भारत की अर्थव्यवस्था आज जिस रास्ते पर बढ़ रही है, वहां एक सवाल बार-बार उठता है, क्या केंद्र और राज्य सरकारें अब कर्ज चुकाने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं? वित्त वर्ष 2025–26 में केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर करीब 27 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। इसमें लगभग 14 लाख करोड़ रुपये केंद्र सरकार और 12–13 लाख करोड़ रुपये राज्य सरकारों ने कर्ज लिया है। आने वाले वित्त वर्ष 2026–27 में यह आंकड़ा बढ़कर 30 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह स्थिति केवल उधारी बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के वित्तीय संतुलन, राजकोषीय घाटा की ओर वास्तविकता को दर्शा रही है। सरकारें मुख्य रूप से बॉन्ड जारी करके हर माह बाजार से पैसा जुटा रही हैं। कर्ज में लिए हुए पैसे से सरकारी योजनाओं में दी जाने वाली राशि एवं राज्य सरकारों के खर्च को पूरा किया जा रहा है। समस्या यह है, सरकारी बॉन्ड पर ब्याजदर यानी बॉन्ड यील्ड 6.6 से 6.7 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। जैसे-जैसे ब्याजदर बढ़ती है, सरकारों पर ब्याज भुगतान का बोझ भी बढ़ता जाता है। पिछले वर्षों में राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा जो कर्ज लिया गया है, उसको वापस लौटाने में केंद्र एवं राज्य सरकारों को हर साल काफी बड़ी धनराशि खर्च करनी पड़ रही है। आज की स्थिति यह है, केंद्र सरकार अपने कुल राजस्व का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा कर्ज के ब्याज और भुगतान में खर्च कर रही है। राज्य सरकारों की हालत इन दिनों बेहद नाजुक हैं। कई राज्यों में टैक्स से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में समाप्त हो रहा है। विकास योजनाओं या सामाजिक कार्यक्रमों के लिए उनके पास बहुत ही सीमित संसाधन बचते हैं। नतीजतन, राज्यों को फिर बॉन्ड जारी करके या वित्तीय संस्थानों से कर्ज लेकर किसी तरह से भुगतान पूरे करने पड़ रहे हैं। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब केंद्र सरकार योजनाओं का वित्तीय भार राज्यों के ऊपर डाल देती है। मनरेगा जैसी योजनाओं में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ने से उन पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ेगा। संसाधनों की कमी से जूझ रहे राज्य इस बोझ को उठाने के लिए कर्ज पर कर्ज लेते चले जा रहे हैं। जिसके कारण राज्यों की अर्थव्यवस्था पूरी तरीके से गड़बड़ाती जा रही है। भारतीय रिज़र्व बैंक पर भी दबाव साल दर साल बढ़ता जा रहा है। आने वाले समय में लाखों करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड भुगतान के लिए मैच्योर हो रहे हैं। इनका भुगतान करने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को नया कर्ज लेना पड़ रहा है। राज्य सरकारों का राजकोषीय घाटा निरंतर बढ़ता चला जा रहा है। यह पूरा परिदृश्य खतरनाक रूप से आर्थिक स्थिति को दर्शाता है। कर्ज लेकर कर्ज चुकाने की इस प्रवृत्ति पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो अगले कुछ ही वर्षों में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति गड़बड़ाते देर नहीं लगेगी। इसका सबसे बड़ा बोझ आने वाली पीढ़ियों को भी उठाना पड़ेगा। अब जरूरत है, सरकारें उधारी पर निर्भर विकास मॉडल से बाहर निकलकर, राजस्व बढ़ाने, राजस्व के अनुसार खर्चों पर नियंत्रण, अनुशासन और पारदर्शी वित्तीय नीति पर गंभीरता से काम करना होगा। कर्ज लेकर खर्च करने की प्रवृत्ति को रोकना होगा। सरकार को अपने सभी विभागों में विकास कार्यों एवं खर्च में निगरानी बढ़ानी होगी। विकास कार्यों एवं सरकारी खर्चे में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना होगा। अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। जनता को भी आर्थिक स्थिति की वास्तविकता का एहसास कराते हुए, लोक लुभावन स्कीमों से केंद्र एवं राज्य सरकारों को बचना होगा। कर्ज के आसरे अब भविष्य में वित्तीय स्थिति को संतुलित नहीं रखा जा सकता है। पिछले एक दशक में जिस तरीके से टैक्स बढाए हैं, अब टैक्स बढ़ाने की भी स्थिति केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं की नहीं रही। यदि टैक्स बढ़ाकर सरकार खर्च पूरा करने की कोशिश करेगी, तो जनता इसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है। आम जनता भी कर्ज के बोझ से दबी हुई है। ऐसी स्थिति में सामाजिक, राजनीतिक एवं कानून व्यवस्था की स्थिति बुरी तरह से प्रभावित होगी। ईएमएस / 30 जनवरी 26