क्षेत्रीय
05-Feb-2026
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- पांच सौ एकड़ केंद्रीय रिजर्व वन भूमि आज भी दबंगों के कब्जे में सिंगरौली (ई एम एस )जिले के बगदरा अभ्यारण में वन्य प्राणी विचरण भूमि लगभग 500 एकड़ से अधिक केंद्रीय रिजर्व वन भूमि पर दसकों से जारी अवैध कब्जे और खेती को लेकर समाचार प्रकाशन के बावजूद प्रशासन की कुम्भकरणी निद्रा नहीं टूटी है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक उदासीनता का प्रमाण है, बल्कि वन कानूनों और न्याय की खुली अवहेलना भी है। पूर्व में प्रकाशित समाचार में स्पष्ट किया गया था कि अभ्यारण की संरक्षित भूमि पर सरसों व तीली की अवैध खेती की जा रही है, जहां आज भी नीलगाय सहित अन्य वन्यजीव दिनदहाड़े विचरण करते हैं। इसके बावजूद विभाग द्वारा अब तक न कोई सीमांकन हुआ, न बेदखली, न ही किसी प्रभावशाली कब्जाधारी पर कार्रवाई की गई। *खुलासे के बाद भी चुप्पी क्यों-* सबसे बड़ा और चिंताजनक प्रश्न यह है कि—क्या 500 एकड़ की खेती प्रशासन को दिखाई नहीं देती? क्या वन विभाग और राजस्व अमला केवल गरीबों की झोंपड़ियां तोड़ने के लिए ही सक्रिय है? या फिर दबंगों और रसूखदारों के सामने कानून बौना हो गया है? स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस तत्परता से गरीब आदिवासियों की झोपड़ियाँ उजाड़ी जाती हैं, यदि उसका दसवां हिस्सा भी दबंगों पर लागू कर दिया जाए, तो बगदरा अभ्यारण आज अतिक्रमण मुक्त हो सकता है। केंद्रीय रिज़र्व भूमि पर कब्जा गंभीर अपराध वन विशेषज्ञों के अनुसार, *केंद्रीय रिजर्व वन भूमि पर कब्जा-* वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 पर्यावरण संरक्षण अधिनियम का सीधा उल्लंघन है। यह कोई साधारण अतिक्रमण नहीं, बल्कि संगठित वन अपराध की श्रेणी में आता है, जिसमें प्रशासनिक संरक्षण की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। *सरपंच पर गंभीर आरोप कार्रवाई शून्य-* स्थानीय सूत्रों के अनुसार ग्राम पंचायत फुटहड़वा के सरपंच राजेंद्र सिंह पर सबसे अधिक अभ्यारण भूमि पर कब्जा कर दसकों से खेती कराने के गंभीर आरोप हैं। यदि यह तथ्यात्मक रूप से सत्य हैं, तो यह मामला जन प्रतिनिधि द्वारा संविधान और पर्यावरण दोनों से गद्दारी का उदाहरण है। *लेकिन हैरानी की बात यह है-* न कोई जांच समिति बनी, न सीमांकन हुआ, न एफआईआर दर्ज की गई, और फोन बंद जवाब गायब। इस फॉलो-अप के दौरान जब *सौरभ मिश्रा एसडीएम चितरंगी के मोबाइल नंबर 9201288861* पर संपर्क कर कार्रवाई की स्थिति जानना चाही गई, तो फोन रिसीव नहीं हुआ। एसडीएम का रवैया बताता है कि स्थानीय प्रशासन सवालों से बच रहा है, जवाब देने को तैयार नहीं। *वन्य जीवों पर संकट गहराया लगातार जंगल में खेती बना कारण-* लालता प्रसाद कोल ने बताया यहां 10 वर्ष पहले काला मृग, नीलगाय, सूअर, इत्यादि वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास था जिसे 500 एकड़ से ज्यादा भूमि को राजेंद्र सिंह सरपंच खेती कर ने नष्ट कर दिए, यहां की जंगल झाड़ी नष्ट हो जाने के कारण जानवर आबादी की ओर भटक रहे हैं अभ्यारण में वन्यजीवों की संख्या लगातार घट रही है। यदि यही स्थिति रही, तो बगदरा अभ्यारण केवल सरकारी फाइलों और बोर्डों तक सिमट कर रह जाएगा। *अब चेतावनी भरा सवाल-* क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे या केंद्रीय हस्तक्षेप का इंतजार कर रहा है? क्या पर्यावरण और वन्यजीवों की कीमत पर दबंगों की खेती चलती रहेगी? पर्यावरण प्रेमियों सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच और बेदखली कार्रवाई नहीं हुई, तो मामला राष्ट्रीय स्तर और न्यायालय तक ले जाया जाएगा। बगदरा अभ्यारण को बचाना अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी का भी इम्तिहान बन चुका है। *इनका कहना-* जानकारी प्राप्त हुई हैं बहुत जल्दी टीम गठित कर अभ्यारण की भूमि सीमांकन करा कार अतिक्रमण मुक्ति करने के साथ-साथ कब्जा धारियों के विरुद्ध विधिक एवं दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी *राजेश कुमार कुंनुन आई एफ एस 20 बगदारा अभ्यारण सीधी (म.प्र.)* रिपोर्टर : (ई एम एस )सें आर.एन. पांडे सिंगरौली-