लेख
28-Jan-2026
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उच्च शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक समाज की रीढ़ होती है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाली संस्थाएं नहीं होते, बल्कि वे ऐसे मंच होते हैं जहां समान अवसर, विचारों की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्य आकार लेते हैं। भारत जैसे विविधता से भरे देश में यह सवाल हमेशा से प्रासंगिक रहा है कि क्या हमारे शैक्षणिक परिसरों में सभी छात्रों को समान सम्मान और अवसर मिल पाते हैं। इसी पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किए गए नए नियम ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 सामने आए हैं। इन नियमों का उद्देश्य स्पष्ट रूप से जाति आधारित भेदभाव को रोकना और वंचित वर्गों को संरक्षण देना बताया गया है। लेकिन इन्हीं नियमों को लेकर देश के कई हिस्सों में तीखा विरोध भी देखने को मिल रहा है। यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसमें छात्रों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों की वास्तविक आशंकाएं भी जुड़ी हुई हैं। सरकार और यूजीसी का तर्क यह है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की घटनाएं कोई कल्पना नहीं हैं। बीते एक दशक में सामने आई कुछ दर्दनाक घटनाओं ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों ने यह सवाल उठाया कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप करने में विफल रहा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नियमों को सख्त करने की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उसका मकसद जवाबदेही तय करना और यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी छात्र को जाति के आधार पर अपमान, उपेक्षा या उत्पीड़न का सामना न करना पड़े। इस दृष्टि से हर कॉलेज में ईक्वल अपॉर्च्युनिटी सेंटर, इक्वलिटी कमेटी और निगरानी तंत्र बनाने का प्रस्ताव एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। यह व्यवस्था उन छात्रों के लिए एक औपचारिक मंच उपलब्ध कराती है, जो अब तक शिकायत दर्ज कराने से डरते रहे हैं या जिनकी आवाज दबा दी जाती थी। सरकार का यह भी कहना है कि नियमों में सख्ती इसलिए जरूरी है क्योंकि केवल सलाह या दिशानिर्देश पर्याप्त साबित नहीं हुए। पहले के नियमों में दंड का अभाव था, जिसके कारण कई संस्थानों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। नए प्रावधानों में ग्रांट रोकने या मान्यता रद्द करने जैसे कठोर कदम शामिल कर यह संदेश दिया गया है कि जातीय भेदभाव को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा। इस तर्क में एक हद तक दम है, क्योंकि किसी भी कानून या नियम की प्रभावशीलता उसके पालन से जुड़ी होती है, और पालन अक्सर दंड के भय से ही सुनिश्चित होता है। लेकिन दूसरी ओर, इन नियमों को लेकर जो विरोध सामने आया है, उसे केवल पूर्वाग्रह या राजनीतिक उकसावे का परिणाम मान लेना भी उचित नहीं होगा। जनरल कैटेगरी के छात्रों और कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि नियमों की भाषा और संरचना असंतुलित है। भेदभाव की परिभाषा में केवल कुछ वर्गों को पीड़ित के रूप में चिन्हित किया गया है, जबकि जनरल कैटेगरी को इस दायरे से बाहर रखा गया है। इससे यह संदेश जाता है कि एक वर्ग को संभावित अपराधी और दूसरे को संभावित पीड़ित के रूप में पहले से ही तय कर दिया गया है। किसी भी न्यायपूर्ण व्यवस्था में यह धारणा स्वयं में समस्या पैदा कर सकती है। सबसे अधिक चिंता झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के संदर्भ में जताई जा रही है। प्रारंभिक ड्राफ्ट में गलत शिकायत करने पर दंड का प्रावधान था, जिसे अंतिम नियमों से हटा दिया गया। आलोचकों का तर्क है कि इससे नियमों का दुरुपयोग आसान हो जाएगा। शिक्षा संस्थान पहले ही आंतरिक राजनीति, गुटबाजी और व्यक्तिगत टकरावों से अछूते नहीं हैं। ऐसे