में आपात लैंडिंग करनी पड़ी और फिर दूसरे विमान से दावोस पहुँचना पड़ा।यह घटना केवल एक तकनीकी व्यवधान नहीं थी,बल्कि कई विश्लेषकों ने इसे अमेरिकी नेतृत्व की अस्थिरता का प्रतीकात्मक संकेत माना।योजना के अनुसार ट्रंप को 45 मिनट का भाषण देना था, लेकिन उन्होंने 70 मिनट तक मंच पर रहकर यूरोप,नाटो, कनाडा और वैश्विक व्यवस्था पर तीखा हमला बोला। यह भाषण रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक और चेतावनी-भरा था। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह समझता हूं क़ि ट्रंप का दावोस भाषण यह स्पष्ट करता है कि वे अब साझेदारी की भाषा छोड़ चुके हैं और शक्ति की राजनीति को खुलकर अपना चुके हैं।उनके भाषण के पाँच प्रमुख बिंदु (1) ग्रीनलैंड की सुरक्षा केवल अमेरिका कर सकता है,संप्रभुता पर खुली चुनौती (2)(3) कनाडा अमेरिका की वजह से है,मित्र राष्ट्र का अपमान (4) नाटो पर ट्रंप का अविश्वास: सुरक्षा गठबंधन की नींव हिलती हुई (5) ग्रीनलैंड के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं करेंगेलेकिन शर्तों के साथ यह पांचो बातें विश्व राजनीति में दूरगामी प्रभाव डालते हैं। साथियों बात अगर हम ट्रंप द्वारा दाओस 2026 में 70 मिनट क़े भाषण में पांच बातों को विस्तार से समझने की करें तो (1) ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा केवल अमेरिका कर सकता है,और यह किग्रीनलैंड अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य है।यह बयान डेनमार्क और यूरोपीय यूनियन की संप्रभुता पर सीधा आघात है।ग्रीनलैंड न केवल आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है,बल्किदुर्लभ खनिजों,सामरिक समुद्री मार्गों, और भविष्य की ऊर्जा राजनीति का केंद्र भी है। ट्रंप का यह दावा बताता है कि अमेरिका अब अंतरराष्ट्रीय कानून से ऊपर स्वयं को मानने की मानसिकता में प्रवेश कर चुका है।(2) ग्रीनलैंड पर कब्जे का विरोध करने के लिए ट्रंप ने डेनमार्क को अहसान -फरामोश कहा। यह भाषा किसी राष्ट्राध्यक्ष की नहीं, बल्कि कॉरपोरेट बॉस या गैंग लीडर की शैली जैसी प्रतीत होती है।यही कारण है कि यूरोपीय सांसदों और मीडिया ने ट्रंप को इंटरनेशनल गैंगस्टर तक कहा। यह छवि अब केवल आलोचना नहीं, बल्कि वैश्विक धारणा बनती जा रही है। (3) ट्रंप ने कहा कि आज का कनाडा अमेरिका की वजह से है,और कनाडा के पीएम को यह याद रखना चाहिए।यह बयान न केवल ऐतिहासिक रूप से भ्रामक है, बल्कि कनाडा की संप्रभुता और आत्मसम्मान पर सीधा हमला है।यही कारण है कि कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कारने का भाषण दावोस का सबसे चर्चित भाषण बन गया।मार्क कारने का जवाब,झूठ की दुनिया बनाम सम्मान की राजनीति मार्क कारने ने कहा, हम एक झूठ की दुनियाँ में जी रहे हैं, जहाँ कमजोर देशों से यह उम्मीद की जाती है कि वे ताकतवर देशों के सामने झुक जाएँ। यह सोच कि इससे उनके हित सुरक्षित रहेंगे,एक प्रकार की गुलामी है और यह अब नहीं चलेगी। उनकी पाँच मुख्य बातें स्पष्ट संकेत देती हैं कि अमेरिका -केंद्रित वैश्विक व्यवस्था अब टूट रही है।(4)ट्रंप ने कहा कि उन्हें शक है कि जरूरत पड़ने पर नाटो अमेरिका की मदद करेगा या नहीं।यह बयान नाटो जैसे संगठन की आत्मा पर प्रहार है।यदि अमेरिका स्वयं अपने बनाए गठबंधन पर विश्वास नहीं करता,तो यूरोप क्यों भरोसा करे?छोटे देश क्यों आश्वस्त रहें?यही कारण है कि यूरोप अब स्वतंत्र सुरक्षा संरचना पर गंभीरता से विचार कर रहा है।(5) ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं करेगा,लेकिन यह कथन किसी आश्वासन की तरह नहीं, बल्कि रणनीतिक दबाव जैसा लगा।इतिहास गवाह है कि अमेरिका पहले ताकत नहीं कहता है,फिर आर्थिक दबाव,प्रतिबंध,और अंततः सैन्य उपस्थिति के ज़रिए लक्ष्य हासिल करता है। साथियों बात अगर हम भारत- यूरोप- अमेरिका त्रिकोण : रणनीतिक संतुलन की नई परीक्षा इसको समझने की करें तो,भारत-यूरोप-अमेरिका का त्रिकोण लंबे समय तक लोकतांत्रिक मूल्यों, मुक्त व्यापार और साझा सुरक्षा हितों पर आधारित माना जाता रहा है, लेकिन ट्रंप युग की आक्रामक अमेरिका फर्स्ट नीतिने इस संतुलन को अस्थिर कर दिया है। यूरोप अब खुलकर अमेरिकी दबावों का विरोध कर रहा है, जबकि भारत इस टकराव में प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की नीति पर चल रहा है। भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों है,अवसर इसलिए कि यूरोप अब भारत को एक भरोसेमंद आर्थिक और राजनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है, और चुनौती इसलिए कि अमेरिका अब साझेदारी को बराबरी नहीं,बल्कि अधीनता की शर्तों पर परखना चाहता है।