लेख
01-Feb-2026
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ठंड उतर रही है, लेकिन अभी तक आम में मंजर नहीं आये। मंजर यानी सृजन। प्रकृति रचती रहती है। मनुष्य को ठौर ठिकाना देती है। थोड़ा सिखाती भी है, दुत्कारती भी है। वह कहती है कि रचना में ही जीवन है। मनुष्य बार बार विध्वंस की ओर भागता है। यों तो हिन्दू समाज यों भी विस्फोटक है। जाति विस्फोट की एक बड़ी वजह है। जाति किसने बनाई, कब बनाई, इससे फायदा किसको हुआ और किसको हानि हुई, इसे बने रहना चाहिए या खत्म कर देना चाहिए आदि अनेक प्रश्न हमारे सामने हैं। लोग अक्सर इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने में अपनी वस्तुनिष्ठता खो देते हैं। यूजीसी के निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा -’ हस्तक्षेप नहीं किया तो खतरनाक असर , समाज बंटेगा।’ माफ कीजिएगा मुख्य न्यायाधीश महोदय, आपकी नजर में क्या समाज बंटा हुआ नहीं है? क्या यूजीसी के इस निर्देश के पहले समाज में बल्ले बल्ले था? दरअसल हम आंखें बंद किए रहते हैं और दुर्घटना घटने का इंतजार करते रहते हैं। जातियां कायम रहेगीं, तो समाज बंटा हुआ रहेगा। मुख्य न्यायाधीश अगर सचमुच चाहते हैं कि समाज बंटा हुआ नहीं रहे तो जाति पर विचार करें। जाति सर्वश्रेष्ठता और जाति हीनता रहेगी तो समाज कभी शांत नहीं रहेगा।‌ जाति मनुष्य को मनुष्य रहने नहीं देती। वह मनुष्य की सोच और विचार को बुरी तरह से प्रभावित करती है। महात्मा गांधी की हत्या एक वैचारिक संगठित गिरोह ने किया जिसका प्रतिनिधि नथूराम गोडसे था। आज भी कभी दबे और कभी प्रत्यक्ष रूप से इस वैचारिक परंपरा के लोग गोडसे का समर्थन करते हैं। गांधी की हत्या के पीछे की बड़ी वजह जाति ही थी।‌ गांधी प्रारंभिक दिनों में वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे और अस्पृश्यता के खिलाफ। उन्होंने लगातार अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन चलाया। डॉ अम्बेडकर मानते थे कि अस्पृश्यता की जड़ जाति में है। जाति कायम रहेगी तो अस्पृश्यता भी किसी न किसी रूप में कायम रहेगी। डॉ अम्बेडकर को जाति के तीखेपन का जितना अहसास था, गांधी को नहीं था। गांधी जाति की भयंकरता का अहसास धीरे-धीरे हुआ। अंतिम दिनों में वे जाति के खिलाफ हो गये थे। यहां तक कि वे उसी शादी में शामिल होते थे वर- वधू में से एक अछूत वर्ग से होता था। डॉ अम्बेडकर का मानना था कि जाति तभी टूटेगी, जब बेटी बंदी खत्म होगी। गांधी की हत्या 1948 में हो गई और डॉ अम्बेडकर 1956 में चले गए। इसी दौर में डा राममनोहर लोहिया आये। डॉ अम्बेडकर और डॉ लोहिया एक व्यापक मंच बनाने को सोच ही रहे थे कि डॉ अम्बेडकर चल बसे। उत्तर भारत की जाति- जड़ता के खिलाफ समाजवादियों ने आवाज बुलंद की। यह संघर्ष ठोस रूप ग्रहण करता, इसके पहले एक छोटी-सी बीमारी के इलाज के क्रम में डा लोहिया 1967 में गुजर गये। बीजेपी जातिवादी और संप्रदायवादी पार्टी है। उसके जेहन और उसके समर्थक संगठनों में जातिवादी विषाणु है।‌ वह अपने स्वार्थ के लिए हिन्दू एकता की बात करती है, लेकिन जाति खत्म करने की बात नहीं करती। उसे एक ऐसा समाज चाहिए, जिसमें जाति की हीनता और सर्वोच्चता भी कायम रहे। आज एक ऐसे सामाजिक और राजनैतिक संघर्ष की जरूरत है जो महात्मा बुद्ध, महात्मा फुले, कबीर, पेरियार , गांधी, अम्बेडकर, राममनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर आदि के विचारों को आत्मसात करें और मनुष्य को केंद्र में रखे। जन्म के आधार पर सर्वश्रेष्ठता और निकृष्टता का निर्धारण कतई न हो। एक अधूरी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने की सख्त जरूरत है। ईएमएस / 01 फरवरी 26