कल तीन बजे बस पर चढ़ा था। मालवण से मुंबई 474 किलोमीटर है। कोंकण रेलवे में ट्रेन की बहुत कमी है। दो माह पूर्व भी आरक्षित टिकट नहीं मिल रहा था और तत्काल टिकट भी नहीं मिला। बस वाले ने कहा था कि चौदह - पंद्रह घंटे लगेंगे। रात भर बस पर बैठना और फ्लाइट पकड़ना, मुझे आसान नहीं लग रहा था। उस पर सीट भी पीछे। टिकट पर जो सीट नंबर लिखा था, उसके अनुसार सीट दी नहीं गयी। बस में पहले से साटी गयी सीट नंबर की स्लिप पर दूसरी स्लिप चिपका दी गई। तू तू में में भी हुई, लेकिन कोई फायदा होना नहीं था। मन मसोस कर यात्रा करनी पड़ी। उछलती कूदती बस हांय हांय कर चलती रही और कान सांय-सांय बजते रहे। कभी कभी ही आंखें बंद होती। रात भर जगा ही रह गया। जब बस से सांताक्रुज उतरा तो साढ़े पांच की सुबह थी। फ्लाइट 10.30 में था। काफी समय था, लेकिन बाहर कहां टिकता। छत्रपति शिवाजी महाराज एयरपोर्ट ही आ गया। छत्रपति शिवाजी महाराज एयरपोर्ट, मुंबई के अंदर बैठा हूं। अडानी हर पोस्टर बैनर में स्वागत करने को तत्पर हैं। यहां तक जो आनलाइन सामान खरीदा जाता है, उसकी कीमत अडानी को जाती है। आप सामान के लिए स्कैन करते हैं तो आपके स्क्रीन पर आता है - पे टू अडानी। अडानी आपके पैसे का स्वागत कर रहा है और अडानी के पैसे का स्वागत सरकार कर रही है। लेन-देन चल रहा है। जिसके पास पैसा है, वह इस लेन देन समारोह में शामिल हो सकता है। जिसके पास पैसा नहीं है, वह पांच किलो अनाज पर गौरव महसूस कर सकता है। उसमें इतना डर और कातरता भर दिए जायेंगे कि वह खुद को नागरिक महसूस ही नहीं करेगा। देश में बड़े पैमाने पर नागरिकों से नागरिक - बोध छीना जा रहा है। उसे इतना सत्वहीन बना दिया जायेगा कि उसे यह याद भी नहीं रहेगा कि इस देश में कोई संविधान भी है। जैसे घोड़े की सवारी होती है, वैसे ही नागरिकों की सवारी की जायेगी। और सभी तमाशा देखेंगे। चुनाव आयोग की चिंता यह नहीं है कि कोई नागरिक मतदाता सूची से बेदखल न हो, बल्कि आयोग चाहता है कि मतदाता कम हो। हरेक नागरिक के कागज देखे जा रहे हैं। पूंछ उठा कर चिह्नित किया जा रहा है कि कौन हमारा वोटर है और कौन नहीं है। न्यायपालिका के न्यायमूर्ति सकपका गये हैं। सरकार के पास सबकी कुंडली है। जो प्रेम से मान जाय तो ठीक, नहीं तो दूसरे इंतजाम भी हैं। सच बहुत कड़ुआ होता है, मगर एक समय ऐसा आता है कि बोलना पड़ता है। न चाहते हुए भी, लबों पर सच फूटने लगता है। क्योंकि सच बोलना समाज के जिंदा रहने का प्रतीक है। आजादी तो लड़ कर इसलिए तो नहीं ली थी कि नागरिक की नागरिकता तक छीनने की कोशिश हो। भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्लाह, खुदीराम बोस आदि अनेक क्रांतिकारी युवा अपनी जान की बाजी लगा लें और भारत की सरकार जनता में नफ़रत की आंधी बहाकर जनता को नशेड़ी बनाता जाये। शराब का नशा तो चढ़ता - उतरता है, लेकिन नफ़रत का नशा चढ़ता है तो जल्द नहीं उतरता। सरकार भी नशा उतारने नहीं देती, बल्कि वह चढ़ाने में लगी रहती है। नब्बे हजार स्कूल बंद हो गये, सरकार चिंतित नहीं है। उसकी प्राथमिक चिंता है कि सरकारी पैसे से कैसे मंदिर बनाया जाय। युवाओं का पैसा मंदिर की ओर मुखातिब है और युवा ललाट पर भस्म और भभूत लपेस रहे हैं। कबीर दास बेचारे नहीं हैं। अगर रहते तो उनकी उलटबांसियां भी कम पड़ जातीं। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 30 जनवरी /2026