लेख
05-Feb-2026
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सोने की कीमतों में गिरावट से बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों की चिंता बढ़ गई है। देश में गोल्ड लोन का चलन बढ़ता जा रहा है। लोग अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए सोना गिरवी रखकर लोन ले रहे हैं। हाल ही में सोने की कीमतों में तेज वृद्धि और उसके बाद तेजी के साथ दामों में गिरावट ने बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों की ऋण व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 9 करोड़ लोगों ने सोना गिरवी रख कर बैंकों और वित्तीय संस्थानों से कर्ज लिया है। जिसके चलते लगभग 3.4 लाख करोड़ रुपये मूल्य का सोना बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं के पास गिरवी रखा हुआ है। सोने के दाम में हालिया गिरावट ने इस पूरे तंत्र को हिला दिया है। बैंक और वित्तीय संस्थान सोने की कीमत का 75 फ़ीसदी से 90 फ़ीसदी तक फाइनेंस कर देते हैं। ऋण देने के जो नियम बना रखे हैं उसके अनुसार यदि दाम घटते हैं तो ऐसी स्थिति में ऋणधारक को ब्याज की मार्जिन मनी चुकानी पड़ती है। यदि वह मार्जिन नहीं दे पता है तो ऐसी स्थिति में बैंक और वित्तीय संस्थानों को अधिकार है कि वह सोने की नीलामी करके अपना पैसा वसूल कर लें। बीते वर्षों में सोने की कीमतों में तेज वृद्धि के कारण गोल्ड लोन को सुरक्षित कर्ज मानते हुए बैंकों ने बड़े पैमाने पर सोने पर कर्ज को बढ़ावा दिया है। लोगों ने भी बढ़ी हुई कीमतों का फायदा उठाकर ज्यादा कर्ज लिया। कई मामलों में टॉप-अप लोन भी प्राप्त किया है। अब सोने के दाम अप्रत्याशित रूप से घटने के कारण गिरवी रखे गए सोने का मूल्य कम हो गया है। कर्ज की राशि से सोने की कीमत कम हो गई है। ऐसी स्थिति में बैंकों द्वारा कर्जदारों से मार्जिन मनी जमा करने या अतिरिक्त सोना गिरवी रखने का दबाव बढ़ाया जा रहा है। समस्या यह है, गोल्ड लोन लेने वाले अधिकतर लोग आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। उनके पास ब्याज और मार्जिन मनी के रूप में जमा करने के लिए अतिरिक्त नकदी नहीं है। जिससे वह वित्तीय संस्थान द्वारा मांगी गई मार्जिन मनी को जमा कर सकें। अर्थ विशेषज्ञों का कहना है, अगर कर्ज न चुकाने की स्थिति में बड़े पैमाने पर वित्तीय संस्थाओं द्वारा सोने की नीलामी की जाएगी। ऐसी स्थिति में तो बाजार में सोने की आपूर्ति बढ़ेगी। जिससे सोने की कीमतों में और भी बड़ी गिरावट आ सकती है। इससे बैंकों और वित्तीय संस्थाओं का घाटा बढ़ सकता है। इसका असर बैलेंस शीट पर भी पड़ेगा। सोने और चांदी की कीमतों में जिस तरह की तेजी और मंदी देखने को मिल रही है, उसने वित्तीय संस्थानों की चिंता को बढ़ा दिया है। शेयर बाजार में भी लगातार गिरावट का दौर चला। जिसके कारण वित्तीय संस्थानों को शेयर बाजार में भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। बाजार में उपभोक्ता के पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं है। जिसके कारण बाजार में मांग घट रही है। नौकरी और रोजगार पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव दिखने लगा है। भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) और अन्य बैंक इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। अर्थ विशेषज्ञों के अनुसार, अगर सोने की कीमतों में तेज गिरावट जारी रहती है तो यह संकट बैंकिंग व्यवस्था के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकता है। पिछले कुछ वर्षों से सोना गिरवी रखने में 75 से 90 फ़ीसदी तक लोन गिरवी रखने वालों को दिया जाता था। बड़े पैमाने पर लोगों द्वारा सोने पर लोन लिया गया है। सोने में लिए गए ऋण का असर 9 करोड़ परिवारों पर सीधे रूप से देखने को मिल रहा है। जिस मध्यम वर्ग के पास सोना है, वह अपनी ज़रूरतें सोना गिरवी रखकर पूरी कर रहा था। देश की अर्थव्यवस्था में मध्यम वर्ग के ऊपर कितना दबाव है, यह उसे दर्शा रहा है। वर्तमान आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं होने की दशा में बाजार में मांग घटेगी। आने वाले समय में इसका असर रोजगार और व्यवसाय पर पड़ेगा। देश को आर्थिक मंदी का शिकार होना पड़ सकता है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के ऊपर भी भारी कर्ज है। रिजर्व बैंक और राष्ट्रीयकृत बैंकों के पास पर्याप्त नगदी की उपलब्धता नहीं है। इसको देखते हुए रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय की चिंता बढ़ गई है। सोने एवं चांदी में कर्ज किस मानक से दिया जाए, इसके लिए वित्तीय संस्थान चिंतन कर रहे हैं। वित्तीय संस्थाओं का 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा सोने के ऋण में फंसा हुआ है। शेयर बाजार में जिस तरीके के उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं, उसने भी रिजर्व बैंक की चिंता को बढ़ा दिया है। अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए रिजर्व बैंक अर्थशास्त्रियों के साथ मिलकर बदली हुई परिस्थितियों का मुकाबला किस तरह से किया जाए। किस तरह के नियम तैयार किए जाएं। जिसे भारतीय अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी का शिकार होने से बचे। सरकार और रिजर्व बैंक को इस पर ध्यान देने की जरूरत है। ईएमएस / 05 फरवरी 26