- धर्म: सिद्धचक्र महामंडल विधान में प्रवचन जबलपुर (ईएमएस)। भगवान की पूजा करोगे तो पुण्य बंधेगा, और अपने स्वरूप को जानोगे तो जीवन पुण्यबनेगा उपरोक्त उदगार भावनायोग प्रणेता मुनि प्रमाण सागर महाराज ने श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के तीसरे दिवस व्यक्त किये प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं सुवोध कामरेड ने बताया मुनि श्री ने प्रातः जैन मुनि की उत्कृष्ट चर्या का पालन करते हुये उपवास रखकर केश लोंचन किया| मुनि श्री ने कहा कि इस धर्म सभा में ऐसा कोई भी व्यक्ती नहीं होगा जो णमोकार महामंत्र को नहीं जानता हो णमोकार महामंत्र अर्थात पंचपरमेष्ठी को स्मरण करना श्री सिद्धचक्र विधान में प्रतिदिन पंचपरमेष्ठी की पूजन की जाती है, भगवान कहते है,कि तुम मुझे जपोगे तो जपते रह जाओगे और यदि हृदय में धारण कर लोगे तो तर जाओगे उन्होंने कहा कि भगवान कीपूजा करने से पुण्य बढ़ता है,और स्वरूप जानने से जीवन पुण्य बनता है, उन्होंने प्रश्न करते हुये कहा कि बताओ क्या चाहते हो? पुण्य बांधना या जीवन को पुण्य बनाना? पुण्य किसी चमत्कार से नहीं बढेगा उसके लिए अपने स्वरूप की तरफ दृष्टि चाहिए।जब तक तत्वमुखी दृष्टि नहीं होगी तब तक जीवन में परिवर्तन नहीं हो सकता| सिद्ध चक्र महामंडल विधान से आप सभी का भरपूर पुण्य बंध रहा है, और आपके पाप भी कट रहे हैं,लेकिन यह केवल हमारा आपका विश्वास है,कौन कितना पुण्यबांध के ले जाता है? और कितना पापझड़ा के जाते है? इसकी भी एक कसौटी है,मेरे हृदय की पवित्रता ही मेरे पुण्य का सबसे बड़ा प्रमाण है,मेरे अंदर का अहोभाव ही मेरे पुण्य का प्रमाण है, मेरे अंतरंग की विशुद्धि ही मेरे पुण्य का प्रमाण है, मुनि श्री ने कहा कि अपने अंतरंग में देखो पवित्रता कितनी है?और अहो कितना है? विशुद्धि कितनी है?और निर्मलता कितनी है? मुनि श्री ने कहा कि पुण्य ऐसे नहीं बंधता,शास्त्रों में पुण्य के लिए विशुद्धि ही पुण्य का मुख्य कारण है, साता आदि प्रशस्त पुण्य कर्मों के बंध योग परिणाम तुम्हारे हृदय में जितनी विशुद्धि होगी उतना पुण्य होगाऔर जितनी विशुद्धि होगी उतना पुण्य होगा जितना पुण्य होगा उतना पाप घटेगाआत्म दृष्टि के बाद यह सब चीजें घटित होतीहै। अपने अंदर उसे जगाइए। मैं कौन हूं?मेरा क्या है? इसे पहचानने की कोशिशकीजिए। धर्म को धारण करने वाला ही सिद्धचक्र में प्रवेश करता है।