लेख
25-Jan-2026
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26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस केवल एक तारीख नहीं है, यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का उत्सव है। यह वह ऐतिहासिक दिन है जब भारत ने स्वयं को केवल आज़ाद राष्ट्र ही नहीं बल्कि एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। इस दिन हमने अपने संविधान को अपनाया, जिसने हमें अधिकार ही नहीं दिए बल्कि कर्तव्यों की याद भी दिलाई। गणतंत्र दिवस हमें यह समझाता है कि राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता, बल्कि हर नागरिक के आचरण, सोच और कर्म से बनता है। यही दिन लोकतंत्र की भावना का सम्मान करने, संविधान के मूल्यों को आत्मसात करने और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका पर आत्ममंथन करने का अवसर देता है। भारत की पहचान उसकी समृद्ध संस्कृति, उसकी एकता और उसकी विविधता से है। गणतंत्र दिवस पर हम केवल परेड, झांकियों और तिरंगे को देखकर भावुक नहीं होते, बल्कि उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों को भी याद करते हैं जिन्होंने इस देश की मिट्टी को अपने रक्त से सींचा। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे वीरों ने हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चुना। गांधी जी ने सत्य और अहिंसा के बल पर साम्राज्यवाद की नींव हिला दी। जलियाँवाला बाग की अमानवीय घटना आज भी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी कितनी भारी कीमत चुकाकर मिली है। अंग्रेजों की गोलियाँ हमारे शरीर को छलनी कर सकती थीं, लेकिन हमारे हौसलों को नहीं। उसी संघर्ष का परिणाम है कि आज हमारा तिरंगा स्वतंत्र आकाश में गर्व से लहरा रहा है। गणतंत्र दिवस हमें केवल अतीत पर गर्व करने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान की समीक्षा और भविष्य की दिशा तय करने के लिए प्रेरित करता है। स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस, यदि हम इन्हें केवल औपचारिक उत्सव बनाकर संतुष्ट हो जाएँ तो यह उन बलिदानों के साथ अन्याय होगा। ऐसे राष्ट्रीय पर्व मूल्यांकन दिवस होने चाहिए, जब हम खुले मस्तिष्क और शांत हृदय से यह सोचें कि हमने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक स्तर पर क्या हासिल किया और क्या करना अभी बाकी है। हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हम संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के आदर्शों को अपने जीवन में उतार पाए हैं। राम के जीवन का एक प्रसंग हमें वचन की महत्ता समझाता है। दिए हुए वचन को निभाने के लिए राम ने राजपाट तक त्याग दिया। आज जब राजनीति में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं और वे पूरे नहीं होते, तब राम का जीवन हमें आत्मचिंतन के लिए विवश करता है। लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है और सत्ता सेवा का माध्यम होनी चाहिए, स्वार्थ का नहीं। नेता और सरकार यदि राम के चरित्र से प्रेरणा लें तो शासन का स्वरूप अपने आप बदल सकता है। प्रजा से राजा है, राजा से प्रजा नहीं, यह भावना यदि व्यवहार में उतर जाए तो शासन जनकल्याण का सच्चा माध्यम बन सकता है। गांधी जी ने स्वतंत्र भारत का जो सपना देखा था, उसका केंद्र रामराज्य था। रामराज्य का अर्थ किसी धार्मिक शासन से नहीं बल्कि सद्गुणों के साम्राज्य से है, जहाँ सत्य, न्याय, करुणा और नैतिकता सर्वोपरि हों। आज स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, असमानता और सामाजिक विषमता जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। सत्ता का मोह और स्वार्थ इन समस्याओं को और गहरा कर देता है। गणतंत्र दिवस पर यह संकल्प लेने की आवश्यकता है कि शासन व्यवस्था जनकल्याण की भावना से संचालित हो और नागरिक भी अपने आचरण से राष्ट्र को मजबूत बनाएँ। गरीबी उन्मूलन आज भी भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है। केवल सरकारी योजनाओं से ही गरीबी समाप्त नहीं होगी, इसके लिए समाज और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। शिक्षा, कौशल