अंतर्राष्ट्रीय
02-Feb-2026
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इस्लामाबाद(ईएमएस)। पाकिस्तान का संविधान भले ही कागजों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों को समानता और सुरक्षा की गारंटी देता हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत बार-बार किए गए विश्वासघात और व्यवस्थागत भेदभाव की ओर इशारा करती है। हाल ही में आई एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए वास्तविक सुधार केवल राजनीतिक बयानबाज़ी से संभव नहीं है। इसके लिए स्वतंत्र जांच, अदालती आदेशों का त्वरित क्रियान्वयन, पक्षपाती अधिकारियों की जवाबदेही और ईशनिंदा कानूनों या भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के दुरुपयोग को रोकना अनिवार्य है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि न्याय प्रणाली और प्रशासनिक ढांचा अक्सर अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहता है, जिससे समुदायों में असुरक्षा की भावना गहरी होती जा रही है। इस रिपोर्ट में पेशावर के एक सिख कारोबारी गुरविंदर सिंह का मामला प्रमुखता से उठाया गया है, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति प्रणालीगत उपेक्षा और पक्षपात के एक पैटर्न को उजागर करता है। गुरविंदर सिंह के अनुसार, वर्ष 2022 से 2023 के बीच उनके तीन मुस्लिम साझेदारों ने, जिनके साथ वे एक मोबाइल फोन शोरूम संचालित करते थे, उनसे लगभग 7.5 करोड़ पाकिस्तानी रुपये (करीब 2.7 लाख अमेरिकी डॉलर) की धोखाधड़ी की। गबन का पता चलने के बाद सिंह ने पेशावर पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अब तक न्याय नहीं मिल सका है। आरोपियों ने बाउंस चेक दिए और स्टांप पेपर पर लिखित आश्वासन भी दिए, फिर भी उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ट्रायल कोर्ट, सेशंस कोर्ट और पेशावर हाईकोर्ट जैसे उच्च मंचों से पक्ष में फैसला आने के बावजूद आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। गुरविंदर सिंह ने अपनी इस व्यथा को प्रांतीय और संघीय सरकारों सहित सेना प्रमुख तक पहुंचाया, लेकिन कहीं से कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ। सिंह का मानना है कि उनकी शिकायत पर यह निष्क्रियता केवल इसलिए है क्योंकि वे एक सिख अल्पसंख्यक हैं। यह मामला पाकिस्तान में सिख समुदाय और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में लंबे समय से चली आ रही विफलताओं की एक कड़ी मात्र है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि सिख महिलाओं को अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह जैसी भयावह स्थितियों का सामना करना पड़ता है। 2019 में ननकाना साहिब की जगजीत कौर का मामला इसका बड़ा उदाहरण है, जिन्हें बंदूक की नोक पर अगवा कर जबरन इस्लाम कुबूल करवाया गया और अंततः न्यायपालिका ने भी पीड़िता के बजाय अपहरणकर्ता के पक्ष में झुकाव दिखाया। धार्मिक पहचान के कारण सिख पुरुषों को मौखिक और शारीरिक उत्पीड़न के साथ-साथ लक्षित हत्याओं का भी शिकार होना पड़ रहा है। 2023 में पेशावर में दयाल सिंह और मनमोहन सिंह जैसे दुकानदारों की हत्या ने पूरे समुदाय को हिलाकर रख दिया था। इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि ईशनिंदा के झूठे आरोपों और भीड़ की हिंसा का इस्तेमाल अक्सर अल्पसंख्यकों की जमीन और संपत्ति पर कब्जा करने के हथियार के रूप में किया जाता है। गुरुद्वारों और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों की उपेक्षा, तोड़फोड़ और हमले भी आम हो गए हैं। 2020 में ननकाना साहिब स्थित गुरुद्वारा जन्मस्थान पर भीड़ द्वारा किया गया हमला इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक छोटे विवाद को सांप्रदायिक रंग देकर अल्पसंख्यकों के आस्था केंद्रों को निशाना बनाया जाता है। निष्कर्ष के तौर पर रिपोर्ट कहती है कि जब तक पाकिस्तान अपनी कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के प्रति व्याप्त पूर्वाग्रहों को दूर नहीं करता, तब तक उसके संवैधानिक वादे खोखले ही रहेंगे। वीरेंद्र/ईएमएस 02 फरवरी 2026