धर्मशाला,(ईएमएस)। विश्वविख्यात आध्यात्मिक गुरु और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता 14वें दलाई लामा ने अपने जीवन में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि जोड़ ली है। 90 साल की आयु में दलाई लामा ने बेस्ट ऑडियोबुक, कहानी कहने और व्याख्या की रिकॉर्डिंग श्रेणी में अपना पहला ग्रैमी अवॉर्ड जीता है। यह सम्मान उन्हें एल्बम ‘मेडिटेशन्स: द रिफ्लेक्शंस ऑफ हिज होलीनेस द दलाई लामा’ के लिए प्रदान किया गया, जिसमें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्रभाव और आधुनिक सहयोग देखने को मिलता है। इस श्रेणी में दलाई लामा के साथ वनीली बैंड के फैब मोरवन, अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट जज केतनजी ब्राउन जैक्सन, प्रसिद्ध टीवी होस्ट ट्रेवर नोआ और अभिनेत्री कैथी गार्वर जैसे नाम भी नामांकित थे। यह अवॉर्ड समारोह यूट्यूब पर स्ट्रीम होगा, जहां दलाई लामा की ओर से प्रसिद्ध गायक और संगीतकार रुफस वेनराइट ने पुरस्कार ग्रहण किया। इस सम्मान पर प्रतिक्रिया देकर दलाई लामा ने कहा कि वे इस पहचान को अत्यंत विनम्रता के साथ स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा, “मैं इस अवार्ड को किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि हमारी साझा वैश्विक जिम्मेदारी की पहचान के रूप में देखता हूं।” दलाई लामा का मानना है कि शांति, करुणा, पर्यावरण की रक्षा और मानवता की एकता आज की दुनिया के लिए अनिवार्य मूल्य हैं। उन्होंने कहा कि वे आभारी हैं कि यह ग्रैमी सम्मान इन संदेशों को दुनिया भर में और अधिक फैलाने में मदद करेगा। 14वें दलाई लामा का जीवन संघर्ष, साहस और करुणा की अद्भुत मिसाल है। लगभग 66 वर्ष पहले, 1959 में, उन्होंने एक साधारण सैनिक का भेष बनाकर तिब्बत के नोरबुलिंगका पैलेस को छोड़ा। 14 दिनों की कठिन और जोखिम भरी यात्रा के बाद वे भारत पहुंचे और निर्वासन में जीवन शुरू किया। तब से वे भारत सरकार के सबसे लंबे समय तक रहने वाले और सबसे सम्मानित अतिथियों में गिने जाते हैं। दलाई लामा का वास्तविक नाम तेनजिन ग्यात्सो है। वे 17 मार्च 1959 को अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ भारत आए थे। उस समय चीन ने तिब्बत में उठे विद्रोह को कठोरता से दबा दिया था। भारत पहुंचने के बाद दलाई लामा ने सबसे पहले उत्तराखंड के मसूरी में लगभग एक वर्ष तक निवास किया। इसके बाद 10 मार्च 1960 को उन्होंने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला को अपना स्थायी निवास बनाया, जो आज तिब्बती निर्वासित सरकार का केंद्र है। दुनिया भर में भ्रमण करने वाले दलाई लामा को करुणा और शांति का जीवंत प्रतीक माना जाता है। उनकी नई पुस्तक ‘वॉइस फॉर द वॉइसलेस’ में चीन और तिब्बत के बीच दशकों पुराने संबंधों, तिब्बत की आज़ादी के संघर्ष और वहां के लोगों की पीड़ा का विस्तार से वर्णन है। यह पुस्तक निर्वासन, सांस्कृतिक अस्तित्व के संकट और भविष्य की उम्मीदों को दर्शाती है। आशीष दुबे / 02 फरवरी 2026