मालवण एक कस्बा ही है, महाराष्ट्र का, लेकिन उससे समुद्र टकराता है। उसके कई समुद्री किनारे हैं। मैं चिवला समुद्री किनारे के निकट हूं। कल संझा में आसमान में चांद था, समुद्र के अंतिम छोर पर पश्चिम में सूर्य का लाल गोला टंगा हुआ था और समुद्र की लहरें लाल होती जा रही थीं। हर दिन, हर सुबह, हर शाम। प्रकृति सौंदर्य से भर देती है। हर दिन बीतता है। हर लहर लौटती है। बच्चन की पंक्तियों से प्रकृति अपना स्वर मिलाती है -’ जो बीत गई सो बात गई। /जीवन में एक सितारा था,/माना, वह बेहद प्यारा था,/वह डूब गया तो डूब गया;/अंबर के आनन को देखो,/ कितने इसके तारे टूटे,/कितने इसके प्यारे छूटे,/जो छूट गए फिर कहाँ मिले;/पर बोलो टूटे तारों पर/कब अंबर शोक मनाता है!/जो बीत गई सो बात गई!’ करोड़ों करोड़ लहरें आयीं और गयीं। मगर लहरों के बनते बिगड़ते रूप को लेकर सागर कभी चिंतित नहीं हुआ। कल शाम सैकड़ों लोग समुद्र की लहरों से किल्लोल कर रहे थे। अभी जबकि सुबह के छह बजे हैं। एकाध लोग हैं। समुद्र गरज रहा है। मैं समुद्र किनारे बैठा हूं। समुद्र पर काला अंधेरा फैला है, हहराती लहरें हैं। सिर्फ समुद्र की लहरों के सफेद झाग दिखाई पड़ते हैं। निरंतर समुद्र की आवाजें सुनाई पड़ रही हैं। देश में भी रोर और शोर है। एक तो शंकराचार्य को लेकर और दूसरे यूजीसी के नये नियम को लेकर। यूपी सरकार सच्चे और झूठे शंकराचार्य की तलाश कर रही है। उसे जैसे मन मुताबिक जनता चाहिए, वैसे ही अब मन मुताबिक शंकराचार्य चाहिए। शंकराचार्य और सरकार के बीच में ‘धर्म और राजनीति’ का विद्रूप रूप सतह पर है। शंकराचार्य पर पत्रकार ने आरोप मढ़ा कि आप राजनीति कर रहे हैं। इस पर शंकराचार्य ने जवाब दिया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मंदिरों में पूजा-पाठ कर रहे हैं, वे क्या धर्म में प्रवेश नहीं कर रहे? मैं तो सिर्फ धर्म की सीमाओं में बात कर रहा हूं। प्रधानमंत्री धर्म की राजनीति कर रहे हैं और विद्रूप रूप में कर और करवा रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। वे आज राजनीति में टिके हुए हैं तो वजह धर्म ही है। यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ सिंह ने अप्रत्यक्ष रूप से शंकराचार्य को कालनेमि कहा तो शंकराचार्य ने उन्हें औरंगजेब की उपाधि दे डाली। तथाकथित संतों और साधुओं के दो भाग हो गये हैं। ईश्वर की तलाश करते करते वे थक गये हैं। उन्हें कहीं ईश्वर मिल नहीं रहे, इसलिए सांसारिक दुनिया की उठा-पटक में शामिल हो गए हैं। धर्म के अखाड़ेबाज जिन्हें धर्म की शायद ही कोई जानकारी हो, वे इस लड़ाई में कूद पड़े हैं। अखाड़े बाज अपने अपने आश्रमों में कब्जा करने का ही धंधा करते हैं। धर्म अगर करूणा है, विवेक है, शांति की स्थापना है, अहिंसा है, तो ये सब गुण अब कहां हैं? दूसरी ओर जो लोग कल तक हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए नरेंद्र मोदी जी के समर्थन में खड़े थे, आज यूजीसी के नये नियम पर इतने खफा हैं कि वे नरेंद्र मोदी को चुनौती दे रहे हैं कि इसे वापस करो, नहीं तो गद्दी से उतार देंगे। विश्वविद्यालय कैंपस में जातिवादी उत्पीड़न न हो, इसके लिए यूजीसी ने नये निर्देश जारी किए हैं। क्या ये लोग यह चाहते हैं कि विश्वविद्यालयों में जातिवादी उत्पीड़न होना चाहिए और उनकी हिन्दू राष्ट्र संबंधी संकल्पना के पीछे जातियों की गैर-बराबरी कायम रखना है? दरअसल हाथी मर जाता है, लेकिन जंजीर पर गर्व करते रहने की आदत है। जाति आधारित समाज का कोई भविष्य नहीं है। ऐसे समाज में आदमी क्रमशः मरता चला जाता है। ईएमएस / 28 जनवरी 26