लेख
30-Jan-2026
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31 जनवरी को प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय ज़ेब्रा दिवस (इंटरनेशनल ज़ेब्रा डे) मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य ज़ेब्रा जैसे दुर्लभ, सुंदर और उपयोगी वन्य जीव के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है। आज तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, खेती और बस्तियों के विस्तार के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई, अवैध शिकार, जलवायु परिवर्तन तथा पानी की बढ़ती कमी के कारण ज़ेब्रा के प्राकृतिक आवास लगातार नष्ट हो रहे हैं। इसका सीधा परिणाम यह है कि ज़ेब्रा की आबादी में तेज़ गिरावट दर्ज की जा रही है। पाठकों को बताता चलूं कि ज़ेब्रा केवल एक आकर्षक जीव नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र का इंजीनियर कहा जाता है, क्योंकि ये घास के मैदानों को संतुलित और स्वस्थ बनाए रखते हैं। ज़ेब्रा लंबी और सख्त घास को खाते हैं, जिससे नीचे से कोमल घास उगती है, जिसे विल्डेबीस्ट जैसे अन्य शाकाहारी जीव खाते हैं। इस तरह ज़ेब्रा अनेक प्रजातियों के जीवन को अप्रत्यक्ष रूप से सहारा देते हैं। सूखे के समय ये पानी के स्रोत खोज लेते हैं, जिससे अन्य जानवरों को भी लाभ होता है।ज़ेब्रा, घोड़े और गधों के परिवार इक्वस से संबंध रखते हैं, फिर भी इन्हें कभी पालतू नहीं बनाया जा सका। इसका कारण इनका स्वभाव है-ज़ेब्रा अत्यधिक डरपोक होने के साथ-साथ बेहद आक्रामक भी होते हैं। अफ्रीका के खुले मैदानों में शेरों और तेंदुओं जैसे शिकारी जीवों के बीच रहने के कारण इनमें आत्मरक्षा की प्रवृत्ति अत्यंत तीव्र होती है। इनकी लात (किक) इतनी शक्तिशाली होती है कि वह शेर का जबड़ा तक तोड़ सकती है। यही कारण है कि ज़ेब्रा किसी को अपनी पीठ पर बैठने नहीं देते। ज़ेब्रा का शरीर मूल रूप से काला माना जाता है, जिस पर सफेद धारियाँ होती हैं। भ्रूण अवस्था में ज़ेब्रा पूरी तरह काला होता है; विकास के दौरान सफेद धारियाँ बाद में उभरती हैं। ये धारियाँ केवल सौंदर्य का कारण नहीं, बल्कि प्रकृति की एक अद्भुत वैज्ञानिक रचना हैं। ज़ेब्रा की धारियाँ शरीर के लिए प्राकृतिक एसी का काम करती हैं। दरअसल, इनकी काली धारियाँ गर्मी को सोखती हैं, जबकि सफेद धारियाँ उसे परावर्तित करती हैं। इससे त्वचा के ऊपर हवा की सूक्ष्म लहरें बनती हैं, जो अफ्रीका की भीषण गर्मी में शरीर को ठंडा रखने में मदद करती हैं।इसके अलावा ज़ेब्रा की धारियाँ एक प्राकृतिक बारकोड हैं। दुनिया में किसी भी दो ज़ेब्रा की धारियाँ एक जैसी नहीं होतीं-बिल्कुल इंसानों की उंगलियों के निशानों की तरह। ज़ेब्रा परिवार के सदस्य एक-दूसरे को इन्हीं पैटर्न्स के माध्यम से पहचानते हैं। यही धारियाँ मक्खियों और परजीवी कीटों से भी रक्षा करती हैं। शोध बताते हैं कि ज़ेब्रा की धारियाँ मक्खियों की आँखों को भ्रमित कर देती हैं, जिसे ‘मोशन डैज़ल’ कहा जाता है, और वे ज़ेब्रा पर ठीक से बैठ नहीं पातीं। यह एक प्रभावी प्राकृतिक कीट-रक्षक है। जब ज़ेब्रा का पूरा झुंड एक साथ दौड़ता है, तो उनकी धारियाँ मिलकर एक बड़ा, हिलता-डुलता दृश्य बना देती हैं, जिससे शेर जैसे शिकारी यह तय नहीं कर पाते कि एक ज़ेब्रा कहाँ शुरू होता है और कहाँ समाप्त। यही भ्रम ज़ेब्रा की जान बचाता है। ज़ेब्रा लगभग 65 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से लंबे समय तक दौड़ सकते हैं और जिग-जैग मोशन में भागकर शिकारियों को धोखा देते हैं। ज़ेब्रा झुंड में रहना पसंद करते हैं, जिसे ‘डैज़ल’ या ‘ज़ील’ कहा जाता है। झुंड में चलते समय सामान्यतः नर ज़ेब्रा आगे रहता है और मादाएँ उसके पीछे। यदि कोई ज़ेब्रा घायल हो जाए, तो पूरा झुंड उसकी रक्षा के लिए एकजुट हो जाता है। ज़ेब्रा और शुतुरमुर्ग अथवा विल्डेबीस्ट के बीच गहरी दोस्ती देखने को मिलती है। शुतुरमुर्ग दूर तक देख सकता है, जबकि ज़ेब्रा की सूंघने और सुनने की शक्ति अधिक विकसित होती है।