माहौल में यदि शिकायतकर्ता पर कोई जवाबदेही न हो, तो निष्पक्ष जांच की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हालांकि यह भी सच है कि झूठी शिकायतों की आशंका के कारण वास्तविक पीड़ितों को न्याय से वंचित करना भी गलत होगा। यहां संतुलन की आवश्यकता थी, जिसे नियमों में स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं किया गया। इक्वलिटी कमेटी की संरचना भी विवाद का विषय बनी है। इसमें एसवी,, एसटी, ओबीसी महिलाएं और दिव्यांगों को शामिल करना सामाजिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से सही कदम माना जा सकता है, लेकिन जनरल कैटेगरी के किसी सदस्य का अनिवार्य न होना कई सवाल खड़े करता है। विविधता का उद्देश्य केवल वंचित वर्गों की उपस्थिति नहीं, बल्कि सभी दृष्टिकोणों को स्थान देना होता है। यदि किसी वर्ग को पूरी तरह बाहर रखा गया, तो कमेटी के फैसलों पर एकतरफापन का आरोप लगना स्वाभाविक है। यह स्थिति न केवल अविश्वास पैदा कर सकती है, बल्कि नियमों की वैधता को भी कमजोर कर सकती है। कॉलेज प्रशासन की भूमिका भी इन नियमों के बीच जटिल हो गई है। 24 घंटे में मीटिंग और तय समयसीमा में कार्रवाई जैसे प्रावधान त्वरित न्याय के इरादे से बनाए गए हैं, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर यह दबाव पैदा कर सकते हैं। शिक्षण संस्थान केवल अनुशासनात्मक ढांचे नहीं होते, वे अकादमिक निर्णय भी लेते हैं, जिनमें समय, विचार और परामर्श की जरूरत होती है। यदि हर निर्णय पर सजा का भय मंडराएगा, तो यह आशंका है कि कॉलेज मेरिट के बजाय जोखिम से बचने की नीति अपनाएं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता और स्वायत्तता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। एक और महत्वपूर्ण सवाल यूसीजी के अधिकार क्षेत्र को लेकर उठाया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यूजीसी एक्ट 1956 मुख्य रूप से अकादमिक मानकों और वित्तीय सहायता तक सीमित है, और जातीय उत्पीड़न जैसे सामाजिक मुद्दों पर सीधे नियम बनाना उसके अधिकार से बाहर है। यह एक संवैधानिक और कानूनी बहस का विषय है, जिस पर अंतिम निर्णय न्यायपालिका ही करेगी। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं यह संकेत देती हैं कि यह मुद्दा केवल नीतिगत नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। इन सभी तर्कों के बीच यह मानना जरूरी है कि समस्या एकतरफा नहीं है। सरकार यदि गलत है तो इसलिए नहीं कि वह भेदभाव रोकना चाहती है, बल्कि इसलिए कि नियमों के निर्माण में संतुलन और सभी हितधारकों के विश्वास को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। वहीं छात्र यदि सही हैं तो इसलिए नहीं कि वे सामाजिक न्याय के खिलाफ हैं, बल्कि इसलिए कि वे निष्पक्षता, समानता और दुरुपयोग से सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। दोनों पक्षों की चिंताओं में सच्चाई का अंश मौजूद है। आवश्यकता इस बात की है कि नियमों को संवाद के माध्यम से और अधिक परिष्कृत किया जाए। झूठी शिकायतों के लिए स्पष्ट और निष्पक्ष प्रावधान जोड़े जा सकते हैं, कमेटियों की संरचना में सभी वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता है और समयसीमा को व्यवहारिक बनाया जा सकता है। इससे न केवल वंचित छात्रों को सुरक्षा मिलेगी, बल्कि जनरल कैटेगरी के छात्रों का भरोसा भी कायम रहेगा। अंततः शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, न कि नए विभाजन पैदा करना। यदि यूसीजी के नए नियम इस भावना के साथ लागू होते हैं कि हर छात्र समान सम्मान का हकदार है और हर आरोप की निष्पक्ष जांच जरूरी है, तो वे वास्तव में ऐतिहासिक साबित हो सकते हैं। लेकिन यदि आशंकाओं को नजरअंदाज किया गया, तो यह सुधार विवाद और अविश्वास की भेंट चढ़ सकता है। सामाजिक न्याय और निष्पक्षता के बीच संतुलन ही इस पूरे विवाद का मूल समाधान है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 28 जनवरी /2026