लेख
30-Jan-2026
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महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां एक खबर, एक दावा और एक राजनीतिक प्रतिक्रिया पूरे सत्ता-संतुलन को हिला देने की क्षमता रखती है। हालिया रिपोर्टों में अजित ‘दादा’ पवार के विमान हादसे में निधन का दावा किया गया है। चूंकि यह मामला अभी जांच के दायरे में बताया जा रहा है और आधिकारिक पुष्टि तथा निष्कर्ष सामने आना बाकी हैं, इसलिए इससे जुड़े तथ्यों पर अंतिम निर्णय देना जल्दबाज़ी होगा। लेकिन राजनीति अक्सर तथ्यों से पहले प्रतिक्रियाओं और आशंकाओं के सहारे चलने लगती है। इसी संदर्भ में यह खबर चाहे वह जांचाधीन ही क्यों न हो,एनसीपी, भाजपा और महायुति गठबंधन की आंतरिक संरचना पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। अजित पवार का नाम महाराष्ट्र की राजनीति में केवल एक पद या एक दल तक सीमित नहीं रहा है। वे सत्ता, संगठन और गठबंधन तीनों स्तरों पर प्रभाव रखने वाले नेता रहे हैं। छह बार उपमुख्यमंत्री रहना, तीन प्रमुख दलों के साथ सत्ता में रहना और निर्णायक क्षणों में राजनीतिक बाज़ी पलटने की क्षमता इन सबने उन्हें एक ऐसे धुरी-नेता के रूप में स्थापित किया, जिसके इर्द-गिर्द कई संतुलन टिके रहे। महायुति सरकार में उनकी भूमिका भाजपा के लिए एक तरह के सुरक्षा-कवच जैसी मानी जाती रही है, जिसने न केवल संख्याबल बल्कि राजनीतिक भरोसा भी दिया। यदि रिपोर्टों के दावे सच मान लिए जाएं, तो एनसीपी के भीतर नेतृत्व का प्रश्न तुरंत सामने आता है। पार्टी पहले ही दो धड़ों में बंटी हुई है और अजित पवार का कद उस धड़े को एकजुट रखने का प्रमुख आधार था। परिवार, सहयोगी और क्षेत्रीय नेताओं के बीच संतुलन साधना आसान काम नहीं है। पत्नी सुनेत्रा पवार और बेटे पार्थ के नाम ज़रूर चर्चा में आते हैं, लेकिन राजनीति केवल नाम से नहीं चलती,इसके लिए संगठनात्मक अनुभव, प्रशासनिक पकड़ और व्यापक स्वीकार्यता चाहिए। प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नेता संगठन संभालने में सक्षम माने जाते हैं, पर अजित पवार जैसी सर्वमान्य नेतृत्व-छवि फिलहाल किसी के पास नहीं दिखती। इसी खालीपन में स्वाभाविक रूप से शरद पवार का नाम फिर केंद्र में आता है। 85 वर्ष की उम्र में भी वे महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे चतुर रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। बीते कुछ समय से एनसीपी के दोनों गुटों के बीच नज़दीकियों की खबरें आती रही हैं।स्थानीय निकाय चुनावों में साथ लड़ने के प्रयोग, विलय की संभावनाओं पर खुली बातचीत और साझा रणनीति के संकेत। यदि परिस्थितियां उसी दिशा में बढ़ती हैं, तो शरद पवार निर्णायक भूमिका में आ सकते हैं। ऐसे में सवाल यह होगा कि अजित पवार के साथ आए 41 विधायकों का रुख क्या रहता है और वे किस नेतृत्व को स्वीकार करते हैं। भाजपा के लिए यह स्थिति आसान नहीं है। विधानसभा में उसके पास सबसे बड़ा संख्याबल है, लेकिन गठबंधन राजनीति केवल आंकड़ों से नहीं चलती। अजित पवार की मौजूदगी ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना पर भाजपा की पकड़ को मजबूत रखा था। उनके बिना यह संतुलन बदल सकता है और शिंदे गुट सत्ता में अपनी हिस्सेदारी और प्रभाव बढ़ाने की मांग कर सकता है। यह मांग केवल