इस प्रकार ये एक-दूसरे को खतरे की सूचना देकर बचाते हैं। जानकारी मिलती है कि ज़ेब्रा की इंद्रियाँ अत्यंत विकसित होती हैं। इनकी नाइट विज़न गजब की होती है। ये खड़े-खड़े भी सो सकते हैं और सोते समय भी इनके कान चारों दिशाओं में घूमते रहते हैं। ज़ेब्रा कानों और पूँछ की स्थिति के माध्यम से संवाद करते हैं। ये रंग पहचान सकते हैं, हालांकि ऑरेंज रंग नहीं देख पाते। ज़ेब्रा घोड़ों की तरह हिनहिनाते नहीं; उनकी आवाज़ गधे और कुत्ते के भौंकने का मिश्रण होती है, जिसे क्वा-हा जैसी ध्वनि से जोड़ा जाता है। ज़ेब्रा के शिशु जन्म के मात्र 6 मिनट में खड़े, 10 मिनट में चलने और लगभग 20 मिनट में दौड़ने लगते हैं। शिशु लगभग एक वर्ष तक माँ का दूध पीते हैं। मादा ज़ेब्रा अपने बच्चों की रक्षा के लिए अत्यंत साहसी होती है। हालांकि, ज़ेब्रा पेड़ों पर नहीं चढ़ते, लेकिन माउंटेन ज़ेब्रा चट्टानी पहाड़ों पर चढ़ने में माहिर होते हैं। उनके नुकीले और सख्त खुर उन्हें खड़ी ढलानों पर भी वैसी ही पकड़ देते हैं जैसी किसी पेशेवर पर्वतारोही के जूतों को मिलती है। यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि घोड़े और ज़ेब्रा एक साथ नहीं रह सकते, क्योंकि ज़ेब्रा कुछ ऐसे वायरस के वाहक होते हैं जिनका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन वही वायरस घोड़ों के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। वास्तव में,ज़ेब्रा किसी एक प्रजाति का नाम नहीं, बल्कि इक्वस वंश की तीन प्रमुख प्रजातियों का सामूहिक नाम है-मैदानी ज़ेब्रा, पर्वतीय ज़ेब्रा और ग्रेवीज़ ज़ेब्रा। ये मुख्य रूप से अफ्रीका के घास के मैदानों और खुले जंगलों में पाए जाते हैं, जिनमें केन्या, तंज़ानिया, इथियोपिया, दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया, बोत्सवाना और ज़िम्बाब्वे शामिल हैं। यदि हम यहां पर ज़ेब्रा की जनसंख्या आंकड़ों की बात करें तो 2026 के हालिया वन्यजीव गणना के अनुसार, दुनिया में कुल मिलाकर लगभग 5.5 लाख से 6 लाख ज़ेब्रा बचे हैं।मैदानी ज़ेब्रा सबसे आम प्रजाति है, जिनकी अनुमानित संख्या लगभग 5 लाख है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शिकार और आवास की कमी के कारण इनकी संख्या में लगभग 25% गिरावट आई है और इन्हें संकट के करीब श्रेणी में रखा गया है।पर्वतीय ज़ेब्रा मुख्य रूप से दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया में पाए जाते हैं। इनकी संख्या लगभग 35,000 है। संरक्षण प्रयासों से इनकी स्थिति में सुधार हो रहा है, फिर भी इन्हें अतिसंवेदनशील माना जाता है। इनमें केप माउंटेन ज़ेब्रा की संख्या मात्र 1,500 के आसपास है। वहीं ग्रेवीज़ ज़ेब्रा सबसे दुर्लभ, सबसे बड़ा और सबसे अधिक संकटग्रस्त है। इसका वजन लगभग 1,000 पाउंड तक होता है। यह केवल केन्या और इथियोपिया के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। 1970 के दशक में इनकी संख्या लगभग 15,000 थी, जो अब घटकर मात्र 2,500 से 2,800 रह गई है। इसे आइयूसीएन ने गंभीर रूप से संकटग्रस्त सूची में शामिल किया है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस प्रजाति का नाम 19वीं सदी के फ्रांसीसी राष्ट्रपति जूल्स ग्रेवी के नाम पर रखा गया था।अंततः, अंतरराष्ट्रीय ज़ेब्रा दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि ज़ेब्रा की घटती संख्या केवल एक प्रजाति का संकट नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन का संकेत है। ज़ेब्रा का संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है, क्योंकि यदि आज हम सजग नहीं हुए, तो आने वाला कल हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 30 जनवरी 26