क्षेत्रीय
30-Jan-2026
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- हाईकोर्ट ने एफआईआर व चार्जशीट रद करने से किया इनकार 0 अदालत ने कहा- आरोप गंभीर हैं, तथ्यात्मक विवाद ट्रायल के दौरान तय होंगे बिलासपुर (ईएमएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने दुष्कर्म के गंभीर आरोपों से जुड़े एक मामले में आदेश पारित करते हुए एफआईआर, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को रद (क्वैश) करने से इंकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया है। याचिकाकर्ता विजय उमाकांत वाघमारे (33) , महाराष्ट्र के लातूर जिले के निवासी हैं और पेशे से एमएस ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं। उनके खिलाफ भिलाई नगर, जिला दुर्ग में वर्ष 2018 में अपराध दर्ज किया गया था। आरोप है कि उन्होंने विवाह का झूठा आश्वासन देकर शिकायतकर्ता से दो बार शारीरिक संबंध बनाए। जांच के बाद 3 अक्टूबर 2025 को धारा 376 आईपीसी के तहत चार्जशीट पेश की गई, जिस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, दुर्ग द्वारा संज्ञान ले लिया गया। इसी के खिलाफ आरोपी डॉक्टर ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने ये दलीलें दीं याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि डॉक्टर को झूठे मामले में फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि कथित घटनाक्रम के समय याचिकाकर्ता पुणे के ससून जनरल अस्पताल में रेजिडेंट डॉक्टर के रूप में पदस्थ थे और अस्पताल की प्रमाणित उपस्थिति रजिस्टर से यह सिद्ध होता है कि वे लगातार ड्यूटी पर थे। दलील दी गई कि, मार्च 2017 में भिलाई जाने का आरोप असंभव है क्योंकि उस दौरान वे पुणे में ड्यूटी पर थे। 12 अप्रैल 2017 को भी अस्पताल रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि वे ड्यूटी पर मौजूद थे। शिकायतकर्ता की मां द्वारा विवाह के लिए दबाव बनाया जा रहा था। 19 महीने की देरी से एफआईआर दर्ज की गई, जो संदेह पैदा करती है। कथित संबंध यदि माने भी जाएं तो वे सहमति से थे। राज्य सरकार ने रखा पक्ष राज्य की ओर से पैनल लॉयर ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि, याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए सभी मुद्दे तथ्यात्मक विवाद हैं, जिनका निर्णय ट्रायल के दौरान ही हो सकता है। अलिबी (ड्यूटी पर होने का दावा), कॉल रिकॉर्ड, देरी का कारण, सहमति जैसे प्रश्न साक्ष्य के विषय हैं। रेप जैसे मामलों में देरी अपने आप में एफआईआर रद करने का आधार नहीं बन सकती। एफआईआर और चार्जशीट से संज्ञेय अपराध स्पष्ट रूप से बनता है। हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ मामलों का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर या चार्जशीट को रद्द करने की शक्ति अत्यंत सीमित और दुर्लभ मामलों में ही प्रयोग की जानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, इस स्तर पर सबूतों की जांच या मिनी ट्रायल नहीं किया जा सकता। अलिबी, सहमति, देरी और झूठे आरोप जैसे तर्क ट्रायल के विषय हैं। एफआईआर और जांच सामग्री से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट में अपना बचाव प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलेगा। इस स्तर पर कार्यवाही को रोकना या रद करना न्यायसंगत नहीं होगा। मनोज राज/योगेश विश्वकर्मा 30 जनवरी 2026