अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तकरार केवल दो देशों का आपसी विवाद नहीं है। यह पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता और वैश्विक शांति के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक विदेश नीति ने एक बार फिर दुनिया को तनाव के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। अरब सागर में अमेरिकी जंगीपोत की तैनाती और ईरान को खुले तौर पर चेतावनी देना उसी नीति का विस्तार है जिसमें संवाद के बजाय दबाव और शक्ति प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जा रही है। ट्रम्प का यह दावा कि ईरान के कई शहर अमेरिकी जंगीपोत की स्ट्राइक रेंज में हैं केवल सैन्य बयान नहीं है। यह एक राजनीतिक संदेश है जो डर के माध्यम से अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश को दिखाता है। दूसरी ओर ईरान ने भी साफ कर दिया है कि खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे उसके निशाने पर हैं। इस तरह की बयानबाजी से यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्ष टकराव की भाषा बोल रहे हैं और कूटनीति को हाशिये पर डाल दिया गया है। ईरान के भीतर की स्थिति भी चिंताजनक है। राजधानी तेहरान सहित कई शहरों में लंबे समय से इंटरनेट बंद है। कॉलेज और यूनिवर्सिटी बंद पड़ी हैं। बसीज फोर्स द्वारा युवाओं की डोर टू डोर जांच यह दर्शाती है कि सरकार किसी भी संभावित विरोध को जड़ से खत्म करना चाहती है। हालिया प्रदर्शनों में युवाओं की बड़ी भागीदारी ने सरकार को चौंका दिया था। अब उसी डर के कारण व्यापक सख्ती अपनाई जा रही है। इस पूरे परिदृश्य में अमेरिकी राष्ट्रपति का ईरानी युवाओं के समर्थन का दावा खोखला नजर आता है। जब इंटरनेट बंद है और लोग एक दूसरे से संवाद तक नहीं कर पा रहे हैं तब केवल बयान देने से कोई ठोस मदद नहीं होती। यह दोहरा रवैया ट्रम्प प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है। एक ओर मानवाधिकारों की बात और दूसरी ओर सैन्य दबाव यही विरोधाभास उनकी विदेश नीति की पहचान बन चुका है। ट्रम्प इससे पहले भी कई देशों के साथ इसी तरह का व्यवहार कर चुके हैं। चाहे वह ईरान के साथ परमाणु समझौते से एकतरफा बाहर निकलना हो या फिर अन्य देशों पर आर्थिक प्रतिबंध थोपना। हर जगह अमेरिका पहले अपने हितों को रखता है और वैश्विक सहमति की अनदेखी करता है। इससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की साख कमजोर होती है और शक्ति संतुलन बिगड़ता है। शांति के नोबेल पुरस्कार की इच्छा रखने वाले ट्रम्प का आचरण इस आकांक्षा से मेल नहीं खाता। किसी भी नेता का मूल्यांकन उसके शब्दों से नहीं बल्कि उसके कर्मों से होता है। जब हर मोर्चे पर टकराव बढ़ाया जाए और हर समस्या का समाधान दबाव में देखा जाए तो शांति की बात केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाती है। भारत के संदर्भ में भी अमेरिकी नीति पर प्रश्न उठते हैं। सार्वजनिक मंचों पर मित्रता और रणनीतिक साझेदारी की बातें होती हैं लेकिन कई मौकों पर ऐसे निर्णय लिए गए जो भारत के हितों के खिलाफ जाते हैं। व्यापार से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अमेरिका का रवैया अवसरवादी रहा है। यह दर्शाता है कि ट्रम्प प्रशासन के लिए रिश्ते स्थायी नहीं बल्कि जरूरत आधारित हैं। विश्व राजनीति में ऐसी स्वार्थपरक नीति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होती। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी महाशक्ति ने केवल अपने हितों को सर्वोपरि रखा है तो अंततः उसे वैश्विक असंतोष का सामना करना पड़ा है। आज अमेरिका उसी राह पर चलता दिख रहा है जहां सहयोग की जगह दबदबा और संवाद की जगह धमकी ले रही है। ईरान संकट इसका ताजा उदाहरण है। पश्चिम एशिया पहले से ही अस्थिरता से जूझ रहा है। सीरिया यमन और इराक जैसे देशों में संघर्ष के घाव अभी भरे भी नहीं हैं। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव पूरे क्षेत्र को आग में झोंक सकता है। इसका असर केवल सीमित नहीं रहेगा बल्कि ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था भी इसकी चपेट में आएगी। ईरान की जनता खासकर युवा वर्ग इस संघर्ष का सबसे बड़ा शिकार बन रहा है। महंगाई बेरोजगारी और सामाजिक पाबंदियों के बीच उनका भविष्य और भी अनिश्चित होता जा रहा है। सरकार की सख्ती और बाहरी दबाव ने उनकी स्थिति को दोहरी मार में बदल दिया है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी बनती है कि वह सैन्य धमकियों के बजाय मानवीय दृष्टिकोण अपनाए। ट्रम्प की नीति से अमेरिका की वैश्विक छवि को भी नुकसान पहुंचा है। जिस देश को लोकतंत्र और स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता था वही आज कई देशों की नजर में अस्थिरता का कारण बनता जा रहा है। मित्र और विरोधी दोनों ही अमेरिका के इरादों को लेकर असमंजस में हैं। यह स्थिति किसी भी महाशक्ति के लिए खतरनाक संकेत है। विश्व व्यवस्था सहयोग और विश्वास पर टिकी होती है। जब कोई देश बार बार अपने वादों से मुकरता है और केवल ताकत के दम पर फैसले करता है तो यह ढांचा कमजोर पड़ता है। ट्रम्प प्रशासन के दौरान यही कमजोरियां उजागर हुई हैं। चाहे जलवायु समझौते से बाहर निकलना हो या फिर अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों की अनदेखी हर जगह यही प्रवृत्ति दिखती है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का समाधान युद्ध नहीं हो सकता। इतिहास बताता है कि युद्ध समस्याओं को खत्म नहीं करता बल्कि नई समस्याओं को जन्म देता है। जरूरत इस बात की है कि बातचीत और कूटनीति को फिर से प्राथमिकता दी जाए। क्षेत्रीय देशों और वैश्विक शक्तियों को मिलकर ऐसा रास्ता निकालना होगा जो शांति और स्थिरता सुनिश्चित करे। भारत जैसे देशों के लिए भी यह समय सतर्क रहने का है। बदलती वैश्विक राजनीति में संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति ही राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकती है। किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में जोखिम भरी साबित हो सकती है। अंत में यह स्पष्ट है कि ट्रम्प की आक्रामक और स्वार्थ आधारित राजनीति से न तो अमेरिका को दीर्घकालिक लाभ होगा और न ही दुनिया को शांति मिलेगी। शक्ति का प्रदर्शन क्षणिक प्रभाव डाल सकता है लेकिन स्थायी समाधान केवल सहयोग और विश्वास से ही निकलता है। यदि अमेरिका वास्तव में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहता है तो उसे टकराव की जगह संवाद और दबाव की जगह साझेदारी का रास्ता चुनना होगा। यही रास्ता विश्व को एक और बड़े संकट से बचा सकता है। ईएमएस/27/01/2026