लेख
30-Jan-2026
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- पुण्यतिथि–शहीद दिवस पर आदरांजलि 30 जनवरी भारतीय इतिहास की वह अमर तारीख है, जो आते ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद दिला देती है। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में प्रार्थना सभा के मार्ग पर, नाथूराम गोडसे की गोली ने गांधी के शरीर को तो समाप्त कर दिया, पर उनके विचारों को नहीं। भारत इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाते हुए उस महामानव को श्रद्धांजलि अर्पित करता है जिसने सत्य, अहिंसा और नैतिक साहस को राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति बनाया। 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने जीवन के छह दशक संघर्षों में तपकर ‘महात्मा’ का स्वरूप पाया। उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई को केवल सत्ता परिवर्तन का आंदोलन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जन-जन का नैतिक आंदोलन बना दिया। जिस ब्रिटिश साम्राज्य के बारे में कहा जाता था कि उसके साम्राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता, उसे गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के बल पर झुकने को मजबूर कर दिया। आज जब विश्व तीसरे विश्वयुद्ध की आशंकाओं से घिरा दिखाई देता है, तब गांधी और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध की लंबी त्रासदी हो या इज़राइल-फिलिस्तीन के बीच गाज़ा में मानवता को झकझोरता रक्तपात हो, इन सबने दुनिया के विवेक को चुनौती दी है। शक्तिशाली राष्ट्र हथियारों, व्यापार-युद्ध और वैश्विक राजनीतिक दबावों के माध्यम से छोटे देशों पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप करोड़ों लोग विस्थापित हैं, जीवन असुरक्षित है और मानवीय संवेदनाएँ लगातार कमजोर पड़ रही हैं। इतिहास बताता है कि पिछली सदी ने दो महायुद्धों की विनाशलीला देखी। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले आज भी सभ्यता पर लगा वह दाग हैं जो मानवता को भयभीत कर देते हैं। विज्ञान के विकास के साथ विनाश की क्षमता भी बढ़ी और यही मानव इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास है। ऐसे दौर में गांधी का संदेश एक चेतावनी भी है और एक समाधान भी। उन्होंने कहा था -जीत वह नहीं जिसमें शत्रु पर विजय हो—जीत वह है जिसमें हिंसा पर विजय हो। गांधी का सत्याग्रह केवल सिद्धांत नहीं था, वह एक व्यावहारिक रणनीति भी थी। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने नस्लभेद और अपमान के विरुद्ध भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। 1903 में ‘इंडियन ओपिनियन’ जैसे समाचार पत्र के माध्यम से उन्होंने अंग्रेज सत्ता को अभिव्यक्ति की खुली चुनौती दी। बैरिस्टर के रूप में वहां पहुँचे गांधी ने 1894 से 1914 तक सत्याग्रह को जन-आंदोलन का रूप दिया और दुनिया को दिखा दिया कि अन्याय के विरुद्ध सबसे बड़ी शक्ति नैतिकता है। गोपालकृष्ण गोखले जी के आग्रह पर गांधी 1915 में भारत लौटे। उन्होंने तीन वर्षों तक देश का भ्रमण कर भारतीय समाज की नब्ज़ को पहचाना। 1917 में चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के पक्ष में उनका सत्याग्रह ब्रिटिश शासन के लिए पहली बड़ी चुनौती बना। इसके बाद खेड़ा किसान आंदोलन और अहमदाबाद मिल मज़दूर आंदोलन के माध्यम से गांधी ने प्रमाणित कर दिया कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक वर्ग का विषय नहीं बल्कि वह किसान, मजदूर, स्त्री, दलित और गरीब की साझा आकांक्षा है। गांधी ने सादगी को शक्ति बना दिया। उन्होंने सूट-बूट त्यागकर धोती धारण की, आश्रम जीवन अपनाया और स्वयं को आमजनता के समान बनाया। उन्होंने चरखा और खादी को केवल वस्त्र नहीं रहने दिया, बल्कि उसे स्वावलंबन और आत्मसम्मान का प्रतीक बना दिया। छुआछूत के विरुद्ध उन्होंने व्यापक जनजागरण किया और ‘हरिजन’ जैसे शब्दों के माध्यम से समाज को आत्ममंथन के लिए बाध्य किया। उनका अहिंसा-सिद्धांत कितना दृढ़ था, इसका उदाहरण चौरी-चौरा है। जब आंदोलन के दौरान हिंसा हुई तो उन्होंने एक बड़े जनांदोलन को वापस लेने का कठोर निर्णय किया। क्योंकि उनके लिए साधन और लक्ष्य दोनों पवित्र थे। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में “करो या मरो” का आह्वान करके उन्होंने ब्रिटिश शासन की अंतिम नींव हिला दी। जेल, यातनाएँ और दबाव, इनमें से कुछ भी उन्हें उनके मूल सिद्धांतों से नहीं डिगा सका। दुर्भाग्य यह रहा कि स्वतंत्रता के बाद देश साम्प्रदायिक विष से अछूता नहीं रह पाया। 1905 के बंगाल विभाजन से बोया गया विभाजन का बीज अंततः 1947 में देश के बंटवारे के रूप में सामने आया। गांधी अंतिम समय तक हिंदू-मुस्लिम एकता, सर्वधर्म समभाव और शांति के लिए संघर्ष करते रहे। लेकिन वही साम्प्रदायिकता, जो उनके जीवनभर विरोध में थी, अंततः 30 जनवरी 1948 को उनके प्राण ले गई। गांधी शरीर से चले गए, पर वे विचार के रूप में अमर हो गए। उनकी प्रेरणा मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला जैसे विश्व नेताओं में स्पष्ट दिखाई देती है। दुनिया के अनेक देशों में गांधी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं, उनके नाम पर संस्थान हैं, विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध होते हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन का कथन आज भी उतना ही सार्थक है कि आने वाली पीढ़ियाँ शायद विश्वास नहीं करेंगी कि धरती पर हाड़-मांस का ऐसा मनुष्य भी आया था। महात्मा गांधी का अहिंसा-सिद्धांत केवल भावुक आदर्श नहीं, बल्कि कर्तव्य-आधारित जीवन-दर्शन था। यही दृष्टि हमें श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलती है जहाँ कर्म से पलायन नहीं, बल्कि समत्व के साथ कर्म करने का संदेश है। गीता कहती है— “योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय”। अर्थात आसक्ति छोड़कर, धैर्य और संतुलन के साथ अपने कर्तव्य का पालन करो। गांधी ने इसी भावना को अपने जीवन में उतारकर यह सिद्ध किया कि संघर्ष केवल क्रोध नहीं, अनुशासन भी है; और सत्याग्रह केवल विरोध नहीं, आत्मबल की साधना है। महात्मा गांधी का सबसे बड़ा संदेश सरल है—“मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।” उनकी पुण्यतिथि पर हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सत्य, अहिंसा, करुणा और सामाजिक समरसता को केवल स्मरण न करें, बल्कि उसे व्यवहार और सार्वजनिक जीवन का अनुशासन बनाएं। क्योंकि गांधी केवल इतिहास नहीं बल्कि वे भविष्य की सबसे अनिवार्य जरूरत हैं। (संयुक्त आयुक्त, ग्रामीण विकास विभाग) ईएमएस / 30 जनवरी 26