एक समय अवांछनीय व्यक्तियों या तत्वों को हटाने के लिए मुख्यत: शस्त्रबल से ही काम लिया जाता था। तब विचारशक्ति की व्यापकता का क्षेत्र खुला न था। बहुसंख्यक जनता को एक दिशा में सोचने, कुछ करने या संगठित करने के लिए उपयुक्त साधन न थे। इसलिए संसार में जब भी अनाचार, पाप, अनौचित्य फैलता था, तब उस अनौचित्य का निवारण युद्ध द्वारा शस्त्रबल से किया जाता था। प्राचीनकाल में युग परिवर्तन की यही भूमिका रही है। इसी कारण रावण, कंस, हिरण्यकशिपु आदि अनीतिमूलक वातावरण उत्पन्न करने वालों को परास्त करनेवाले महामानवों को अवतार, देवदूत आदि सम्मानों से सम्मानित किया गया। पिछले कई वर्षो में विज्ञान ने अद्भुत प्रगति की है। संसार की अनेक सभ्यताओं और विचारधाराओं ने एक-दूसरे को प्रभावित करना आरम्भ किया। साथ ही ऐसे शस्त्रों का आविष्कार आरम्भ हुआ, जिससे युद्ध केवल दो देशों के बीच संभव न रहा। सरकारी कानून के तहत व्यक्तिगत लड़ाइयां असंभव हो गई। आज किसी देश का प्रधानमंत्री भी किसी का वध कर डाले, तो उसे जरूरी सजा भुगतनी ही पड़ेगी। पुराने जमाने में योद्धा तलवार से निपट लेते थे, पर अब तो युद्ध के अस्त्र-शस्त्र तथा क्रियाकलाप इतने महंगे हैं कि एक सैनिक को मारने का खर्च प्राय: हजारों रुपये पड़ जाता है। उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय गुटबंदी और सहायताएं, सहानुभूतियां भी काम करती हैं। इस वैज्ञानिक युग में पिछले दो युद्ध अनंत संहारक साधनों से लड़े गये, फिर भी उनसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ। कहने का तात्पर्य इतना भर है कि प्राचीनकाल में अनीति व अनुपयुक्त परिस्थितियों का मूल कारण बने व्यक्तियों को निरस्त करने से वातावरण बदल जाता था, पर वैज्ञानिक प्रगति ने इस संभावना को समाप्त कर दिया। पहले कुछ शक्तिशाली शासक ही भला-बुरा वातावरण बनाने के निमित्त होते थे पर अब जनता के हर नागरिक को अपनी शक्तियां विकसित करने और उपयोग करने की ऐसी सुविधा मिल गई है कि वह स्वयं स्वतंत्र इकाई के रूप में समाज पर भारी प्रभाव छोड़ता है। अस्तु, अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होने के शात सत्य के साथ इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि विकृत मन:स्थिति ही एकमात्र कारण है, जिसने संकटों के तूफान खड़े कर दिये हैं, अन्यथा पुराने समय में स्वल्प साधनों के रहते लोग हंसते-हंसाते जीवन जीते रहे, तो अब साधन सुविधाओं की विपुलता होते हुए विपन्न और उद्विग्न स्थिति में दिन गुजारने का अन्य कोई कारण नहीं। ईएमएस फीचर