लखनऊ (ईएमएस)। भाकपा (माले) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव रोकने की दिशा में बीती 13 जनवरी को अधिसूचित नियमों पर शीर्ष अदालत द्वारा लगाई गई रोक को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। पार्टी के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने बृहस्पतिवार को जारी बयान में कहा कि हालांकि ये नियम पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन शिक्षण संस्थानों में दलित, आदिवासी, पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों के साथ जातीय भेदभाव व उत्पीड़न रोकने की दिशा में सकारात्मक, प्रगतिशील व स्वागतयोग्य कदम हैं। ये नियम 15 जनवरी से लागू हो गए थे। बल्कि पीड़ित वर्गों की ओर से इन नियमों के क्रियान्वयन को बेहतर, प्रभावशाली व फलदायक बनाने के लिए कुछ और सकारात्मक सुधार की मांग की जा रही थी। माले नेता ने कहा कि यूजीसी के नए नियमों को रोका जाना सांस्थानिक हत्या के शिकार हुए रोहित वेमुला और पायल तड़वी के साथ ही दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के साथ नाइंसाफी है। लंबे समय बाद एक अपेक्षाकृत ज्यादा समावेशी नियम आये, लेकिन ऐतिहासिक रुप से जो वर्ग उत्पीड़न करता आया है, उसने खुद को छद्म रुप से इन नियमों के जरिये पीड़ित के रुप में प्रस्तुत कर और हो-हल्ला मचाकर इनका गला दबाने का काम किया। ये सामाजिक न्याय व आरक्षण-विरोधी लोग ही हैं। माले राज्य सचिव ने कहा कि भाजपा दोहरा खेल खेल रही है। इस बार पिछड़े वर्ग को संसदीय समिति की सिफारिश पर पहली बार इन नियमों में भेदभाव के शिकार समूह में शामिल किया गया है। भाजपा खुद को एक तरफ पिछड़े वर्ग का हितैषी दिखाना चाहती है, वहीं पीठ पीछे संघ के मनुस्मृति प्रेम को भी पाले रहना चाहती है और दोनों मिलकर इसे अंबेडकर लिखित संविधान की जगह देश का संविधान बनाना चाहते हैं। यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ बवाल काटने वाले किस पार्टी के वोटर हैं, इसकी शिनाख्त करने पर सब साफ हो जाता है। जितेन्द्र 29 जनवरी 2026