इस त्रिकोण में भारत की भूमिका बैलेंसिंग पावर की बनती जा रही है। यूरोप भारत के साथ व्यापार, टेक्नोलॉजी और सप्लाई-चेन में सहयोग बढ़ाना चाहता है, जबकि अमेरिका भारत को चीन-विरोधी रणनीति के एक औज़ार की तरह देखता है। ऐसे में भारत के लिए स्पष्ट है कि उसे किसी एक ध्रुव में बंधने के बजाय मल्टी-अलाइनमेंट की नीति को और मज़बूत करना होगा।दावोस 2026 के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत-यूरोप संबंध अधिक गहरे होंगे, जबकि अमेरिका के साथ रिश्ते हित-आधारित लेकिन सतर्क रहेंगे। साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता : शक्ति बनाम नियमों की टकराहट इसको समझने की करें तो,अंतरराष्ट्रीय कानून की मूल आत्मा संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और आपसी सहमति पर आधारित है, लेकिन ट्रंप की भाषा और दावोस में दिए गए बयान इन सिद्धांतों को चुनौती देते दिखाई देते हैं। ग्रीनलैंड को लेकर सुरक्षा के नाम पर दावा करना,डेनमार्क जैसे संप्रभु देश को अपमानित करना और सहयोगी देशों पर दबाव बनाना यह दर्शाता है कि अमेरिका अब नियम-आधारित व्यवस्था से शक्ति-आधारित व्यवस्था की ओर झुक रहा है। यह रुख केवल यूरोप के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक खतरनाक मिसाल बन सकता है।भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि भारत हमेशा से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संप्रभुता और गैर- हस्तक्षेप का पक्षधर रहा है। यदि शक्तिशाली देश खुले तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी करने लगें, तो छोटे और मध्यम देशों की सुरक्षा और स्वायत्तता खतरे में पड़ सकती है। इसी कारण भारत और यूरोप दोनों के हित इस बात में निहित हैं कि वे संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और बहुपक्षीय संस्थाओं को मज़बूत करें। दावोस 2026 यह स्पष्ट संकेत देता है कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा संघर्ष कानून बनाम ताकतके बीच होगा, और इसी संघर्ष में नई विश्व व्यवस्था का स्वरूप तय होगा। साथियों बात अगर हम 23 जनवरी 2026 को समाप्त हुई दओस बैठक की करें तो इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यूरोपीय नेता अब बंद कमरों में नहीं,खुले मंच से ट्रंप का विरोध कर रहे हैं।फ्रांस के राष्ट्रपति एम्मानुएल मैक्रों ने कहा,यूरोप को अब अमेरिका की ताकत के सामने झुकने की आदत छोड़नी होगी।ब्रिटेन के पीएम ने स्पष्ट किया कि वे ग्रीनलैंड मुद्दे पर और टैरिफ धमकियों पर अमेरिका के दबाव में नहीं झुकेंगे।यह बयान इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि ब्रिटेन अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी माना जाता रहा है।अब व्यक्तिगत अहंकारों से संचालित हो रही है।अमेरिका फर्स्ट से विश्व फर्स्ट की टकराहट,ट्रंप का अमेरिका फर्स्ट अब स्पष्ट रूप से बहुपक्षीय संस्थाओं,अंतरराष्ट्रीय नियमों,और साझी जिम्मेदारियों के खिलाफ खड़ा दिखाई देता है। इसके विपरीत, यूरोप और कनाडा सम्मान, साझेदारी और संतुलन की बात कर रहे हैं।दावोस 2026 यह संकेत देता है कि अमेरिका का निर्विवाद नेतृत्व समाप्त हो रहा है,दुनियाँ बहुध्रुवीय नहीं,बल्कि खंडित हो रही है। यह बदलाव किसी नए संतुलन की ओर नहीं,बल्कि अनिश्चितता और टकराव की ओर संकेत करता है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि दावोस 2026 इतिहास का मोड़ हैं, दावोस 2026 केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि अमेरिका और उसकेसहयोगियों के बीच विश्वास के टूटने का दस्तावेज़ बन गया है।डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक भाषा,यूरोप का खुला प्रतिरोध,कनाडा और ब्रिटेन की स्पष्ट असहमति ये सब संकेत हैं कि पुरानी विश्व व्यवस्था अब टिकाऊ नहीं रही।दुनिया किसी नए नेतृत्व की ओर नहीं, बल्कि नए संघर्षों और नई सच्चाइयों की ओर बढ़ रही है।यह केवल ट्रंप युग नहीं, बल्कि एक युगांत का संकेत है। (संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र ) ईएमएस / 24 जनवरी 26