क्षेत्रीय
03-Feb-2026
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- धारा 354 के आरोपी के बरी होने पर राज्य सरकार ने की थी हाईकोर्ट में अपील जबलपुर (ईएमएस)। म.प्र. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बीपी शर्मा की एकलपीठ ने एक मामले में सुनवाई करते हुए एससी–एसटी एक्ट जैसे गंभीर कानून के दुरुपयोग पर गंभीर रुख अपनाते हुए राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमे सीधी की विशेष अदालत द्वारा एक दुकानदार को बरी किये जाने को चुनौती दी गई थी। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि साड़ी वापस न लेने की नाराज़गी में पीड़िता द्वारा दुकानदार के खिलाफ जहां एफआईआर देर से दर्ज कराई गई वहीं वह पूरी तरह अविश्वसनीय और मनगढ़ंत भी है प्रकरण के मुताबिक सीधी जिले के कुसमी थानांतर्गत भगवारपुर तिराहे पर बबलू उर्फ़ अनिल गुप्ता की कपडे की दुकान पर पीड़ित महिला 9 दिसंबर 2010 को साड़ी खरीदने गई थी फिर 10 दिसंबर को वह साड़ी वापस करने दुकान पहुंची। पीड़िता का आरोप था कि दुकानदार ने साड़ी तो वापस नहीं ली और बुरी नियत से उसने उसका हाथ पकड़कर दुकान के अंदर ले जाने की कोशिश की। उक्त मामले में 13 दिसंबर 2010 को पीड़ित महिला द्वारा थाने में ‎शिकायत‎ दर्ज कराई गई| इस मामलें में सुनवाई के बाद सीधी की विशेष न्यायालय ने 30 अप्रैल 2016 को आरोपी दुकान संचालक को आईपीसी की धारा 354 और एससी–एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(11) से बरी कर दिया था। इसी फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने यह अपील वर्ष 2016 में दाखिल की थी। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि पीड़िता ने खुद स्वीकार किया कि वह आरोपी से इसलिए नाराज़ थी क्योंकि उसने दुकान से खरीदी गई साड़ी वापस लेने से मना कर दिया था। इसी नाराज़गी में तीन दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई। इस देरी के लिए कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। एकलपीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एफआईआर में देरी अभियोजन के लिए घातक है। किसी भी गवाह ने आरोपों का समर्थन नहीं किया। जिससे पीड़िता का आचरण और बयान संदेह के घेरे में है। एकलपीठ ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष दुकानदार का अपराध संदेह से परे सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा और ट्रायल कोर्ट द्वारा उसको बरी करने का फैसला बिल्कुल सही था। न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि आपसी रंजिश को निपटाने के लिए गंभीर कानूनों का इस्तेमाल कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अजय पाठक / मोनिका / 03 फरवरी 2026/ 02.26