राष्ट्रीय
28-Jan-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस से इस्तीफे ने एक बार फिर सियासी चर्चाओं को तेज कर दिया है। उनके इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या इससे कांग्रेस और खासतौर पर राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा राजनीतिक नुकसान होगा, या फिर यह असर सीमित दायरे तक ही रहेगा। यहां बताते चलें कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर कांशीराम के दौर से शुरू होकर बहुजन समाज पार्टी तक पहुंचा, जहां वे एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता के रूप में उभरे। वर्ष 2007 में मायावती सरकार के दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती थी। हालांकि, बीते एक दशक में उनकी राजनीतिक ताकत लगातार कमजोर होती गई। वे न तो खुद कोई बड़ा चुनाव जीत सके और न ही जिस पार्टी में रहे, उसे निर्णायक लाभ दिला पाए। कांग्रेस में शामिल होने के बाद भी उनकी भूमिका सीमित ही रही। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने सलमान खुर्शीद के साथ मिलकर मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश की। कई सम्मेलन और बैठकें आयोजित की गईं, लेकिन चुनावी नतीजे कांग्रेस के पक्ष में नहीं आए और पार्टी सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई। इससे यह साफ हो गया कि कांग्रेस को नसीमुद्दीन सिद्दीकी से न तो संगठनात्मक मजबूती मिली और न ही चुनावी बढ़त। इसके बावजूद, उनके इस्तीफे को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी कांग्रेस के लिए आसान नहीं है। पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में उनका सीमित लेकिन संगठित समर्थक वर्ग अब भी माना जाता है। यही वजह है कि उनके इस्तीफे के बाद यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय की ओर से उन्हें मनाने की कोशिशों की खबरें सामने आईं। कांग्रेस पहले से ही कमजोर संगठन में किसी और नेता के अलग होने का जोखिम नहीं लेना चाहती। राहुल गांधी के लिए यह मामला व्यावहारिक से ज्यादा प्रतीकात्मक माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की मुख्य रणनीति समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन पर केंद्रित है। मुस्लिम वोट बैंक पर इस समय सपा की मजबूत दावेदारी है, जिसे अखिलेश यादव पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए साधने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस के भीतर इमरान मसूद और इमरान प्रतापगढ़ी जैसे नेताओं के बढ़ते कद ने भी नसीमुद्दीन सिद्दीकी की असहजता बढ़ाई। इस्तीफे की वजह यह तो नहीं रायबरेली दौरे के दौरान राहुल गांधी के कार्यक्रम में अपेक्षित तवज्जो न मिलना उनके इस्तीफे की तात्कालिक वजह मानी जा रही है। इस्तीफा पत्र में भी उन्होंने पार्टी में खुद को हाशिए पर महसूस करने की बात कही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी के जाने से कांग्रेस या राहुल गांधी को यूपी में कोई निर्णायक चुनावी झटका नहीं लगेगा। यह नुकसान ज्यादा मनोवैज्ञानिक और संगठनात्मक है। आने वाले समय में वे किस राजनीतिक दल का रुख करते हैं, यह जरूर कांग्रेस के लिए अप्रत्यक्ष रूप से अहम हो सकता है। फिलहाल, यह घटनाक्रम कांग्रेस से ज्यादा नसीमुद्दीन सिद्दीकी के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगा। हिदायत/ईएमएस 27जनवरी26