पदों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नीतिगत फैसलों और प्रशासनिक नियंत्रण तक जा सकती है। ऐसे में महायुति के भीतर खींचतान तेज़ होना स्वाभाविक है। विपक्ष के लिए यह पूरा घटनाक्रम एक अवसर की तरह भी देखा जा रहा है। कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) पहले से ही महायुति को अवसरवादी गठबंधन बताती रही हैं। यदि एनसीपी के भीतर अस्थिरता बढ़ती है या उसका झुकाव बदलता है, तो राज्य में नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं। हालांकि विपक्ष के सामने भी चुनौती यही है कि वह केवल सत्ता-विरोधी बयानबाज़ी तक सीमित न रहे, बल्कि एक विश्वसनीय विकल्प पेश करे। इसी बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया और जांच की मांग पर भी टिप्पणी बनती है। किसी भी बड़े हादसे या कथित हादसे पर निष्पक्ष जांच की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हर राष्ट्रीय घटना को राजनीतिक रंग देना और केंद्र या सत्तारूढ़ दल पर तुरंत आरोप मढ़ देना ममता बनर्जी की पुरानी शैली रही है। आलोचना करना विपक्ष का धर्म है, परंतु तथ्यों के सामने आने से पहले शंकाओं को सच्चाई की तरह पेश करना और अविश्वास फैलाना स्वस्थ राजनीति नहीं कही जा सकती। यह रवैया न केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ाता है, बल्कि संवेदनशील मामलों में अनावश्यक भ्रम भी पैदा करता है। यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि किसी भी विमान हादसे या सुरक्षा चूक की जांच तकनीकी और संस्थागत प्रक्रिया से होती है। डीजीसीए, एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो और अन्य एजेंसियां तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचती हैं। राजनीतिक बयान इन प्रक्रियाओं को न तो तेज़ करते हैं और न ही अधिक निष्पक्ष बनाते हैं। जब ममता बनर्जी जैसी नेता बिना अंतिम रिपोर्ट के सियासी निष्कर्ष निकालती हैं, तो यह आलोचना से ज़्यादा आरोप की श्रेणी में आता है। महाराष्ट्र की राजनीति ने पहले भी कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। यहां नेतृत्व परिवर्तन, दल-बदल और गठबंधन टूटना-जुड़ना कोई नई बात नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मामला एक ऐसे नेता से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसने सत्ता-संतुलन को लंबे समय तक साधे रखा। यदि जांच में रिपोर्टों के दावे गलत साबित होते हैं, तो भी यह पूरा प्रकरण एक संकेत देगा कि गठबंधन कितने नाज़ुक भरोसे पर टिके हैं। और यदि दावे सही पाए जाते हैं, तो राज्य की राजनीति में एक लंबा संक्रमणकाल देखने को मिल सकता है। अंततः लोकतंत्र की कसौटी यही है कि संवेदनशील घटनाओं को धैर्य, तथ्य और जिम्मेदारी के साथ देखा जाए। सत्ता पक्ष को भी आत्ममंथन करना होगा और विपक्ष को भी यह तय करना होगा कि वह रचनात्मक आलोचना करेगा या हर मौके पर संदेह और डर की राजनीति। महाराष्ट्र की जनता ने बार-बार दिखाया है कि वह स्थिरता और विकास को महत्व देती है। आने वाले समय में यही देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इस संदेश को समझते हैं या फिर तात्कालिक लाभ के लिए अस्थिरता का रास्ता चुनते हैं। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो।99749 40324 -89559 50335 वरिष्ठ पत्रकार ,साहित्यकार,स्तम्भकार) ईएमएस / 30 जनवरी 26