बांग्लादेश एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ चुनाव लोकतंत्र का उत्सव बनने के बजाय डर, हिंसा और असुरक्षा की तस्वीर पेश कर रहे हैं। 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले देश में जिस तरह राजनीतिक हिंसा तेज़ हुई है, उसने न सिर्फ आम नागरिकों को भयभीत किया है बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए चिंता बढ़ा दी है। बीते 48 दिनों में 16 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या और सिर्फ 24 घंटे में 82 लोगों के घायल होने की घटनाएँ यह बताने के लिए काफी हैं कि हालात कितने नाज़ुक हो चुके हैं। राजधानी ढाका से लेकर मयमनसिंह, लालमोनिरहाट और चुआडांगा तक हिंसा की आग फैल चुकी है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया खून से सनी दिख रही है। चुनाव की घोषणा 11 दिसंबर को हुई थी और उसी दिन से तनाव का सिलसिला शुरू हो गया। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार अब तक देशभर में 62 से अधिक चुनावी झड़पें दर्ज की जा चुकी हैं। इन घटनाओं में सबसे ज्यादा निशाना विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी के कार्यकर्ता बने हैं। मारे गए 16 लोगों में से 13 बीएनपी से जुड़े बताए जा रहे हैं। यह आँकड़े केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि उस दहशत का प्रतीक हैं जो चुनाव से पहले राजनीतिक मैदान में फैलाई जा रही है। विपक्ष का आरोप है कि यह हिंसा सुनियोजित है और इसका मकसद चुनाव को प्रभावित करना तथा मतदाताओं को डराना है। हिंसा की प्रकृति और तरीके भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। स्थानीय मीडिया के मुताबिक 16 में से 7 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या गोली मारकर की गई। इससे साफ संकेत मिलता है कि अवैध हथियारों की खुलेआम मौजूदगी है। जुलाई 2024 के आंदोलन के दौरान लूटे गए हजारों हथियारों में से अब तक बड़ी संख्या में हथियार और गोलियाँ बरामद नहीं हो सकी हैं। यही हथियार आज चुनावी हिंसा को और खतरनाक बना रहे हैं। आम लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि जब सरकार हथियारों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही, तो निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कैसे संभव होंगे। हालिया झड़पों की बात करें तो मयमनसिंह में बीएनपी समर्थकों और बागी उम्मीदवारों के बीच हुई हिंसा में करीब 20 लोग घायल हुए। लालमोनिरहाट में बीएनपी और जमात समर्थकों के बीच टकराव में कम से कम 11 लोग घायल हुए। चुआडांगा के आलमडांगा क्षेत्र में भी ऐसी ही झड़पें हुईं, जहाँ नौ से अधिक लोग घायल हो गए। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हिंसा अब सिर्फ दूरदराज़ इलाकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि राजधानी ढाका तक पहुँच चुकी है। ढाका में एनसीपी उम्मीदवार अरिफुल इस्लाम अदीच पर हुए हमले ने यह साबित कर दिया कि कोई भी सुरक्षित नहीं है। इस राजनीतिक हिंसा का सामाजिक असर बेहद गहरा है। चुनाव का समय आमतौर पर बहस, प्रचार और लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का होता है, लेकिन बांग्लादेश में यह दौर डर और अस्थिरता का बन गया है। लोग घरों से निकलने में हिचक रहे हैं, व्यापार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित हो रही है। सबसे ज़्यादा नुकसान अल्पसंख्यक समुदायों को झेलना पड़ा है। पहले हिंदू समुदाय और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाए जाने की घटनाएँ सामने आई थीं, जिनमें कई निर्दोष लोगों की जान गई और उनके घर जलाए गए। अब राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या कर चुनावी माहौल को और ज़हरीला किया जा रहा है। इससे साफ है कि हिंसा का दायरा लगातार फैल रहा है और कोई भी वर्ग इससे अछूता नहीं है। इस पूरे संकट की पृष्ठभूमि में बांग्लादेश की राजनीति का हालिया इतिहास बेहद अहम है। अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर भारत आना पड़ा था। इसके बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी, जिसने देश में निष्पक्ष चुनाव कराने का वादा किया। हसीना की पार्टी अवामी लीग को मई 2025 में बैन कर दिया गया, जिससे राजनीतिक संतुलन पूरी तरह बदल गया। यह चुनाव हसीना के 15 साल लंबे शासन के बाद पहली बार ऐसे हालात में हो रहा है जब