राष्ट्रीय
31-Jan-2026
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नई दिल्ली(ईएमएस)। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन (यूएसी) के बीच नागरिक विमान सुखोई सुपरजेट 100 (एसजे-100) के भारत में उत्पादन को लेकर हुए हालिया समझौते ने रक्षा और विमानन गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। इस साझेदारी के बाद अब यह सवाल प्रबल हो गया है कि क्या नागरिक उड्डयन के रास्ते रूस अपने सबसे घातक पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुखोई एसयू-57 के लिए भारतीय वायु सेना के दरवाजे खोलने की तैयारी कर रहा है। भारत और रूस के बीच नागरिक विमानन के क्षेत्र में हुआ यह समझौता मेक इन इंडिया की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है। एसजे-100 एक क्षेत्रीय जेट है और भारत में इसके निर्माण से एयरोस्पेस ईकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह नागरिक विमान समझौता भविष्य के बड़े सैन्य समझौतों के लिए एक टेस्ट केस हो सकता है। इसी बीच, रूसी एरोस्पेस कंपनी के शीर्ष अधिकारियों के बयानों ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) वादिम बदेखा ने संकेत दिए हैं कि दोनों देश एसयू-57ई लड़ाकू विमान के संयुक्त उत्पादन की तकनीकी संभावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। उनके मुताबिक, भारत में पहले से ही सुखोई एसयू-30 के उत्पादन के लिए मौजूद सुविधाओं का उपयोग एसयू-57 के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए किया जा सकता है। एसयू-57 फेलो रूस का पहला पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर है, जो रडार की नजरों से बचने की बेजोड़ क्षमता रखता है। यह विमान सुपरक्रूज तकनीक से लैस है, जिससे यह बिना आफ्टरबर्नर के ध्वनि की गति से तेज उड़ सकता है। इसकी मिसाइलें इसके इंटरनल वेपन बे में छिपी होती हैं, जो इसके स्टील्थ फीचर को और प्रभावी बनाती हैं। हालांकि, भारत और एसयू-57 का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। भारत पहले रूस के साथ फिफ्थ जनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम का हिस्सा था, लेकिन 2018 में तकनीक हस्तांतरण और लागत से जुड़े मुद्दों के कारण भारत इस प्रोजेक्ट से पीछे हट गया था। अब पासा पलटता हुआ इसलिए दिखाई दे रहा है क्योंकि रूस ने एसयू-57 के लिए नया और अधिक शक्तिशाली इंजन विकसित कर लिया है, जो भारत की पुरानी चिंताओं को दूर कर सकता है। साथ ही, चीन के पास जे-20 जैसे पांचवीं पीढ़ी के विमानों की बढ़ती संख्या को देखते हुए भारतीय वायु सेना को एक स्टील्थ फाइटर की तत्काल आवश्यकता महसूस हो रही है। इसके अलावा, रूस से बड़े रक्षा सौदे करने पर अमेरिका के प्रतिबंधों का खतरा भी एक बड़ा कूटनीतिक पहलू है। भारत अब केवल खरीददार नहीं बने रहना चाहता, बल्कि उसका जोर पूर्ण तकनीक हस्तांतरण पर है। यदि रूस इस मोर्चे पर ठोस प्रस्ताव देता है, तो भविष्य में फेलो भारतीय आकाश की सुरक्षा करते हुए दिखाई दे सकते हैं। फिलहाल, वायु सेना का मुख्य ध्यान राफेल के अगले बैच और तेजस जैसे स्वदेशी विमानों को मजबूती देने पर है। वीरेंद्र/ईएमएस/31जनवरी2026