विकास, स्वरोजगार और समान अवसर ही गरीबी के स्थायी समाधान हैं। गणतंत्र दिवस हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं। क्या हम किसी ज़रूरतमंद बच्चे की पढ़ाई में सहयोग कर सकते हैं, क्या हम ईमानदारी से कर देकर राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को मजबूत बना सकते हैं, क्या हम अपने काम में उत्कृष्टता लाकर देश की उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। जब हर नागरिक अपने कर्तव्य को समझेगा, तभी गरीबी जैसी समस्याओं पर विजय संभव होगी। गणतंत्र केवल शासन की एक प्रणाली नहीं है, बल्कि यह नागरिकों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार देता है। वोट देना केवल अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी है। जागरूक और विवेकपूर्ण मतदान से ही स्वस्थ लोकतंत्र बनता है। गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हमें जाति, धर्म या तात्कालिक लाभ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में निर्णय लेने चाहिए। लोकतंत्र तभी उपयोगी है जब उसमें जनता की आवाज़ सशक्त हो और शासन जवाबदेह हो। संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन उसके साथ यह दायित्व भी दिया है कि हम उसका प्रयोग जिम्मेदारी से करें। आज के वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। विदेशी व्यापार और विदेश नीति में संतुलित और दूरदर्शी बदलाव भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से शक्तिशाली बना सकते हैं। आत्मनिर्भर भारत का संकल्प केवल नारा नहीं बल्कि व्यवहार में उतरने वाली सोच है। स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर, नवाचार को प्रोत्साहित करके और वैश्विक मंचों पर आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखकर भारत विश्वगुरु की दिशा में आगे बढ़ सकता है। गणतंत्र दिवस पर यह संकल्प दोहराना आवश्यक है कि भारत न केवल आर्थिक महाशक्ति बने बल्कि नैतिक नेतृत्व भी प्रदान करे। सरकार के दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं। सरकार का कर्तव्य है कि वह पारदर्शी, जवाबदेह और संवेदनशील शासन दे, वहीं नागरिकों का कर्तव्य है कि वे कानून का पालन करें, सामाजिक सद्भाव बनाए रखें और राष्ट्रहित में योगदान दें। स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान, सामाजिक समरसता जैसे विषय केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं हैं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी हैं। गणतंत्र दिवस पर आम नागरिक यह संकल्प ले सकता है कि वह संविधान का सम्मान करेगा, दूसरों के अधिकारों का आदर करेगा और समाज में सकारात्मक भूमिका निभाएगा। आज जब हम तिरंगे को सलामी देते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि यह ध्वज केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि हमारे त्याग, संघर्ष और उम्मीदों का प्रतीक है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के आदर्श केवल संविधान की प्रस्तावना तक सीमित न रहें, बल्कि हमारे व्यवहार का हिस्सा बनें। गणतंत्र दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम आत्ममंथन करें, संकल्प लें और कर्मपथ पर आगे बढ़ें। अंत में यही कहा जा सकता है कि गणतंत्र हमारे लिए तभी उपयोगी है जब हम उसे जीएँ, समझें और निभाएँ। यह दिन हमें अतीत के बलिदानों को नमन करने, वर्तमान की जिम्मेदारियों को समझने और भविष्य के भारत का सपना देखने की प्रेरणा देता है। आइए, इस गणतंत्र दिवस पर हम सब मिलकर यह प्रण लें कि हम एक सजग, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनेंगे, अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करेंगे और भारत को सशक्त, समृद्ध और गौरवशाली बनाने में अपना योगदान देंगे। तिरंगे को सलाम, संविधान को प्रणाम और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए एकजुट कदम बढ़ाएँ। जय हिंद, जय भारत। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्ययकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 25 जनवरी /2026