लेख
03-Feb-2026
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1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री छत्रपति निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2026-27 संसद में प्रस्तुत किया। यह बजट केवल आर्थिक आंकड़ों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक विरासत और नैतिक दृष्टिकोण को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का एक संगठित प्रयास भी है। इस बजट में धर्म, दर्शन, अध्यात्म, योग, आयुर्वेद तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला के रूप में देखा गया है। धर्म और संस्कृति : विकास का नैतिक आधार भारतीय परंपरा में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि कर्तव्य, नैतिकता, करुणा और सामाजिक समरसता है। बजट 2026-27 में धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण, संवर्धन और विकास हेतु लगभग ₹18,000–₹22,000 करोड़ का संयुक्त प्रावधान किया गया है, जिसमें तीर्थ-परियोजनाएँ, विरासत संरक्षण, मंदिर कॉरिडोर और सांस्कृतिक पर्यटन अवसंरचना शामिल हैं।धार्मिक पर्यटन एवं सांस्कृतिक उद्योग से वर्ष 2026-27 में लगभग ₹2.5–₹3 लाख करोड़ का आर्थिक उत्पादन अनुमानित है, जो कुल GDP का लगभग 1.1%–1.3% योगदान कर सकता है। यह न केवल पर्यटन को गति देगा, बल्कि स्थानीय रोजगार, हस्तशिल्प, सेवा-क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ करेगा। इस प्रकार धर्म यहाँ केवल आस्था नहीं, बल्कि समावेशी विकास का नैतिक आधार बनता है। दर्शन और भारतीय ज्ञान परंपरा : शिक्षा का आत्मिक आयाम भारतीय दर्शन — वेदांत, उपनिषद, बौद्ध, जैन और भक्ति परंपरा — मानव जीवन को अर्थ, उद्देश्य और शांति प्रदान करते रहे हैं। बजट 2026-27 में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत, दर्शन, नैतिक शिक्षा और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण हेतु लगभग ₹4,000–₹6,000 करोड़ का प्रावधान अनुमानित है। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था, शिक्षा-सेवा और सांस्कृतिक शोध के माध्यम से लगभग ₹60,000–₹80,000 करोड़ का अप्रत्यक्ष आर्थिक योगदान संभव है। यह पहल यह दर्शाती है कि राष्ट्र केवल कुशल मानव संसाधन नहीं, बल्कि संस्कारवान और विवेकशील नागरिक तैयार करना चाहता है। इससे शिक्षा का उद्देश्य रोजगार तक सीमित न रहकर जीवन-बोध और आत्मिक विकास तक विस्तारित होता है। अध्यात्म, योग और आयुर्वेद : समग्र स्वास्थ्य की अर्थव्यवस्था बजट 2026-27 में योग, आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और प्राकृतिक चिकित्सा प्रणालियों को विशेष प्रोत्साहन दिया गया है। आयुष मंत्रालय और संबंधित योजनाओं के अंतर्गत लगभग ₹9,000–₹12,000 करोड़ का प्रावधान अनुमानित है। भारत का वेलनेस, योग और आयुर्वेद उद्योग वर्ष 2026-27 में लगभग ₹1.2–₹1.5 लाख करोड़ का योगदान देने की क्षमता रखता है, जो जीडीपी का लगभग 0.5%–0.6% हो सकता है। यह नीति इस विचार को पुष्ट करती है कि स्वास्थ्य केवल रोग-निवारण नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन का नाम है। इस क्षेत्र में भारत वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर होता दिख रहा है। आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था और डिजिटल युग धार्मिक पर्यटन, तीर्थ सेवाएँ, ध्यान-योग केंद्र, ऑनलाइन दर्शन-पूजा सेवाएँ, आध्यात्मिक शिक्षण प्लेटफॉर्म और डिजिटल धार्मिक सामग्री — इन सबके सम्मिलन से एक उभरती हुई आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था आकार ले रही है। इस क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग ₹5,000–₹7,000 करोड़ के प्रोत्साहन एवं अवसंरचना समर्थन की व्यवस्था देखी जा सकती है। यह क्षेत्र मिलकर लगभग ₹3–₹4 लाख करोड़ का आर्थिक मूल्य उत्पन्न कर सकता है, जो जीडीपी का लगभग 1.3%–1.6% योगदान हो सकता है। यह केवल व्यापार का विस्तार नहीं, बल्कि आस्था और आधुनिक तकनीक का सृजनात्मक संगम है, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। नैतिक विकास और मूल्य आधारित राष्ट्र निर्माण बजट 2026-27 का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह विकास को केवल भौतिक समृद्धि तक सीमित नहीं करता, बल्कि उसे नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उन्नयन से जोड़ता है। धर्म, दर्शन और अध्यात्म को नीति-निर्माण में स्थान देना यह संकेत देता है कि भारत की विकास-यात्रा केवल GDP वृद्धि की नहीं, बल्कि मानव चेतना के उत्कर्ष की यात्रा है। धार्मिक पर्यटन, योग-आयुर्वेद, संस्कृति-आधारित उद्योग और आध्यात्मिक सेवाओं का संयुक्त योगदान वर्ष 2026-27 में अनुमानतः ₹7–₹9 लाख करोड़, अर्थात् GDP का लगभग 3%–3.5% तक पहुँच सकता है। भारत का केंद्रीय बजट 2026-27 एक ऐसा दस्तावेज है जो अर्थव्यवस्था और अध्यात्म, विकास और दर्शन, विज्ञान और संस्कृति के बीच सेतु का निर्माण करता है। यह बजट यह स्पष्ट करता है कि भारत का भविष्य केवल औद्योगिक और तकनीकी शक्ति बनने में नहीं, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व स्थापित करने में भी निहित है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 3 फरवरी /2026