नई दिल्ली,(ईएमएस)। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में लागू किए गए उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियमन 2026 को लेकर देश के शैक्षणिक गलियारों में भारी असंतोष और विरोध प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया है। 13 जनवरी 2026 को लागू किए गए इन नियमों के विरोध में दिल्ली में यूजीसी मुख्यालय से लेकर लखनऊ की सड़कों तक छात्र और शिक्षक सड़क पर उतर आए हैं। इस विवाद के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वासन दिया है कि किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन प्रदर्शनकारियों की चिंताएं अभी भी बरकरार हैं। यूजीसी के इन नए नियमों का प्राथमिक उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव, उत्पीड़न और असमानता को जड़ से खत्म करना है। आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2025 के बीच वंचित वर्गों के खिलाफ शिकायतों में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी पृष्ठभूमि और रोहित वेमुला व पायल तड़वी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए, 2012 के पुराने और लचीले नियमों के स्थान पर ये सख्त नियम लाए गए हैं। नए नियमों के तहत अब हर विश्वविद्यालय और कॉलेज के लिए इक्विटी सेंटर, इक्विटी स्क्वाड और इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही, संस्थानों को 24गुणा 7 हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल भी शुरू करना होगा। यदि कोई संस्थान इन नियमों की अनदेखी करता है, तो यूजीसी उसकी मान्यता रद्द करने या अनुदान (फंड) रोकने जैसी कड़ी कार्रवाई कर सकता है। विवाद का मुख्य केंद्र इन नियमों की परिभाषा और दायरे को लेकर है। आलोचकों और प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि नियमों के रेगुलेशन 3(सी) में जाति-आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) तक सीमित कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में यह दलील दी गई है कि इस परिभाषा के कारण सामान्य श्रेणी के छात्र और शिक्षक, जो किसी भी प्रकार के उत्पीड़न या पक्षपात का सामना कर सकते हैं, उन्हें संस्थागत सुरक्षा और शिकायत निवारण के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि भेदभाव किसी के साथ भी हो सकता है, लेकिन यह नियम केवल विशिष्ट वर्गों को सुरक्षा प्रदान करता है, जो स्वयं में एक प्रकार का भेदभाव है। प्रदर्शनकारियों की एक बड़ी चिंता इक्विटी कमेटी के गठन को लेकर भी है। नियमों के अनुसार, इस कमेटी में एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है, लेकिन इसमें सामान्य श्रेणी के प्रतिनिधित्व का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि प्रतिनिधित्व में असंतुलन और झूठी शिकायतों से निपटने के लिए किसी स्पष्ट तंत्र का न होना इस कानून के दुरुपयोग की संभावना को बढ़ाता है। उन्हें डर है कि कमेटी के सदस्य अपने पूर्वाग्रहों के कारण एकतरफा निर्णय ले सकते हैं। हालांकि, यूजीसी का स्पष्ट कहना है कि ये नियम ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को एक सुरक्षित और समावेशी शैक्षणिक वातावरण प्रदान करने के लिए अनिवार्य हैं। 2012 के नियम केवल परामर्श स्वरूप थे, जिन्हें संस्थानों ने गंभीरता से नहीं लिया, इसलिए अब इन्हें कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया गया है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार और यूजीसी इन प्रदर्शनों के बीच नियमों की भाषा में कोई बदलाव करते हैं या फिर ये नियम अपने वर्तमान स्वरूप में ही लागू रहेंगे। वीरेंद्र/ईएमएस/28जनवरी2026