सत्ता में उनकी पार्टी नहीं है और इसे निष्पक्ष चुनाव के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन मौजूदा हिंसा ने इस उम्मीद पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक समीकरण भी काफी जटिल हैं। बीएनपी इस समय 10 दलों के गठबंधन का नेतृत्व कर रही है, जबकि जमात 11 दलों के अलग गठबंधन के साथ मैदान में है। इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश और जतीया पार्टी जैसे दल भी चुनाव लड़ रहे हैं। इतने सारे गुटों की मौजूदगी में टकराव की आशंका पहले से ही थी, लेकिन जिस स्तर पर हिंसा हो रही है, उसने सभी को चौंका दिया है। विपक्ष सरकार पर कानून व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहने का आरोप लगा रहा है और कह रहा है कि प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। विशेषज्ञों को बांग्लादेश के चुनावी इतिहास को देखते हुए डर है कि कहीं एक बार फिर खून-खराबे की पुरानी कहानी न दोहराई जाए। 1991 के चुनाव में 49 लोगों की मौत हुई थी, 2008 में 21 और 2014 में 142 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। 2018 और 2023 के चुनाव भी विवादों और हिंसा से अछूते नहीं रहे थे, जिन्हें विपक्ष ने एकतरफा बताया था। ऐसे में मौजूदा हालात देखकर यह आशंका और गहरी हो जाती है कि क्या बांग्लादेश इस बार सचमुच शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव करा पाएगा। कानून व्यवस्था की स्थिति पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि पुलिस और प्रशासन या तो दबाव में हैं या निष्क्रिय। कई मामलों में पुलिस ने राजनीतिक हत्याओं के पीछे किसी साजिश से इनकार किया है, लेकिन जमीन पर फैले डर को नकारा नहीं जा सकता। जब राजनीतिक कार्यकर्ता खुलेआम मारे जा रहे हों और दोषियों पर तुरंत कार्रवाई न हो, तो आम जनता का भरोसा कानून पर से उठना स्वाभाविक है। यही भरोसे की कमी हिंसा को और बढ़ावा देती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश की छवि दांव पर है। एक ओर अंतरिम सरकार यह संदेश देना चाहती है कि देश लोकतांत्रिक रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सड़कों पर बहता खून इस दावे को कमजोर कर रहा है। पड़ोसी देश भारत में रह रहीं शेख हसीना को लेकर भी तनाव बना हुआ है। उन्हें वापस भेजने की मांग की जा रही है और कोर्ट द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद यह मुद्दा और संवेदनशील हो गया है। इन सबके बावजूद हिंसा का थमना यह बताता है कि समस्या सिर्फ किसी एक व्यक्ति या पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकट का रूप ले चुकी है। आज बांग्लादेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह चुनाव को हिंसा से अलग कैसे रखे। लोकतंत्र की असली परीक्षा सिर्फ मतदान कराने से नहीं होती, बल्कि यह सुनिश्चित करने से होती है कि हर नागरिक बिना डर के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके। अगर चुनाव खौफ के साये में होते हैं, तो उनके नतीजे चाहे जो हों, वे जनता का विश्वास नहीं जीत पाएंगे। अंतरिम सरकार, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज को मिलकर यह समझना होगा कि हिंसा किसी के हित में नहीं है। अगर हालात पर तुरंत काबू नहीं पाया गया, तो यह हिंसा केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि लंबे समय तक देश की स्थिरता और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचा सकती है। बांग्लादेश पहले ही आर्थिक चुनौतियों, बेरोज़गारी और सामाजिक तनाव से जूझ रहा है। ऐसे में राजनीतिक हिंसा आग में घी डालने का काम कर रही है। अब वक्त है कि सभी पक्ष जिम्मेदारी दिखाएँ, हथियारों पर नियंत्रण हो, दोषियों को सजा मिले और चुनाव को सचमुच लोकतंत्र का पर्व बनाया जाए। बांग्लादेश का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि आने वाले दिनों में हिंसा पर कितनी सख्ती से लगाम लगाई जाती है। यह चुनाव सिर्फ सत्ता का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह तय करेगा कि देश डर के रास्ते पर चलेगा या लोकतांत्रिक स्थिरता की ओर बढ़ेगा। इतिहास की पुनरावृत्ति होगी या एक नया अध्याय लिखा जाएगा, इसका जवाब आने वाले हफ्तों में सामने होगा। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार,स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../01 फरवरी 26